वीरप्पन के खतरे को बड़ा कर दिखाने के लिए कभी फिल्म उसके श्रीलंकाई एलटीटीई से कथित संबंधों का हवाला देती है. कभी स्कल कैप पहने, ताबीज़ बांधे 'आतंकवादियों' को उसका सहयोगी बनाकर उतार देती है. पूरी कोशिश है कि किसी तरह दर्शक उसे 'अन्तरराष्ट्रीय आतंकी नेटवर्क' से जोड़कर देख ले. आज के दर्शक के सामने अपराधी का कद शायद ऐसे ही बड़ा होता है.
वैसे ये तो मानना पड़ेगा कि वीरप्पन की भूमिका में संदीप भारद्वाज अॉन फेस वैल्यू एकदम कमाल कास्टिंग है. उनकी बड़ी मूंछे अौर चौड़ी आंखें किसी तस्करी में उठाए हाथी का सा लुक देती हैं. लेकिन उनके संवाद उन्हें डुबो देते हैं. कहानी की शुरुआत चंदन तस्कर वीरप्पन के हाथों एक पुलिसवाले की नृशंस हत्या से होती है. फिर कहानी फ्लैशबैक में जाती है अौर वीरप्पन का कल्ट क्यों अौर कैसे बना, इसका कुल जमा हाल दर्शकों के सामने रखती है. फिल्म की कहानी मुख्य रूप से उसे पकड़ने के लिए बनी स्पेशल टास्क फोर्स की टीम के अभियानों के इर्द-गिर्द घूमती है. वीरप्पन 2004 में मारा गया था. उसके पहले चलाए गए अर्धसैनिक बलों अौर पुलिस के असफल अौर सफल धरपकड़ अभियान ही राम गोपाल वर्मा के 'वीरप्पन' की कथावस्तु हैं. पुलिस टीम के कप्तान की भूमिका में यहां बिजनसमैन से फिल्मों में हीरो बनकर एंट्री लेने वाले सचिन जोशी हैं.
इसके अलावा फिल्म में भय पैदा करने के लिए कुछ टिपिकल किरदार हैं. जैसे एक ही अांख खोलने वाला किरदार, कुछ अजीब सी गर्दन मटकाने वाला किरदार, सिर पर ताबीज पहनने वाला आतंकी किरदार. इसके अलावा एक अौर अजीब बात है, जब भी कोई गंभीर किस्म का सीन आता है, किरदार अजीब-अजीब से चश्मे लगा लेते हैं. क्यों, इसका रहस्य में जान नहीं पाया. अलबत्ता कई सीन में मुझे लगा कि इसकी वजह ये है कि इतना बुरा काम करने के बाद वे दर्शकों से नज़रें भी नहीं मिलाना चाहते, इसलिए ऐसा कर रहे हैं.
अौर फिल्म में लीजा रे हैं. हां, वही 'कसूर' वाली लीजा रे. वही 'वॉटर' वाली लीजा रे. वो फिल्म में क्यों हैं इसकी कोई ठोस वजह समझ नहीं आती. शायद उनका कोई पुराना उधार राम गोपाल वर्मा या फिल्म के निर्माताअों पर बकाया होगा. 'वीरप्पन' में अभिनेत्री लीज़ा रे ने मराठी अभिनेत्री उषा जाधव के साथ स्क्रीन शेयर किया है. उषा जाधव यहां वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी की भूमिका में हैं अौर लीजा रे पुलिस की अंडरकवर जासूस की भूमिका में, जो मुथुलक्ष्मी की दोस्त बनकर उससे वीरप्पन से जुड़े राज उगलवाना चाहती है. फिल्म का बहुत सारा हिस्सा इन्हीं दोनों किरदारों के इर्द गिर्द घूमता रहता है. इस हद तक कि अपनी ही कहानी में खुद वीरप्पन किसी एक्सट्रा सा लगने लगता है.
