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फिल्म रिव्यू- द वन

'पंचायत' जैसी ब्लॉकबस्टर वेब सीरीज़ बनाने वाले दीपक कुमार मिश्रा की फिल्म 'द वन' कैसी है?

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'द वन' से TVF ने फिल्मों में कदम रखा है.

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  • फिल्म 'द वन' सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया अभिनीत रिलीज़ हो चुकी है, जिसमें धार्मिक प्रतीकों और वन देवी की कहानी को मुख्य रूप से दर्शाया गया है।
  • फिल्म का निर्माण ऐसे समय में हुआ जब निर्माताओं ने साइंस और धर्म को टकराने वाला विषय चुना, जिससे कथानक और प्रस्तुति में कई कमियां सामने आईं।
  • यह फिल्म दर्शकों और समीक्षकों दोनों से कमजोर रेटिंग मिली है, भविष्य में इस अवधारणा पर बेहतर फिल्म बनाने की संभावना बनी रहेगी।

फिल्म- द वन
डायरेक्टर- दीपक कुमार मिश्रा 
एक्टर्स- सिद्धार्थ मल्होत्रा, तमन्ना भाटिया, अनूप सोनी, श्वेता तिवारी, सुनील ग्रोवर, मनीष पॉल
रेटिंग- 2 स्टार 

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सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना की फिल्म 'द वन' थिएटर्स में रिलीज़ हो चुकी है. इस फिल्म और उसके मेकर्स को ऐसा लगता है कि वो लोग बहुत महत्वाकांक्षी हैं. इसलिए वो कुछ भी ट्राय कर सकते हैं. मगर इसमें उन्होंने फेल होने का ऑप्शन नहीं रखा. इस फिल्म में हर वो एलिमेंट डालने की कोशिश की गई है, जो आज कल चल रहा है. या पहले चल चुका है.  इसमें से कोई चीज़ तो क्लिक करेगी. कुछ नहीं होगा तो धार्मिक एंगल तो काम कर ही जाएगा. इसलिए फिल्म में वन देवी के साथ, नंदी, सूर्य देव, छठ पूजा समेत तमाम देवी-देवता और पर्व त्योहार डाले गए हैं. कहानी का नायक है ऋषि. जो कि देवांचल नाम के काल्पनिक प्रदेश का रहने वाला है. मगर मुंबई में अपनी पत्नी ममता के साथ सेटल्ड है. प्रैक्टिकल और साइंटिफिक टेंपरामेंट वाला आदमी है. फिल्म उस नायक और दर्शक को एक करने की कोशिश करती है. उसे लगता है कि फिल्म में जो कुछ भी घट रहा है, उससे उनके हीरो की तरह पब्लिक का भी नज़रिया बदल जाएगा. मगर ऐसा हो नहीं पाता. कोई भी चीज़ स्टिक नहीं करती. ये फिल्म साइंस और रिलिजन को एक दूसरे के आमने-सामने खड़ा करती है, और खुद हार जाती है. 

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'वन' का कॉन्सेप्ट काफी हद तक 'भेड़िया' से मिलता-जुलता है. 'भेड़िया' में भी एक ऐसा क्रीचर होता है, तो जंगल को प्रोटेक्ट करता है. मगर उस फिल्म का एंगल जंगल को बचाना था. यहां भी वही बात है. मगर लॉजिक अलग है. ऋषि के गांव देवांचल के लोग भी जंगल को कटने से बचाना चाहते हैं. मगर इसलिए नहीं कि उनकी हवा पानी खराब हो जाएगी. बल्कि इसलिए कि इससे उनकी वन देवी नाराज़ हो जाएंगी. यही मामला फॉल्टी साबित हो जाता है. चलिए एक बार को इस तर्क को स्वीकार भी लिया जाए. मगर उसका एक्जीक्यूशन तो ऐसा हो, जिस पर यकीन किया जा सके.

'वन' का बेसिक प्लॉट ये है कि ऋषि और ममता मुंबई में रहते हैं. उनका बच्चा नहीं हो रहा. IVF के लिए लोन लेना चाहते हैं. इसी बीच उनके गांव में एक प्रॉपर्टी से जुड़ा मैटर हो जाता है. जिस प्रॉपर्टी की बात हो रही है, वो है एक जंगल में. उस जंगल में रात को जाना मना है. क्योंकि वन देवी नाराज़ हो जाती हैं. मगर अपना हीरो ऋषि तो सेंसिबल आदमी है. ऐसे में वो गांव वालों की बात मान लेगा या जंगल जाकर खुद चेक करेगा कि क्या दिक्कत है? ऋषि दोनों चीज़ें कर डालता है. अब क्या-कैसे इसमें हम नहीं पड़ना चाहते, आप खुद फिल्म देखकर पता लगाइए.

