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फिल्म रिव्यू- टॉक्सिक

कैसी है यश और गीतू मोहनदास की फिल्म 'टॉक्सिक'?

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'टॉक्सिक' को ओरिजिनली कन्नड़ा और इंग्लिश में शूट किया गया है. अन्य भाषाओं में इसे डब करके रिलीज़ किया गया है.

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  • फिल्म 'टॉक्सिक' का निर्देशन गीतू मोहनदास ने किया है, जिसमें यश, नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी आदि मुख्य भूमिका में हैं और यह एक गैंगस्टर राया की कहानी बताती है।
  • फिल्म की पृष्ठभूमि में राया के बचपन का ट्रैजिक अनुभव और जेनरेशनल ट्रॉमा है, जिससे तीन पीढ़ियां हिंसा और बदले के चक्र में फंसी हुई हैं।
  • फिल्म की रिलीज़ के बाद दर्शकों में मिश्रित प्रतिक्रियाएँ आई हैं, और आलोचकों ने इसकी लंबाई और संवाद शैली पर सुधार के सुझाव दिए हैं।

फिल्म- टॉक्सिक
डायरेक्टर- गीतू मोहनदास
एक्टर्स- यश, नयनतारा, कियारा आडवाणी, हुमा कुरैशी, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत, अक्षय ओबेरॉय, सुदेव नायर
रेटिंग- 3 स्टार 

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गीतू मोहनदास की 'टॉक्सिक' एक अन-अपोलोजेटिक, एंबिशियस और ब्रेव फिल्म है. आप तीन घंटे तक ये फिल्म देखते रहते हैं और मालूम नहीं पड़ता कि असल में ये फिल्म है किस बारे में. ये बात आपको आखिरी आधे घंटे में बताई जाती है. और तब जाकर वो घेरा पूरा होता है. थीमैटकली ये बहुत नीश फिल्म है. उस सब्जेक्ट को जिस तरह से बरता गया है, वो डिबेटेबल हो सकता है. मगर ये बड़े मन से, खूब जतन करके बनाई गई फिल्म है.

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'टॉक्सिक' राया नाम के एक गैंगस्टर की कहानी है. जिसका बचपन बड़ा ट्रैजिक रहा. वो अपनी बहन गंगा के साथ बड़ा हुआ. उस पात्र को गंगा नाम देना, सुंदर बात है. जिसका मर्म और संदर्भ सिर्फ राया को ही मालूम है. ख़ैर, ये कहानी पांच दशकों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में घटती है. मगर इसकी जन्म और कर्मभूमि मुख्यत: गोवा है. राया को वही चाहिए जो KGF में यश को चाहिए थी. दुनिया. मगर वो बहुत टॉक्सिक आदमी है. ये बात फिल्म आपसे कभी नहीं छुपाती. और बाकायदा उसे उसका खामियाज़ा भी भुगतना पड़ता है. फिल्म पूरे टाइम आपसे यही कहती रहती है. 

'टॉक्सिक' से मेरे दो मेजर टेकअवेज़ रहे. अव्वल, तो बैड पैरेंटिंग. What it does to you and then what you do to people because of this. And then to you as well. और दूसरा जेनरेशनल ट्रॉमा. राया की तीन पीढ़ियां इस कुचक्र में फंसी हुई हैं. उन्हें हिंसा और बदले के अलावा कुछ आता ही नहीं है. फिल्म में एक सीन है, जब राया और उसके बेटे टिकट के बीच सुलह हो जाती है. अब टिकट के पास जीवन में कोई मक़सद ही नहीं है. वो राया से कहता है- "अब मैं क्या करेगा? मुझे भी अपने साथ ले चलो डैडी."

'टॉक्सिक' बहुत ही वॉयलेंट फिल्म है. तकरीबन हर सीन में गोली चल रही है. सेक्स हो रहा है. मगर ये हिंसा कभी फिल्म के मक़सद को चोट नहीं पहुंचाती. इसे बिल्कुल वैसे ही बनाया गया है, जैसे गीतू मोहनदास बनाना चाहती थीं. अपने तरीके से. एकदम जेन्यूइन फीलिंग के साथ. मुझे फिल्म देखते हुए ऐसा लगा कि इस फिल्म में यश जैसे सुपरस्टार हैं, जिनका सितारा बुलंदी पर है. ऐसे में अभी आप उनके साथ इंडी फिल्म नहीं बना सकते. इसलिए मेकर्स ने बीच का रास्ता निकाला. उन्होंने यश के फैन्स को वो दे दिया, जो उन्हें चाहिए था. और वो भी कर दिया, जो वो इस फिल्म में करना चाहते थे. इस फिल्म के पास कहने को एक ज़रूरी बात है. मगर वो बात लोग सुनना या समझना नहीं चाहते. इसलिए उसे आकर्षक पैकेजिंग के साथ लाया गया. जिसे जनता हाथों-हाथ ले रही है. इससे वित्त और चित्त दोनों सध गए.