फिल्म में लीजा रे का अभिनय साक्षात एक्टिंग की मास्टरक्लास है. याने, आप उन्हें देखकर साफ़ अौर सही तरीके से सीख सकते हैं कि सिनेमा के परदे पर कैसे-कैसे एक्टिंग नहीं करनी चाहिए.
बल्कि उनका अभिनय देखकर तो मुझे गांधीजी की किंग जॉर्ज पंचम से हुई मुलाकात याद आ गई. ये इतिहास की किताब से निकाला एक पुराना किस्सा है. 1931 का साल था, गोलमेज सम्मेलन के लिए तमाम भारतीय नेता ब्रिटेन में इकट्ठा हुए थे. उन्हीं दिनों महात्मा गांधी को किंग जॉर्ज पंचम ने मिलने के लिए बकिंघम पैलेस बुलाया. गांधी अपने सफेद शॉल को उल्टा लपेटकर राजा के महल जा पहुंचे. बदन पर अौर एक कपड़ा नही. जब उनसे प्रेस ने पूछा, 'क्या राजा से मिलने के लिए आपने बदन पर पर्याप्त कपड़े पहने थे?' तो जवाब में गांधी ने कहा, 'दरअसल राजाजी ने जितने कपड़े पहन रखे थे वो हम दोनों के लिए पर्याप्त थे'. उषा जाधव भी यहां गांधी जी वाली बात कह सकती हैं. लीजा ने यहां बिल्कुल ऐसा ही अभिनय किया है, जो फिल्म में उनके सामने मौजूद उषा जाधव के लिए भी पर्याप्त है. गौर से देखियेगा, लीज़ा के चेहरे के पोर पोर से अभिनय टपक रहा है फिल्म में.
सामान्यत: कलाकार एक्सप्रेशंस की क्वालिटी देखा करते हैं, यहां लीजा ने क्वालिटी की परवाह छोड़कर क्वांटिटी में एक्सप्रेशंस दिए हैं. घर की टेबल पर खाना खाते हुए जहां वे 'अंजान बनने' अौर 'सब कुछ जाने लेने' के एक्सप्रेशंस बारी-बारी से साथ में देती हैं, वो सीन तो क्लासिक है! उषा जाधव का तुलनात्मक रूप से कहीं बेहतर अभिनय लीजा रे की इस निरंतर एक्सप्रेशंस की गोलीबारी में पूरी तरह नज़रअन्दाज हुआ है, बल्कि कहना चाहिए 'खेत रहा' है.
जिन दृश्यों में सचिन जोशी या लीजा रे परदे पर हैं (अौर ऐसे दृश्य बहुत सारे हैं) वहां उन्होंने अभिनय की साक्षात गंगा-जमुना बहा दी है. क्लाइमैक्स के सीन में जैसे वो दोनों कॉफी पीते हैं, मजाल है ज़रा भी खलल पड़ जाए. वैसे फिल्म में सब बुरा ही बुरा नहीं है. रामू की ताज़ा कुछ फिल्में जो पहले खास एंगल पर लिए 'क्लोज़ अप' शाट्स के लिए जानी जाती थी, यहां तरक्की पाकर एरियल शॉट्स की मास्टर हो गई हैं. लेकिन जंगलों के बीच अौर प्राकृतिक झरनों की छटा में भी तमाम कलाकारों के अभिनय का कच्चापन छिप नहीं पाता.
अौर अभिनय से भी ज़्यादा, यहां राम गोपाल वर्मा का नैरेटिव विज़न, उनकी 'पिंड में ब्रह्मांड' देख लेने वाली दृष्टि मिसिंग है. जब वे भी लाउड बैकग्राउंड म्यूजिक से डर पैदा करने की अौर माहौल बनाने की कोशिश करते हैं, अजीब लगता है. विश्वास नहीं होता कि यह वही निर्देशक है जिसने कभी हमें 'शिवा' अौर 'सत्या' जैसी फिल्में दी थीं, जिनकी खामोशी भी चिल्लाकर बोलती थी. नहीं, ये वो निर्देशक नहीं. नहीं, शायद वो निर्देशक हमेशा के लिए कहीं खो गया है.
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