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फिल्म रिव्यू- वेलकम टू द जंगल

'वेलकम' फ्रैंचाइज़ की तीसरी फिल्म 'वेलकम टू द जंगल' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

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'वेलकम टू द जंगल' को नीरज वोरा ने लिखा है.

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  • फिल्म 'वेलकम टू द जंगल' में अक्षय कुमार ने एक फ्लॉप एक्टर का रोल निभाया है, जो एक बिज़नेसमैन के टैक्स बचाने के लिए महाफ्लॉप फिल्म बनाता है।
  • फिल्म की कहानी एक बिज़नेसमैन पर केंद्रित है जो टैक्स बचाने के लिए इंडस्ट्री के खराब हालात वाले कलाकारों को हायर करता है, जो कॉमेडी की वजह बनती है।
  • फिल्म का एडिटिंग टीम द्वारा पौने तीन घंटे के क्रेजी मैटेरियल को एक समेकित फिल्म में बदल दिया गया है, जिससे इसकी गति में कमी नहीं आती।

फिल्म- वेलकम टू द जंगल
डायरेक्टर- अहमद खान
एक्टर्स- अक्षय कुमार, सुनील शेट्टी, दिशा पाटनी, जैकलीन फर्नांडिस, अरशद वारसी, जैकी श्रॉफ, जॉनी लीवर, राजपाल यादव, रवीना टंडन
रेटिंग- 2.5 स्टार

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'वेलकम टू द जंगल' उस किस्म की फिल्म है, जो न खुद को गंभीरता से लेती है, न ये चाहती है कि आप उसे सीरियसली लें. मज़े और बॉक्स ऑफिस के लिए बनी है. और अपना मक़सद साध जाती है. अगर आपने फिल्म का ट्रेलर देखा है, तो आपको मालूम है कि इस फिल्म से क्या एक्सपेक्ट करना है. इसलिए जितनी कम उम्मीद लेकर जाएंगे, उतने एंटरटेंड होकर लौटेंगे.

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प्रेमिस ये है कि एक बिज़नेसमैन है, टैक्स देने से बचना चाहता है. धंधे में लॉस दिखाने के लिए वो 2000 करोड़ रुपये लगाकर एक महाफ्लॉप फिल्म बनाना चाहता है. इसके लिए वो इंडस्ट्री के सबसे खराब और लुट पिट चुके लोगों को हायर करता है.

देव और दास नाम की डायरेक्टर जोड़ी, जो काम की कमी के कारण रीलें बनाती है. एक फ्लॉप स्टार जो अब भोजपुरी फिल्मों में आइटम बॉय बन गया है. नैनसुख नाम का सिनेमैटोग्राफर, जिसे कुछ दिखाई नहीं देता. प्रोड्यूसर की बेटी फिल्म की हीरोइन बनती है. आपको साफ नज़र आता है कि ये फिल्म क्या करना चाहती है. फिल्म इंडस्ट्री के काम करने के तौर-तरीकों पर टिप्पणी या तंज. मगर इतने अच्छे सेट अप के बाद वो अपने रेगुलर ओवर द टॉप और डंब ज़ोन में चली जाती है. आपको लगता है कि इतना बढ़िया मौका मेकर्स ने गंवा दिया. मगर मेकर्स ने शायद इस विषय को कभी उस चश्मे से देखा ही नहीं.

उन्होंने 'ट्रॉपिक थंडर' का बेसिक आउटलाइन लिया और उसे नीरज वोरा की दुनिया में घोल दिया. इसके बाद वो सेल्फ डिप्रेकेटरी ह्यूमर, मेटा रेफरेंस और एक्टर्स की पुरानी फिल्मों के रीहैश्ड डायलॉग से लबरेज फिल्म बन जाती है. मिलिट्री और देश प्रेम के इर्द गिर्द बनी फिल्मों का मौसम है. ऐसे में फिल्म का एक हिस्सा उसके लिए भी रिज़र्व रखा जाता है.

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फिल्म में इतने वन लाइनर्स नहीं हैं, जितने एक्टर्स कास्ट किए गए हैं. जोक्स लैंड न हो, तो ढेर सारे हैलीकॉप्टरों का प्रबंध है.

ब्रेनरॉट कॉमेडी, जिसके लिए आपको ज़्यादा दिमाग खर्च करने की ज़रूरत नहीं. मगर मज़ेदार. फिल्म में फरीदा जलाल और किरण कुमार के सीन्स सबसे फनी हैं. फरीदा ने उस गांव की बूढ़ी महिला का रोल किया है, जहां ये एक्टर्स फिल्म की शूटिंग करने गए हैं. यहां एक कन्फ्यूजन पैदा होता है, जो इस कहानी का क्रक्स बनता है.

एक्टर्स की नैतिकता और मानसिकता दोनों को कटघरे में खड़ा किया जाता है. फिल्म में अक्षय ने उस हीरो का रोल किया है, जो अपनी जान बचाने के गांव वालों की जान दांव पर लगाने के लिए तैयार है. एक सीन में राजीव नाम का उनका किरदार कहता है,

"मैं कोई आर्मीवाला नहीं हूं. देशभक्ति से मुझे कोई लेना देना नहीं. मैं एक भांड हूं, जो नाच गाकर पैसे कमाता है. इसलिए मुझे जाने दो."

ये लाइन अक्षय के हिस्से आई है, जो इसे और मारक और काफी हद तक सेल्फ रेफ़रेंशियल बनाती है. अक्षय ने इस फिल्म ने एक फ्लॉप एक्टर का रोल किया है. फिल्म के एक प्रमोशनल इंटरव्यू के दौरान एक जर्नलिस्ट ने उनके इस किरदार को उनके असल लाइफ से जोड़ने की कोशिश की. जिसे अक्षय ने ये कहकर खारिज कर दिया कि वो एक कैरेक्टर है. वो उसकी असल लाइफ से प्रेरित नहीं है. जिस डायलॉग का हमने ऊपर ज़िक्र किया, वो बात भी अक्षय इसी तर्क से गिरा सकते हैं. मैंने इसीलिए कहा कि ये बिना दिमाग लगाए देखने वाली फिल्म है. अगर आप दिमाग लगाने लगे, तो बहुत सारी चीज़ें रीड की जा सकती हैं. मगर फिल्म खत्म होने तक उसका कोई निष्कर्ष नहीं निकलेगा.

'वेलकम टू द जंगल' अक्षय की कॉमेडी की दूसरी पारी में आई पिछली सभी फिल्मों से बेहतर है. फनी है. बोझिल नहीं लगती. पौने तीन घंटे की फिल्म होने के बावजूद ये इसके पेस में कमी नहीं आती. इसके लिए फिल्म के एडिटर नितिन पाठक की तारीफ होनी चाहिए. कि उन्होंने इस क्रेजी रॉ मैटेरियल से ये फिल्म काटकर निकाली है. मगर इसे एंजाय करने के लिए आपको अपना इंटेलेक्ट सरेंडर करना होगा. अगर आप रेडी हैं, तो वेलकम टू द जंगल! 

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