'कॉकटेल 2' सिलिली में सेट एक सिली फिल्म है. एक्सट्रावैगेंट स्केल पर बना 'इमोशनल अत्याचार' का फैन्सी एपिसोड. ये फिल्म न्यू एज डेटिंग और प्यार के कॉन्सेप्ट को एक्सप्लोर करने की कोशिश करती है. उस दौर में प्रेम का मर्म समझाने का जहमत उठाती है, जब स्वाइप्स लोगों के रिलेशनशिप तय करते हैं. मगर ये फिल्म खुद डेटिंग ऐप्स जैसी लगती है. इस फिल्म में जितने भी किरदार हैं, उनमें से किसी के बारे में आपको इतना नहीं पता कि आप उसके बारे में कोई राय कायम कर सकें. जेंडर पॉलिटिक्स इसका वो पहलू है, जिस पर अलग से बात की जानी चाहिए. चूंकी ये कहानी 'प्यार का पंचनामा' और 'सोनू के टिटू की स्वीटी' वाले लव रंजन ने लिखी है, इसलिए आपको इल्हाम तो हो जाता है कि फिल्म में क्या मिलने वाला है. मगर इस बार वो मॉडर्निटी के चोगे में आता है.
फिल्म रिव्यू- कॉकटेल 2
2012 में 'कॉकटेल' का सीक्वल 'कॉकटेल 2' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.


कहानी है कुणाल और दिया की. ये लोग दिल्ली-NCR में कहीं रहते है. एग्जैक्ट लोकेशन नहीं बताया गया. मगर कुणाल खुद को दिल्ली वाला कहता है. ख़ैर, कुणाल और दिया पिछले 16 सालों से रिलेशनशिप में हैं. 'शादी कब करोगे?' वाले सवालों को डॉज करने के लिए वो लोग एक हॉलीडे पर इटली जाते हैं. यहां उनकी मुलाकात होती है ऐली से. जो कि दिया की कॉलेज फ्रेंड है. दिया. ऐली की मदद से अपने बॉयफ्रेंड का लॉयल्टी टेस्ट करती है. इसके बाद फैलता है रायता, जो पूरी फिल्म में समेटने की कोशिश होती है.
2012 में पहली वाली 'कॉकटेल' आई थी, जिसे इम्तियाज़ अली ने लिखा था. होमी अदजानिया ने ही डायरेक्ट की थी. 'कॉकटेल' कोई महान या बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म नहीं थी. मगर अपने फेयर शेयर ऑफ मिसोजिनी के साथ वो एक फन फिल्म थी. इतनी भी अच्छी नहीं कि 14 साल बाद उसका सीक्वल बनाया जाए. मगर आज के समय में हिंदी फिल्मों की क्वॉलिटी का बार इतना लो हो गया कि सीक्वल के सामने ओरिजिनल वाली फिल्म बेहतर लग रही है. इस फिल्म को देखकर लगता है कि पिछले 14 सालों में हमारा सिनेमा इवॉल्व होने के बजाय, पीछे की ओर जा रहा है.
'कॉकटेल 2' पर्सनली मुझे बड़ी सुपरफिशियल फिल्म लगी. इसके खुद के फंडे इतने फ्लॉड हैं कि किसी और को सलाह देने की स्थिति में नहीं लगती. ये पूरी फिल्म सिर्फ एक ट्विस्ट पर टिकी है. जो कि हिंदी सिनेमा के सेट लव ट्रायंगल वाले पैटर्न को तोड़ता है. सोशल मीडिया पर लगातार पढ़ने में आ रहा था कि ये टिपिकल लव ट्रायंगल नहीं है. इसमें होमोसेक्शुएलिटी पर बात की जाएगी. कृति सैनन और रश्मिका मंदाना, एक लेस्बियन कपल बनी हैं. फिल्म देखने के बाद लगता है कि मेकर्स को सोशल मीडिया वाली थ्योरी इस्तेमाल करनी चाहिए थी. वो सब्जेक्ट फ्रेश होता. मगर उसे बड़ी बारीकी से बरतना पड़ता. या फिर कमिटमेंटफोबिया जैसे मसले पर बात की जानी चाहिए थी. क्योंकि वो आज के समय में बेहद आमफहम विषय है. मगर जो फिल्म बनकर निकली है, वो कन्विसिंग नहीं है. फिल्म में किसी भी मौके पर आप किसी भी पात्र से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते.
