फिल्म- दृश्यम: द कन्क्लूजन
डायरेक्टर- अभिषेक पाठक
एक्टर्स- अजय देवगन, तबू, जयदीप अहलावत, रजत कपूर, श्रिया सरण, प्रकाश राज, कमलेश सावंत, ईशिता दत्ता, मृणाल जाधव
रेटिंग- 3.5 स्टार
फिल्म रिव्यू- दृश्यम 3
अजय देवगन की 'दृश्यम' फ्रैंचाइज़ की आखिरी फिल्म 'दृश्यम 3' कैसी है?

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अजय देवगन की 'दृश्यम 3' पिछले पार्ट से बेहतर फिल्म है. इसलिए भी क्योंकि तीसरा पार्ट इस फ्रैंचाइज़ की आखिरी किस्त है. इसलिए मेकर्स को यहां कहानी समेटनी थी. यही सबके लिए अच्छा था. खासकर सैम के लिए. जो पहले पार्ट में मारा गया और उसके कंधे पर पिछले 11 सालों से ये फ्रैंचाइज़ चल रही है. इस बार सारा खेल ये था कि विजय सलगांवकर पकड़ा जाता है या हमेशा के लिए बरी हो जाता है.
ख़ैर, 'दृश्यम 3' की कहानी उतनी ही है. मगर हर बार की तरह उसमें ढेर सारे टर्न्स एंड ट्विस्ट आते हैं. और वो भी बिल्कुल लास्ट मोमेंट पर. किसी थ्रिलर की खूबी ये होती है कि वो दर्शकों को किन मायनों में चैलेंज करती है. उन्हें कितना सरप्राइज़ करती है. और कितना एंगेज करती है. 'दृश्यम 3' इन सभी मोर्चो पर अंक स्कोर करती है. कई बार ये कन्विनिएंट रास्ते या ईजी वे आउट चुनती है.
फिल्म और उसका नायक दोनों ही खुद को बहुत स्मार्ट समझते हैं. नायक शायद है भी. मगर फिल्म नहीं. ये एक अच्छी थ्रिलर फिल्म है. एंटरटेनिंग भी. विजय और उसकी फैमिली का ऑडियंस से जो कनेक्शन इतने बरसों में बना है, वो फिल्म को बहुत फायदा पहुंचाता है. प्लस इस फिल्म का विषय इतना सार्वभौमिक है कि सब लोग नायक की साइड पर होते हैं. ये जानते हुए कि वो गलत है. वो गलती भले ही सेल्फ डिफेंस में हुई हो या उसकी वाजिब वजह हो. मगर क्राइम तो क्राइम है. इस फिल्म और फ्रैंचाइज का सारा भार इस चीज़ पर टिका था कि इस फिल्म में विजय सलगांवकर और उसकी फैमिली के साथ क्या होता है. फिल्म उसको क्लोजर देने का काम करती है. मगर ये क्लोजर सिर्फ एक पक्ष को ही मिल पाता है. जो कि न्यायसंगत नहीं लगता. मगर एक मेनस्ट्रीम सिनेमा से आप बहुत रियलिस्टिक चीज़ें एक्सपेक्ट नहीं कर सकते. अगर आपकी कहानी का हीरो हार गया, तो फिल्म का सारा फन जाता रहेगा.
तीसरे पार्ट तक पहुंचते पहुंचते इस फ्रैंचाइज़ की स्टोरी पेपर थिन हो चुकी थी. नया कुछ बचा नहीं था ऑफर करने को. उसकी भरपाई मेकर्स ने एक्टर्स की कास्टिंग से करने की कोशिश की है. मगर वो इसमें सफल नहीं हो पाते हैं. जयदीप अहलावत इस बार नई एंट्री हैं. उन्होंने क्राइम ब्रांच के एसपी राजवीर तोमर का रोल किया है. वो अपने कैरेक्टर में एक स्वैगर और एरोगेंस लेकर आते हैं. मगर वो फिल्म का किरदार कम सूत्रधार ज़्यादा बनकर रह जाते हैं. ऐसा लगता है कि ये पूरी कहानी उन्हें पहले बता दी गई थी. अब वो बाकी एक्टर्स को वो कहानी सुना रहे हैं. क्योंकि तोमर के पात्र को मालूम सब है. मगर उसके दिमाग की बत्ती घटना हो जाने के बाद जलती है. टिपिकल पुलिस बिहेवियर!
फिल्म में एक सीन है, जब तोमर पहली बार विजय सलगांवकर से मिलता है. उस वक़्त विजय एक ऐसी सिचुएशन में है, जहां वो कुछ कर नहीं सकता. मजबूर है. क्योंकि आग उसकी फैमिली तक ऑलमोस्ट पहुंच चुकी है. दिल पर हाथ रखकर धक-धक करने वाला सीन फिल्म का सबसे थ्रिलिंग सीक्वेंस है.
'दृश्यम 3' की अच्छी बात है ये कि वो दर्शकों के दिमाग से खेलती रहती है. टेंशन बना रहता है. सस्पेंस आपको आखिर तक बांधे रखता है कि क्या पता अब क्या हो जाए! कहीं खेल पलट न जाये. ये रूटीन और फॉर्मूला पर नहीं चलती. अपने लिए एक अलग लीक बनाती है. बेवजह के रोमांटिक गाने और डांस नंबर डालकर नैरेटिव में खलल पैदा नहीं करती. इसलिए इसका इम्पैक्ट कभी डाइल्यूट नहीं होता. फिल्म चीज़ों को इस तरह से देखती है कि कैसे एक पांचवीं पास आदमी हावर्ड ग्रैजुएट से लेकर पुलिसिया सिस्टम और तमाम पढ़े-लिखे लोगों को मात दे जाता है.
वैसे तो ये डायलॉग हैवी फिल्म है. जो कैरेक्टर आ रहा है, वो अपने लिए एक अलग माहौल बना रहा है. मगर कुल संवाद का 10 फीसदी भी विजय या उसकी फैमिली के हिस्से नहीं आता. अंजू को आप फिल्म में मात्र एक या दो बार बोलते सुनते हैं. श्रिया सरण का किरदार सिर्फ वहीं बोलता है, जहां उसका बोलना सबसे ज़्यादा ज़रूरी था. क्योंकि उसके बोले बिना फिल्म की कहानी आगे नहीं बढ़ सकती. ये पॉजिटिव चीज लगी मुझे. जो टिपिकल हिंदी फिल्मों से अलग रही.
चूंकि ये बेहद गंभीर किस्म का सिनेमा है. उसके पास दर्शक को हल्का महसूस करवाने का कोई ऑप्शन या स्पेस नहीं है. इसलिए वो कॉमिक रिलीफ वाला मैटर सब-इंस्पेक्टर लक्ष्मीकांत गायतोंडे को सौंप दिया जाता है. कमलेश सावंत ने उस ज़िम्मेदारी को बड़े चाव से मज़े लेते हुए निभाया है. इसमें फिल्म का इंटरवल वाला हिस्सा भी शामिल है. प्रकाश राज ने उस वकील का रोल किया है, जो विजय के खिलाफ लड़ रहा है. मगर उनके पात्र की भूमिका तो बड़ी बनाई जाती है. मगर उसका प्रभाव सिफर रहता है.
कुल जमा बात ये है कि 'दृश्यम 3' घटिया सीक्वल्स वाले कर्स से बच जाती है. वो अपनी कहानी और नायक के प्रति लॉयल रहती है. वो ऑफर करती है, जिसका वादा करती है. इसलिए इस फिल्म को पूरी फैमिली के साथ देखा और एंजॉय किया जा सकता है.
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