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फ़िल्म रिव्यू : कालाकांडी

सैफ़ अली खान, दीपक डोबरियाल, विजय राज़ की फ़िल्म.

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फोटो - thelallantop
एक आदमी है. मुंबई में रहता है. किसी अच्छे बैंक में वाइस प्रेसिडेंट है. पैसे वाला है. डॉक्टर के पास जाता है. मालूम पड़ता है कि जो पेट का अल्सर समझा जा रहा था, असल में कैंसर था. पेट का कैंसर. आदमी परेशान. उसने जीवन में 'कुछ नहीं किया था.' इतनी अच्छी डायट फॉलो करता था की परफेक्शन भी शर्मा जाए. लेकिन उसको कैंसर निकल आया. अब क्या करे? उसके पास 3 महीने हैं जीने के लिए. लेकिन इस समय में वो जीना चाहता है. वैसे नहीं जैसे वो अब तक जीता आया है. बल्कि वैसे जैसे जीने में उसे मज़ा आए. क्यूंकि अब उसका डर ख़त्म हो चुका था. इस दौरान वो क्या क्या करता है, इसकी कहानी है कालाकांडी. एक लड़का है, एक लड़की है. दोनों एक दूसरे से प्यार करते हैं. लड़की अमरीका जा रही है अपनी पीएचडी करने. जाने से पहले वो एक बर्थडे पार्टी में जाते हैं. किसी क्लब में. वहां पुलिस की रेड पड़ जाती है जो ड्रग्स की तलाश में है. पुलिस लड़की को घंटे भर में फ्लाईट पकड़नी है लेकिन पुलिस है कि पूरी जांच किये बिना जाने नहीं देगी. वो और उसके दोस्त कैसे निकलते हैं, आगे क्या होता है, इसकी कहानी है कालाकांडी. दो फुकरे हैं. एक डॉन के लिए काम करते हैं. उसका रुपया इधर से उधर करते हैं. दोनों महत्वाकांक्षी हैं. उन्हें भी बड़ा आदमी बनना है. पैसा कमाना है. खूब सारा. वो चट चुके हैं अपने सेठ के लिए पैसा लाते-लाते. प्लान बनाते हैं कि पैसा उड़ा देंगे. कैसे उड़ायेंगे, उड़ा पाएंगे भी या नहीं, इसकी कहानी है कालाकांडी. kalakaandi ये तीनों कहानियां समानांतर रूप से चलती रहती हैं. और जैसे दो समानांतर रेखाएं इन्फिनिटी पर जाकर एक दूसरे को काटती हैं, ये तीनों कहानियां भी एक जगह पर आकर एक दूसरे का रास्ता काटती हैं. इस पूरे झोल की कहानी है कालाकांडी. सैफ़ अली खान ने पहली बार ऐसा कुछ काम किया है. बल्कि हिंदी फ़िल्मों में पहली बार ऐसा काम हुआ है. एसिड/एलएसडी (एक तरह का साइकेडेलिक ड्रग) इस फ़िल्म का ख़ास हिस्सा है. साल 1998 में एक अंग्रेजी फ़िल्म आई थी - फ़ियर एंड लोदिंग इन लास वेगस. फ़िल्म में जॉनी डेप थे जो एलएसडी के नशे में लास वेगस में घूम रहे थे. सैफ़ अली खान उसी जॉनी डेप की तरह मुंबई की सडकों पर घूम रहे थे. उन्हें मालूम चल चुका था कि  मरने वाले हैं तो वो सब कुछ ट्राई करना चाहते थे. इस चक्कर में उन्होंने एक लो-प्रोफाइल ट्रांसजेंडर सेक्स वर्कर को साथ ले लिया क्यूंकि वो नहीं जानते थे कि उसका 'प्राइवेट पार्ट' कैसा दिखता है. इस पूरे क्रम में काफ़ी ऐसी बातें होती हैं जो अलग ही लेवल का ह्यूमर लेकर आती हैं. saif ali khan फ़िल्म बहुत ही हाई क्लास है. इसे लिखने वाले वही हैं जिन्होंने डेल्ही-बेली जैसी महाअश्लील और बढ़िया फ़िल्म लिखी थी - अक्षत वर्मा. इन्होंने ही इसे डायरेक्ट भी किया है. डेल्ही-बेली के विपरीत फ़िल्म की सिचुएशन काफ़ी इंग्लिश पिक्चर है. इससे छोटे शहर वाली जनता कतई कनेक्ट नहीं करेगी. हिंदी फ़िल्मों के हिसाब से ये अच्छा एक्सपेरिमेंट ज़रूर है लेकिन इससे बहुत ज़्यादा रिटर्न की कोई गुंजाइश नहीं है. ज़मीनी चीज़ों, किरदारों की कमी और अंग्रेजी के भारी मात्रा में इस्तेमाल के चलते ज़्यादातर जगहों पर इसे कूड़ा कहकर नकार दिया जाएगा. हां, दीपक डोबरियाल और विजय राज़ के सीक्वेंस काफ़ी मज़ेदार हैं. ये दोनों डायलॉग धकेलने में माहिर हैं और दोनों को एक साथ बातें करते हुए इधर उधर फैल रही फ़िल्म में कुछ मज़ेदार पल मिलते हैं. अक्षत वर्मा को इसी लाइन पर एक फ़िल्म इन दोनों के साथ बनानी चाहिए. इसके साथ ही एक बार फिर ये स्थापित हो गया कि हिंदी गालियों के साथ विजय राज़ के सिवा और कोई न्याय नहीं कर सकता. आप अगर किसी के मुंह से गाली सुनना चाहेंगे तो वो विजय राज़ हैं और कोई भी नहीं. deepak dobriyal फ़िल्म थोड़ी ढीली है. काफ़ी शहरी है, उतनी कनेक्टिंग नहीं है. अच्छी बात ये है कि उन चीज़ों को खंगाला गया है जहां अभी तक किसी ने हाथ नहीं डाला था. इस लिहाज़ से ये एक अच्छी शुरुआत है. संस्कारी परिवार के साथ देखना तो दूर उनके सामने इसका नाम भी न लें. दोस्तों के साथ जाना चाहें तो जा सकते हैं. वो भी तब जब आप मुक्काबाज़ पहले ही देख चुके हैं और करने के लिए उर कोई काम नहीं है. बाकी सब ठीक है. आशा है वहां भी सब अच्छा होगा.

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