यशवंत सिन्हा ने 27 सितंबर को इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है- "I need to speak up now". अटल बिहारी सरकार में विदेश और वित्त जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के सदर रहे सिन्हा का ये लेख तेजी से शेयर हो रहा है. पढ़ने वाले अपने-अपने तरीके से इसका मतलब निकालेंगे, लेकिन सियासी गलियारों में इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और वित्तमंत्री अरुण जेटली की कार्यक्षमता और सूझ-बूझ पर सीधे हमले के तौर पर देखा जा रहा है.
यशवंत सिन्हा के आर्टिकल की खास बातें, जिन पर BJP में भसड़ मची है
'जेटली शिद्दत से कोशिश कर रहे हैं कि देश के लिए प्रधानमंत्री की तरह करीब से गरीबी देखें.'


आइए जानें, यशवंत सिन्हा ने क्या लिखा है:
#1. वित्तमंत्री द्वारा भारतीय अर्थव्यवस्था की दुर्गति पर अगर मैं अब भी नहीं बोला, तो ये राष्ट्रीय कर्तव्य के प्रति मेरी विफलता होगी. अरुण जेटली इस सरकार के सबसे बेहतरीन और प्रतिभावान इंसान हैं. 2014 के चुनाव से पहले ही ये निर्णय लिया जा चुका था कि अगर सरकार बनती है, तो वही अगले वित्तमंत्री होंगे. उनका अमृतसर से चुनाव हराना भी उनके वित्तमंत्री बनने के आड़े नहीं आया.
किसी को याद आ सकता है कि 1998 का चुनाव हारने पर अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने दो सबसे भरोसेमंद साथियों प्रमोद महाजन और जसवंत सिंह को मंत्री बनाने से इनकार कर दिया था. प्रधानमंत्री मोदी ने जेटली को न सिर्फ वित्तमंत्री बनाया, बल्कि विनिवेश, रक्षा और कॉरपोरेट अफेयर्स जैसे विभाग भी दिए. इन चार में तीन मंत्रालय अब भी उनके पास हैं. वित्त मंत्रालय संभालने के नाते मैं ये कह सकता हूं कि अरुण जेटली जैसा सुपरमैन भी काम के साथ न्याय नहीं कर सकता.

वित्तमंत्री अरुण जेटली और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
#2. उदारीकरण के बाद जेटली वित्तमंत्री बनने वाले सबसे खुशकिस्मत इंसान थे. कच्चे तेल के दाम गिरने की वजह से करोड़ों रुपए आए, जिन्हें अकल्पनीय तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता था. रुके प्रॉजेक्ट्स और बैंकों की NPAs की समस्याएं थीं, जिन्हें कच्चे तेल की तरह अच्छी तरह मैनेज करना था. लेकिन तेल की कमाई बर्बाद हो गई और विरासत में मिली समस्याओं को न सिर्फ पनपने दिया गया, बल्कि वो बद्तर हो गईं.

वित्तमंत्री अरुण जेटली
#3. आज भारतीय अर्थव्यवस्था की हालत क्या है? निजी निवेश दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर है, औद्योगिक उत्पादन ढह गया है, खेती संकट में है, रोजगार का बड़ा स्रोत कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री पस्त है, निर्यात घटा है, नोटबंदी दुर्घटना साबित हो चुकी है, बुरी तरह लागू हुए GST की वजह से कई व्यापार डूब गए और लोगों की नौकरियां चली गईं और लेबर मार्केट में बमुश्किल काम मिल रहा है.

#4. अर्थव्यवस्था की वृद्धि-दर तिमाही दर तिमाही गिरते हुए इस वित्तीय वर्ष की शुरुआत में 5.7% पर पहुंच गई, तो तीन साल में न्यूनतम है. इसके लिए नोटबंदी को जिम्मेदार न मानने वाले सरकारी प्रवक्ता सही हैं, क्योंकि मंदी तो पहले ही शुरू हो गई थी. नोटबंदी ने तो सिर्फ आग में घी डाला है. मौजूदा सरकार ने 2015 में जीडीपी की विकास दर मापने का मैथड बदल दिया था, जिसकी वजह से शुरुआत में बढ़त दिखी. पुराने मैथड से जोड़ें, तो अभी वृद्धि दर 5.7% नहीं, बल्कि 3.7% से भी कम है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
#5. बीजेपी अध्यक्ष ने विकास दर के पीछे टेक्निकल रीजन बताया था, जबकि SBI चेयरमैन का बयान इससे ठीक उलट है. प्रधानमंत्री परेशान हैं. वित्तमंत्री को जिस वृद्धि-दर बढ़ाने के लिए जिस पैकेज का वादा किया गया था, वो अभी तक नहीं आया है. प्रधानमंत्री की तरफ से नया सिर्फ इतना हुआ है कि इकॉनमिक अडवाइजरी काउंसिल बनाई गई है. पांडवों की तरह वो बस युद्ध जीतने का इंतजार कर रहे हैं.

बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह
#6. ये मॉनसून अच्छा नहीं बीता है, जो ग्रामीण इलाकों में हालात और बुरे करेगा. किसानों का पैसों में कर्ज माफ हो रहा है और 40 बड़ी कंपनियां दीवालिया होने की स्थिति झेल रही हैं. छोटे-मंझले उद्योग परेशानी में हैं. विपक्ष में रहते हुए हमने रेड-राज का विरोध किया था, लेकिन आज सरकार इसी रास्ते पर चल रही है.
#7. अर्थव्यवस्था जैसे बनाई जाती हैं, उससे कहीं आसानी से ध्वस्त की जा सकती हैं. 1998 में हमें जो अर्थव्यवस्था विरासत में मिली थी, उसे सुधारने में चार साल और कड़ी मेहनत लगी थी. जादू की छड़ी किसी के पास नहीं है, जो एक रात में सब ठीक कर देगी. फैसलों का नतीजा आने में वक्त लगता है, तो अगले लोकसभा चुनाव से पहले किसी सुधार की उम्मीद बहुत मुश्किल है.

अटल सरकार में वित्तमंत्री रहे यशवंत सिन्हा
#8. प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उन्होंने गरीबी बहुत नज़दीक से देखी है. उनके वित्तमंत्री पूरी कोशिश कर रहे हैं कि सारे भारतीय गरीबी को करीब से देखें.
यशवंत सिन्हा का पूरा आर्टिकल इंग्लिश में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें
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