'कॉकटेल 2' भाव और कला, दोनों पक्षों पर कमतर साबित होती है. फिल्म के एक सीन में कुणाल, प्यार-कमिटमेंट और डेटिंग के बारे में दिया और ऐली को ज्ञान देता है. वो बताता है कि दिया उसके लिए उस फटी टी-शर्ट जैसी है, जिसे पहनकर सोने पर अच्छी नींद आती है. उपमाओं की अगली कड़ी में दिया को वो अस्त-व्यस्त अलमारी कहता है. आपको समझ नहीं आता कि ये वो कॉन्प्लीमेंट के तौर पर कह रहा है या... उसकी प्रेम और रिलेशनशिप की परिभाषा इतनी छिछली है कि आप उसके आइडिया ऑफ लव को ही सवालिया नज़र से देखने लगते हैं. टिपिकल वुमन रिटन बाय मेन फिलॉसफी यहां लागू होती है.
अब तक हमारे सिनेमा में क्या होता था? दो पुरुष एक महिला के लिए लड़ते थे. मगर यहां जेंडर रिवर्सल है. क्योंकि अब हमारे सोचने का तरीका मॉडर्न हो गया है. मगर ख्याल वही आदम ज़माने वाले. ये ऐसा सियासी खेल है कि महिलाएं किसी तरह से जीत ही नहीं सकतीं. क्योंकि उनकी हार को ही उनकी जीत की तरह प्रेज़ेंट किया जाता है. फिल्म में एक सीन में तो ये बात खुलकर कह भी दी जाती है. जब कुणाल नाराज़ होकर घर से निकल जाता है. उसके पापा साथ में गाड़ी में बैठ जाते हैं. जब बीच रास्ते में कुणाल अपने पापा पर गुस्सा हो जाता है, तो वो कहते हैं-
"इसमें मेरी क्या गलती है! सिवाय मेरी अच्छी जीन्स देने के. दो लड़कियां तेरे लिए लड़ रही हैं."
ऐसा लगता है कि ये डायलॉग आयरनी और लव रंजन ने साथ मिलकर लिखी है.
सिनेमैटोग्रफी और म्यूज़िक, दो ऐसे डिपार्टमेंट हैं, जो आपको निराश नहीं करते. इटली वाले सीक्वेंस बड़े खूबसूरत तरीके से फिल्माए गए हैं. मगर लोकेशन नैरेटिव में कुछ ऐड नहीं करता. बस फिल्म की सुंदरता बढ़ाता है. तकरीबन पूरी फिल्म में म्यूज़िक को जिस तरह से छिड़का गया, वो फिल्म को कंप्लीट करता है. रश्मिका मंदाना को अगर हिंदी फिल्मों में काम करना है, तो उन्हें अपने लहजे पर काम करना चाहिए. क्योंकि वो उनके सब किए-कराए पर पानी फेर देता है. मुझे सबसे ज़्यादा हैरानी इस बात पर हुई कि इस फिल्म में सपोर्टिंग एक्टर्स के लिए कोई जगह ही नहीं है. अचानक से फिल्म के सेकंड हाफ में पूरी फैमिली आ जाती है. मगर वो सिर्फ फ्रेम भरने के लिए लाए गए लगते हैं. क्योंकि किसी के पास न कुछ करने को है, न कुछ कहने को. ये चीज़ मुझे बड़ी अटपटी लगी.
मैं जब भी 'कॉकटेल' को याद करता हूं तो गूफी-फन सीन्स के लिए ही करता हूं. मगर इस सीक्वल में शायद ही ऐसा कोई सीन है, जो आपको याद रह जाए. वैचारिक छोड़िए, तो सिनेमैटिक स्तर पर इस फिल्म में बहुत गुंजाइश बाकी रहती है. 'कॉकटेल 2' की साज-सज्जा में इतनी मेहनत और खर्चा कर दिया गया कि अब वो असल में कैसी दिखती है, ये मालूम ही नहीं पड़ता. और इसकी कीमत फिल्म को अपनी आत्मा मारकर चुकानी पड़ती है.
वीडियो: फिल्म रिव्यू: कैसी है इम्तियाज अली की ‘मैं वापस आऊंगा’

