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देखिए फिल्म को काट-छांटकर टुकड़ों में देखेंगे, तो स्वाद खराब होना तय है. इसलिए मैंने इसे हॉलिस्टिकली देखना चुना. बिलाशक इस फिल्म में खामियां हैं. मुझे जो दो चीज़ें सबसे ज़्यादा खटकीं. वो है फिल्म की लंबाई और संवाद. अगर इसकी लंबाई कम होती, तो देखने का एक्सपीरियंस और बेहतर होता. डायलॉग्स के मामले में ये फिल्म मार खाती है. क्योंकि यहां कोई आपस में बात नहीं कर रहा. राइमिंग में बातें हो रही हैं. हर बात में शेर-ओ-शायरी हो रही है. एक डायलॉग, तो इतना वीयर्ड है कि मैंने नोट डाउन किया. एक सीन में गोवा के सबसे बड़े गैंगस्टर साल्वाडोर और राया के बीच में बात हो रही है. साल्वाडोर धमकाता है कि अगर उसकी बेटी रेबेका को कुछ हुआ, तो खून बहेगा. इसके जवाब में राया अपनी ड्रिंक उठाकर चीयर्स करते हुए कहता है- "हमारे शौर्य, धैर्य और वीर्य के लिए."  

'टॉक्सिक' के लीडिंग मैन भले यश हैं. ये पूरी फिल्म यश के स्वैगर, स्लो-मो शॉट्स से भरी हुई है. मगर इस कहानी के केंद्र में महिलाएं हैं. नयनतारा ने राया की बहन गंगा का रोल किया है. एक तरह से वो राया की गाइड है. राया वही करता है, जो गंगा कहती है. वजनदार कैरेक्टर है. और कथानक में उसकी एक अहम भूमिका है. नयनतारा ने उसे निभाया भी उसी गंभीरता और ग्रेस के साथ है. दूसरा किरदार है कियारा आडवाणी का. उन्होंने सर्कस आर्टिस्ट नाडिया का रोल किया है. जिससे राया प्रेम करता है. नाडिया इस फिल्म की इमोशनल कोर है. कहानी में उस किरदार की एंट्री के बाद जो कुछ भी होता है, वो उसकी वजह से और उसके लिए ही होता है. कियारा ने अपने पात्र को आत्मसात किया है. इमोशनल सीन्स में उन्हें देखना अच्छा लगता है. हुमा कुरैशी ने फिल्म में एलिज़ाबेथ का रोल किया है, जो कि साल्वाडोर की मिस्ट्रेस है. गंगा, एलीज़ाबेथ और नाडिया के तार इस तरह से जुड़े हुए हैं कि उनके बिना ये कहानी होती ही नहीं.  

'टॉक्सिक' बहुत ही स्टाइलाइज्ड एक्शन थ्रिलर है. कुछ एक एक्शन सीक्वेंस ऐसे हैं, जो बहुत स्ट्राइकिंग हैं. मगर उस एक्शन को अगर किसी इमोशन से बैक नहीं किया गया, तो वो बैकफायर भी कर सकता है. मगर 'टॉक्सिक' में इतने सारे एक्शन सीक्वेंस हैं कि आप पिछले सीक्वेंस भूलते चले जाते हैं. फिल्म की शुरुआत में कब्रगाह में एक एक्शन सीक्वेंस है. जो कि यश का इंट्रो सीक्वेंस भी है. ये वही सीक्वेंस है, जो फिल्म के पहले टीजर के तौर पर रिलीज़ किया गया था. वो स्टैंड-आउट करता है.

मगर इस फिल्म का असली मटीरियल छुपा है क्लाइमैक्स में. फिल्म के आखिरी आधे घंटे क्रेज़ी हैं. जहां फिल्म दर्शकों से सारा हिसाब चुकता करती है. ये वो समय है, जब फिल्म का सबसे बड़ा राज खुल चुका है. गंगाधर ही शक्तिमान है. अब फिल्म जाती है अपने नायक के दिमाग के भीतर. जो कि खराब हो चुका है. राया जैसे सोच रहा है, स्क्रीन पर वैसे ही विज़ुअल्स चल रहे हैं. राया को फ्लैशबैक्स आ रहे हैं. और वो स्क्रीन पर वैसे ही ट्रांजिशन की मदद से ट्रांसलेट हो रहे हैं. जिससे मैंने रिलेट किया. वो विजुअल्स इतने स्टनिंग कि आप हैरान रह जाते हैं. इसका क्रेडिट फिल्म के एडिटर उज्जवल कुलकर्णी को.

'टॉक्सिक' उस तरह की फिल्म है, जिसको लेकर पोलराइज्ड रिएक्शंस आने तय हैं. ये बिल्कुल एक्वायर्ड टेस्ट वाला मामला है. या तो आपको फिल्म अच्छी लगेगी या बुरी लगेगी. यहां कोई ग्रे एरिया नहीं है. मगर मेरे लिए वो बात ज़रूरी है, जो फिल्म कहना चाह रही है. वो मुझे समझ आई. मैं गीतू मोहनदास की इस फिल्म को दूंगा 3 स्टार. 

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