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रात को खूब सोए फिर भी नहीं गई सुस्ती-थकान, कहीं ये वाला सिंड्रोम तो नहीं?

Chronic Fatigue Syndrome: दिनभर काम करने के बाद थका महसूस करना एकदम नॉर्मल है. अगर रेस्ट करने के बाद भी ये थकान दूर नहीं होती. रोज़ सुस्ती महसूस होती है. मूड ख़राब रहता है. तो, ये थकान नहीं है. इसे कहते हैं क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम. ये क्या होता है, चलिए समझते हैं.

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क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम स

आप रात में खूब थककर सोए. सुबह उठे तो थकान दूर ही नहीं हुई. दिनभर सुस्त और थका हुआ महसूस हुआ. काम में मन नहीं लगा. हर बात पर झुंझलाहट. चिड़चिड़ापन. सोचा, थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, बेहतर महसूस होगा. लेकिन नहीं. दो-तीन घंटों के रेस्ट के बाद भी शरीर उतना ही थका हुआ है. किसी काम में मन नहीं लग रहा.

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दिनभर काम करने के बाद थका महसूस करना एकदम नॉर्मल है. अगर रेस्ट करने के बाद भी ये थकान दूर नहीं होती. रोज़ सुस्ती महसूस होती है. मूड ख़राब रहता है. तो, ये थकान नहीं है. इसे कहते हैं क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम. ये क्या होता है, चलिए समझते हैं. 

क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम क्या होता है?

ये हमें बताया डॉक्टर समीर मल्होत्रा ने. 

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डॉ. समीर मल्होत्रा, हेड, मेंटल हेल्थ एंड बिहेवियरल साइंसेज़, मैक्स हॉस्पिटल, नई दिल्ली

क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम में व्यक्ति लगातार थकावट महसूस करता है. इमोशनल या फिज़िकल स्ट्रेस के बाद उसे बहुत ज़्यादा थकान महसूस होती है. इससे उसके रोज़ के कामों पर असर पड़ता है. व्यक्ति कोई काम मन लगाकर नहीं कर पाता. लेटते या बैठते हुए चक्कर आ जाते हैं. ऐसे व्यक्तियों को जोड़ों और मांसपेशियों में काफी दर्द रहता है. इसके चलते वो अपने रोज़ाना के काम ठीक से नहीं कर पाते. काम में मन न लगने की वजह से ब्रेन फॉग जैसे दिक्कतें भी रहती हैं. इसमें सब कुछ धुंधला दिखाई देता है. कभी-कभी व्यक्ति को बौखलाहट भी होती है.

ये आम थकावट से अलग है क्योंकि इसमें व्यक्ति कई दिनों तक बिस्तर पर पड़ा रहता है. उसमें हिम्मत नहीं होती और वो अपने रोज़ के काम नहीं कर पाता. आमतौर पर व्यक्ति थोड़ी मेहनत के बाद कुछ देर के लिए थक जाता है. कुछ समय बाद शरीर दोबारा ताज़गी महसूस करने लगता है. मगर क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम में ताज़गी का ये एहसास नहीं हो पाता.

क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम का कारण

क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम होने के कई कारण हैं. इनमें से कुछ बायोलॉजिकल कारण हैं. जब शरीर में सेरोटोनिन, गाबा और नॉरपेनेफ्रिन जैसे केमिकल्स की कमी होती है. तब शरीर को ज़्यादा तकलीफ और दर्द का एहसास होता है. मन भी कुछ टूटा-बिखरा और घबराया-सा रहता है.

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समय पर सोना और जगना ज़रूरी है

क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम का इलाज

इसमें नींद एक ज़रूरी भूमिका निभाती है. समय पर सोना और उठना बहुत ज़रूरी है. इसके लिए सोने और जगने का टाइम तय करें. नींद के पीछे भागना नहीं है, पर एक टाइम ज़रूर तय करें. रात में चाय और कॉफ़ी न पिएं. इनके चलते कई बार ठीक से नींद नहीं आती.

जो लोग दूध को पचा पाते हैं. वो रात में सोने से पहले गुनगुना दूध पी सकते हैं. इससे रात में अच्छी नींद आती है. शौच करके सोने से भी बेहतर नींद आती है.

साथ ही, थोड़ा मूवमेंट भी ज़रूरी है. आप बहुत ज़्यादा एक्सरसाइज़ एकदम से न करें. एक्सरसाइज़ धीरे-धीरे बढ़ाएं. वहीं, अगर आपका मन उदास है. साथ-साथ घबराहट और बेचैनी है, तो उसका इलाज होना भी ज़रूरी है. कोई पारिवारिक समस्या है तो काउंसलिंग और बातचीत से उसे निपटाएं. जहां दवा की ज़रूरत है, वहां दवा ले. समय रहते इसका उपचार कराएं. क्रोनिक फ़टीग सिंड्रोम का इलाज उपलब्ध है.

(यहां बताई गई बातें, इलाज के तरीके और खुराक की जो सलाह दी जाती है, वो विशेषज्ञों के अनुभव पर आधारित है. किसी भी सलाह को अमल में लाने से पहले अपने डॉक्टर से जरूर पूछें. ‘दी लल्लनटॉप' आपको अपने आप दवाइयां लेने की सलाह नहीं देता.)

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