भोरहरी वाला क्रिकेट मैच
भले ही स्कूल के लिए जगने में हम आना-कानी करते थे. लेकिन संडे के दिन दूसरे मोहल्ले के चिंटू गैंग से मैच खेलना होता था, तो आंखें भोरहरी के चार बजे ही खुल जाती. और फिर मोटे चक्के वाली रेंजर साइकिल के करियर में बैट दबा कर निकल लेते दो-दो हाथ करने.
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खास कपड़े और स्पेशल खाना
हफ्ते के 6 दिन कैसे भी कपड़े क्यों न पहने. संडे का ड्रेस स्पेशल होता था. मम्मी अलमारी से बाहर जाने वाले कपड़े पहनने को देती थी. खाना भी स्पेशल होता था. पूड़ी, आलू-चने की सब्जी और हलवा या खीर. पेट से ज्यादा खाने के बाद भी सीरियल के बीच में ऐड के वक्त कटोरी खीर या सब्जी से भर लाते थे. और फिर मजे से खाते थे.
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रामायण और महाभारत
ये होता था इंटरटेंमेंट पैकेज. 9 बजे गली में एक बच्चा नहीं दिखता था. सारे टीवी से जो चिपके पड़े होते थे. 9 से 10 का वक्त ऐसा होता था कि न तो कोई यार-दोस्त घर पर बुलाने आते थे. अगर गलती से कोई मिलने आ गया तो उसको भी पकड़ कर घर में बिठा लेते थे. और जबतक खत्म नहीं होता, चिपके रहते थे टीवी से. सूसू तक नहीं जाते थे.
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कैरमबोर्ड और लूडो
इसे मत भूलो यार. बेस्ट इंडोर गेम्स के अवॉर्ड से सम्मानित है. रामायण और महाभारत का एंटरटेंमेंट डोज लेने के बाद मन कमरे की खूंटी पर टंगे कैरमबोर्ड या फिर अल्मारी पर रखे लूडो के लिए ललचता था. भाई बहनों के सात पार्टी बना लेते और खेलते. और अगर भाई-बहन तैयार नहीं होते तो धर लाते पड़ोसियों के बालकों को. दो-तीन घंटे शिद्दत से खेल में जुटे रहते. बीच-बीच में मम्मी का कमेंट भी आ जाता, होमवर्क कब करोगे. करोगे भी या नहीं. कल डायरी में हम नहीं लिखेंगे की बच्चा मेरा बीमार था. इसलिए होमवर्क नहीं किया.
तीन घंटे का पावर नैप
सुबह से चल रही मौज-मस्ती पर विराम तब लगता था, जब खुद की मम्मी और पड़ोसियों की भी, आ कर अपने-अपने बच्चों को लंच कराने के लिए ले जाती थी. लंच काल होता था. उसके बहाने खेल चौपट. सब चले जाते और फिर लंच कर के मम्मी तीन घंटे का पावर नैप दिलाती थी. कुछ भी कर लो ये पावर नैप तो मिलना ही मिलना होता था. बच नहीं सकते थे आप. छुटपन में हम इससे बहुत भागते थे. मम्मी के सो जाने पर निकल लेते थे खेलने के लिए. और आज यही नैप के लिए हम तरसते हैं.
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मोहल्ले में वो पिट्टो और कंचे खेलना
पावर नैप से रिचार्ज होने के बाद आंख खुलते ही दिमाग वापस से खेल की तरफ ही होता था. अंखियों का कीचड़ बिना साफ किए निकल पड़ते थे मोहल्ले में पिट्टो और कंचे खेलने. दो-चार तो पहले से होते थे. बाकी को घर-घर जा कर इकट्ठा कर लाते थे. और शाम तक खेलते रहते.
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