
लिया सिर्फ 14 साल की हैं.
कहना पड़ेगा लिया का काम फ़िल्म में सबसे उम्दा है. और हां लिया सिर्फ 14 साल की हैं. अगली हैं मक्कारी. इनकी सुपर पावर है रफ़्तार. मक्कारी को कान से सुनाई नहीं पड़ता है लेकिन रफ़्तार में बिजली से भी तेज़ है. ये भूमिका निभाई है लॉरेन रिडलॉफ ने. लॉरेन ने किरदार के लिए मेहनत की है, ये उनकी परफॉरमेंस में दिखता है. एक धावक की जिस हिसाब से मसल्स होनी चाहिए, लॉरेन ने वैसी मसल्स बना रखी हैं. अब बात सबसे ताकतवर इटर्नल गिल्गामेश की. इस रोल को किया है डॉन ली ने. अपने जॉन स्नो यानी किट हैरिंगटन ने म्यूजियम में काम करने वाले डेन व्हिटमैन का रोल किया है. इटर्नल्स लीडर अजक के रोल में हैं सलमा हायेक. सलमा का अभिनय बहुत कमाल रहा. एंड लास्ट बट नॉट द लीस्ट इंडियन एक्टर हरीश पटेल फ़िल्म में किंगो के मैनेजर करुण के रोल में हैं. हरीश के सीन कम ही हैं लेकिन जितने भी सीन में वो आए, खूब हंसाया. वी होप इस फ़िल्म के बाद उनके करियर को अच्छा बूस्ट मिलेगा. # जिसकी फिल्म उसी को साजे 'इटर्नल्स' के साथ वही हुआ, जो आज से दस साल पहले 'रा वन'के साथ हुआ था. वही, जो किसी चाइनीज़ से डोसा बनवाने और मद्रासी से नूडल बनवाने पर होगा. वही, जो कॉमन मैन द्वारा पॉलिटिक्स बदलने की कोशिश में होता है. रायता फ़ैल गया. मार्वल वालो, आपको क्या लगा 'अवेंजर्स' की तरह एक और टीम खड़ी कर दोगे! जनता खुश होगी! शाबाशी देगी! इतने सारे सुपर हीरोज़ के बारे में समझने में ही 50% ब्रेन उलझ गया. किस की क्या पावर है, क्या पंगा है, बहुत देर में समझ आया. फ़िल्म में आगे कभी कैरेक्टर्स की ह्यूमन साइड को दिखाया जाता, फिर कट टू एक्शन होने लगता. ये पावर ऑन एंड ऑफ फ़िल्म को लगातार बोरिंग बनाते रहे. और हां एज़ अ इंडियन, अमेरिकन फ़िल्म मेकर्स को एक बात कहना बहुत ज़रूरी है. कि भाईसाब इंडिया में आपको सिर्फ़ गरीबी और स्लम ही नज़र आते हैं और इंडियन फ़िल्मों में सिर्फ़ रंग बिरंगे कपड़े और टिपिकल भरतनाट्यम डांस नज़र आता है क्या! फ़िल्म में कुमैल इंडियन एक्टर बने हैं. और उन्हें इतना टिपिकल इंडियन एक्टर बनाया गया है कि पूछो नहीं. जैसे अपने यहां सेवंटीज़ में होते थे उनसे भी चिरांद. हॉलीवुड वालो हमारी नई फ़िल्में देख लो यार और ये स्टीरियोटाइपिंग बंद कर दो एकदम. खैर यहां फिल्म की सिनेमेटोग्राफी और विज़ुयल इफेक्ट्स की तारीफ़ बनती है. पूरी फिल्म के दौरान काफी मनमोहक सीन्स आते हैं. फिल्म का एक यही पहलू है, जो दिल खुश करता है.

इंडियन एक्टर्स सिर्फ़ रंग-बिरंगे कपड़े पहन नाचते नहीं हैं विलायती बाबू.
# डायरेक्शन और राइटिंग में दम लगा? 'इटर्नल्स' को लिखा है मैथ्यू और रायन फिप्रो ने. सैडली राइटिंग के मामले में 'इटर्नल्स' दूर-दूर तक 'अवेंजर' के बराबर नहीं आ पाती. फिल्म का ह्यूमर बहुत ही बचकाना और पुरानी डिज्नी फिल्मों जैसा है. एक तो इतने सारे करैक्टर एक साथ फिल्म में आ जाते हैं, ऊपर से ऑडियंस से उनका सीन्स के द्वारा परिचय करवाने के बजाय ज्यादातर किरदारों का तो यूं ही बोलकर इंट्रो कर दिया जाता है.
'एटर्नल्स' को डायरेक्ट किया है ऑस्कर विनिंग डायरेक्टर क्लोई झाओ ने. इस साल दुनिया भर के सारे प्रतिष्ठित अवार्ड समारोह में क्लोई झाओ की फ़िल्म 'नोमैडलैंड' ने और क्लोई ने अपने बेहतरीन निर्देशन के लिए ढेरों इनाम जीते हैं. झाओ ने पहली बार सुपरहीरो फ़िल्म डायरेक्ट की है. और बस यहीं सबसे बड़ी गड़बड़ हो गई है. संवेदनशील फिल्में बनाने के लिए विख्यात क्लोई ने मार्वल फ़िल्मों की रीत को बरकरार रखने की कोशिश करते हुए अपना एलिमेंट डाला लेकिन फ़ॉर्मूला बुरी तरह फेल हो गया. कोशिश एकदम विफ़ल गई है. फिल्म देख ऐसा लगा, मानो किसी साइकल राइडर को स्पोर्ट्स बाइक का हैंडल पकड़ा दिया हो. फिल्म में ऐसा लगता है, जैसे पंद्रह-बीस कहानियां एक साथ चल रही हैं. बॉटमलाइन, इस फिल्म के डूबने की मुख्य वजह ढीला डायरेक्शन है. डायरेक्शन के मामले में क्लोई ने मार्वल फैन्स को बहुत निराश किया है.

एंजेलिना जोली.
# देख ली जाए ? हमारी जनरेशन मार्वल फ़िल्मों पर बड़ी हुई है. 'आयरनमैन' से लेकर 'एंडगेम' के बीच जितनी भी मार्वल फ़िल्में आईं, किसी में कम तो किसी में ज़्यादा लेकिन मज़ा सब में आया. लेकिन 'इटर्नल' पहली मार्वल फ़िल्म है, जिसमें मज़ा तो दूर की बात उल्टा दिवाली का मज़ा भी खराब हो गया. इससे ज़्यादा मज़ा तो रात की जली मोमबत्ती का बचा हुआ मोम जमा करने में आ जाता. ख़ैर हम मजबूर हैं लेकिन आप नहीं. बाकी निराश ना हों, चाहे तो कोई पुलिस वालों की पिच्चर देख लो. क्या समझे?














