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"मो. रफ़ी साहब की माइक पर जो आवाज़ थी, अरे बाप रे...!"

सुरेश वाडकर ने रफ़ी को याद करते हुए कहा- "आज भी हम लोग जो जीते हैं ना, उन्हीं के गानों को सुनते-सुनते जीते हैं.”

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सुरेश वाडकर ने बताया कि जब मोहम्मद रफ़ी गााते थे, तो लगता था जैसे पूरा वातावरण गा रहा है.

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  • सुरेश वाडकर ने 1978 में मोहम्मद रफ़ी के साथ फिल्म 'अनपढ़' की एक कव्वाली में पहला और एकमात्र गाना गाया था, जिसमें आशा भोसले भी थीं।
  • सुरेश वाडकर ने मोहम्मद रफ़ी की आवाज़ और उनके व्यवहार को याद करते हुए बताया कि रफ़ी साहब ने उन्हें अपने सेक्रेटरी के माध्यम से उनकी गायकी की प्रशंसा की थी।
  • सुरेश वाडकर ने अपने लंबे करियर में कई यादगार फिल्मों में गाने गाए और 2020 में संगीत क्षेत्र में योगदान के लिए पद्मश्री पुरस्कार प्राप्त किया।

Suresh Wadkar ने Mohammad Rafi और Lata Mangeshkar जैसे दिग्गजों के साथ भी गाने गाए हैं. और उनसे जुड़े कई किस्से उनकी यादों में जज़्ब हैं. पिछले दिनों जब सुरेश वाडकर दी लल्लनटॉप के ख़ास कार्यक्रम गेस्ट इन द न्यूज़रूम में आए, तो रफ़ी साहब की शख़्सियत के बारे में ख़ूब बातें कीं. वो कैसे बातें करते थे. कैसे गाते थे. अपने साथी कलाकारों के साथ कितनी मोहब्बत से पेश आते थे, ये सब बताया. 

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मो. रफ़ी के मिज़ाज़ के बारे में उन्होंने कहा,

“रफ़ी साहब तो, अल्लाह मियां की गाय तरह थे. बहुत सीधे. निहायत ही शरीफ़. और बोलना तो उनका ऐसा कि आमने-सामने बैठे हैं, तो भी ज़रा आगे आकर सुनना पड़े. मगर माइक पर जो आवाज़ थी उनकी, अरे बाप रे... ऐसा लगता था कि पूरा एटमॉस्फियर गा रहा है. क्या उनकी वॉइस की जो फेंक थी. जो थ्रो था. ये नहीं कि चिल्ला-चिल्ला के गा रहे हैं.”

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सुरेश वाडकर ने रफ़ी साहब के साथ पहला गाना साल 1978 में गाया. और ये रफ़ी के साथ उनका पहला और एकमात्र गाना है. इस बारे में सुरेश वाडकर ने बताया, 

“रफ़ी साहब के साथ मुझे एक ही गाना गाने का मौक़ा मिला. एक फिल्म आई थी अनपढ़. एस. एम. सागर साहब की फिल्म थी, और वो कव्वाली थी. मैं रफ़ी साहब और आशा ताई के साथ गा रहा था. तो मुझे बुलाया उन्होंने. बोले- ‘सुरेश इधर आओ’. एक दम प्यार से बात करते थे. बोले- ‘कहां रहते हो. मैंने आपका गाना सुना है. आप बहुत अच्छा गाते हो’. फिर गाना ख़त्म हुआ, तो मैं सम्मान के नाते उन्हें नीचे गाड़ी तक छोड़ने गया. गाड़ी में बैठकर वो चले गए. रास्ते में उन्होंने, उनके सेक्रेटरी जो उनके साले साहब भी थे. ज़हीर भाई, उनसे कहते हैं- ‘ज़हीर तुम्हें मालूम है, कि जैसे अभी सुरेश की आवाज़ है ना, इसकी उम्र में मेरी आवाज़ भी ऐसी ही थी'. कितना बड़ा आशीर्वाद है मेरे लिए. ज़हीर भाई ने घर पहुंचते ही मुझे फोन किया. बोले- ‘सुरेश जी. साहब बहुत ख़ुश थे. गाड़ी में पूरे समय वो आपकी तारीफ़ कर रहे थे. मैंने इसीलिए आपको फोन किया’. मैं तो धन्य हो गया.”

मोहम्मद रफ़ी जैसे कलाकार से तारीफ़ पाने की अनुभूति कैसी थी, ये बताते हुए सुरेश वाडकर ने आंखें बंद कीं. एक पॉज़ लिया और अपने सीने पर दोनों हाथ रख कर कहा,

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“कितने बड़े आदमी का आशीर्वाद मिला. इतने बड़े आदमी का आशीर्वाद. और एक गायक को क्या चाहिए? रफ़ी साहब ने तारीफ़ कर दी. आज हम लोग जो जीते हैं ना, आज भी... वो उन्हीं के गानों को सुनते-सुनते जीते हैं.”

और इसी कड़ी में आज के दौर के अपने पसंदीदा गायकों का ज़िक्र करते हुए बोले, 

“आज देखिए, अरिजीत कहिए या सोनू कहिए, श्रेया भी है, सुनिधि भी है. इतना फाइन काम करने वाले बच्चे हैं ये. मगर उनको जो परोसा जाता है, वही तो खाना पड़ेगा उनको. बीच-बीच में कुछ गाने इनके बहुत अच्छे आ जाते हैं. मगर पहले के गाने आज भी ज़िंदा हैं. और हमेशा रहेंगे.”

सुरेश वाडकर ने पहला फिल्मी गाना साल 1977 में गाया. उन्हें पहला मौक़ा दिया म्यूजिक डायरेक्टर रवींद्र जैन ने. गाना था फिल्म 'पहेली' से 'सोना करे झिलमिल-झिलमिल...' ('वृष्टि पड़े टापुर टुपुर'). इसके बाद उन्होंने ‘प्यासा सावन’, ‘प्रेम रोग’, ‘मासूम’, ‘डिस्को डांसर’, ‘सदमा’ और ‘उत्सव’ जैसी यादगार फिल्मों के गाने गाए. ‘रंगीला’, ‘सत्या’, ‘माचिस’ और ‘कमीने’ में भी उनके गाए गीत मशहूर हुए. संगीत के क्षेत्र में इस योगदान के लिए उन्हें साल 2020 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया.

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