'वन' फिल्म में फैंटसी, हॉरर, थ्रिलर, रिलीजस, क्रीचर हर फॉरमूला फिट किया गया है. वो अलग बात है कि इसमें कोई भी चीज़ फिट नहीं हो पाई. कहानी के लेवल पर ये बहुत ही कमजोर फिल्म है. बतौर दर्शक कोई भी चीज़ इतनी इंट्रेस्टिंग नहीं बन पाती, जो आपका ध्यान आकर्षित करे. या थोड़ी देर के लिए आपको एंटरटेन कर पाए. क्योंकि यहां कभी भी, कुछ भी हो सकता है. जिसका डायरेक्ट्ली नैरेटिव से कोई लेना-देना ही नहीं है. मसलन, फिल्म में मनीष पॉल के पात्र वेद प्रकाश वाला हिस्सा है. वो आदमी फिल्म में सिर्फ इसलिए है ताकि ऑडियंस से कुछ भी करके लाफ्टर निकलवाया जा सके. और वो उसमें भी नाकाम हो जाती है. क्योंकि उस आदमी के ह्यूमर का लेवल स्कूल के बच्चों से भी कमतर है. गांव की एक बूढ़ी महिला और वेद प्रकाश के बीच कुछ बेहद ही अटपटे और अनफनी सीन्स हैं. जो आपके धैर्य की परीक्षा लेते हैं.

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आपको ये मालूम पड़ता है कि 'पंचायत' जैसी सीरीज़ बनाने वाली टीम एक फिल्म बनाने जा रही है. तो ज़ाहिर तौर पर उस फिल्म से आपकी उम्मीदें बढ़ जाती हैं. आपको लगता है कि आप कोई ऐसी चीज़ देखेंगे, जो आपने शायद पहले कभी नहीं देखा हो. या उस पर्सपेक्टिव से नहीं देखा हो. मगर 'वन' वो फिल्म कभी नहीं लगती. ये बात ठीक है कि वेब सीरीज़ और सिनेमा, दो बिल्कुल ही अलग किस्म के माध्यम हैं. कभी-कभी आपको ऐसा लगता है कि दीपक कुमार मिश्रा के साथ भी वही दिक्कत पेश आई, जो 'बॉम्बे वेल्वेट' में अनुराग कश्यप को आई थी. शायद वो उस बजट और स्केल की फिल्म को हैंडल नहीं कर पाए.

ये फिल्म इतने डिपार्टमेंट्स में मार खाती है कि भयंकर खराब VFX टॉप 3 में भी जगह नहीं बना पाता. अव्वल, तो एंबिशस कॉन्सेप्ट को उस तरह से बरता नहीं गया, जो वो डिजर्व करता था. अन-कन्विंसिंग कहानी और उसमें बिखराव सबसे प्रमुख समस्या के तौर पर उभरते हैं. तीसरी चीज़ है फिल्म में एक्टर्स की परफॉरमेंस. सिद्धार्थ मल्होत्रा से आप कुछ खास एक्सपेक्ट करके नहीं जाते. और आप सही साबित होते हैं. क्योंकि वो कुछ फ्रेश डिलीवर भी नहीं करते. तमन्ना के हिस्से बच्चे की भूख और छठ पूजा से ज़्यादा कुछ आया नहीं है. अनूप सोनी को आगे से अपनी फिल्मों के चुनाव में सावधान और सतर्क रहना चाहिए. श्वेता तिवारी और सिद्धार्थ के कुछ सीन्स ठीक लगते हैं. मगर वो देवर-भाभी वाला डायनैमिक भी अच्छे से खुलकर नहीं आता. ऐसे में सबकुछ टिक जात है विलन के कंधों पर. वैसे तो इस फिल्म के असली विलन इसके मेकर्स हैं. मगर सिनेमैटिक विलन का रोल सुनील ग्रोवर ने किया. सुनील अच्छे कॉमेडियन हैं. जितना सीरियस काम किया है, उसमें भी संजीदा लगे हैं. मगर यहां वो बहुत मिसकास्ट लगते हैं. उनका कैरेक्टर कभी इतना मजबूत होता ही नहीं है कि उसके भरोसे फिल्म छोड़ दी जाए.

कैरेक्टराइजेशन में भी आपको कई लूपहोल्स मिलते हैं. जैसे सिद्धार्थ के कैरेक्टर के पास कुछ सुपरह्यूमन वाले पावर्स हैं. जिसकी वजह से वो कुछ अनदेखी शक्तियों को हरा देता है. मगर ये उसका पुनर्जन्म है. अगर उस कैरेक्टर के पास सुपरपावर था, तो वो पिछले जन्म में मरा कैसे? वन देवी की अधपकी सी बैकस्टोरी आपको बताई जाती है. वन देवी हो या भूतक, इन दोनों को ही कभी कंप्लीट फिजिकल फॉर्म में नहीं दिखाया जाता. बस आपको बताया जाता है कि ये लोग बहुत पावरफुल हैं. अब जो चीज़ एग्जिस्ट ही नहीं करती, उस पर मैं कैसे भरोसा कर लूं. इस फिल्म की सबसे बड़ी खामी ही ये है ये आपको कभी कन्विंस नहीं कर पाती.  

मेरे एक्सपीरियंस में 'वन' पिछले कुछ समय में आई सबसे बुरी फिल्मों में से एक है. वो क्या करना चाहती है, क्या कहना चाहती है, ये उसे खुद नहीं मालूम. वो बहुत कंफ्यूज़ लगती है. फिर कई बार शानपत्ती करती सी लगती है. सबकुछ करके भी वो एक झेलेबल फिल्म नहीं पाती.  

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