दुनिया भर में हर जगह लड़ाइयां लड़ी जा रही हैं. लड़ी जाती रही हैं. लड़ी जायेंगी. फ्यूचर के बारे में इतने यकीन से इसलिए कह पा रहा हूं क्यूंकि वर्ल्ड पीस वाला सीन तो आता नहीं दिख रहा. खैर, ये लड़ाइयां लड़ता कौन है? सैनिक. लड़ाई ख़त्म होने के बाद सैनिकों का क्या होता है? वो वापस चले जाते हैं. लेकिन उस लड़ाई के ख़त्म होने के बाद उनका क्या होता है जो न ही लड़ रहे थे, न ही लड़वा रहे थे. वो जो बस आस पास मौजूद थे. दर्शकों की तरह. प्रार्थना करते हुए कि कैसे भी हो, युद्ध का आखिरी दिन वो देख सकें.
ऐसे में कल्पना कीजिए कि कुछ ऐसा हो जाये कि एक-एक सैनिक के पास पूरी सेना जितनी ताकत आ जाये. इतनी कि हम उन्हें सुपरहीरो कहने लगें. उनकी ताकतों को देख समूचा देश उनसे खौफ़ खाए. जिनकी ताकतों की कोई लिमिट खुद उन्हें ही न पता हो. ऐसे में अगर लड़ाइयां हों तो क्या हो? क्षति नहीं विनाश. समूची बिल्डिंगें धराशाई हो जायें, शहर के शहर तबाह हो जायें, आने वाली नस्लें और उनके आने की आशा ही जड़ से ख़त्म हो जाये. ऐसे में जो नुकसान होता है, उससे पार पाना मुश्किल है.

ऐसे में ज़रूरी है कि इन ताकतों को उनकी लिमिट बताई जाए. वो इसलिए क्यूंकि वो लड़ाइयां जिनके लिए लड़ रहे होते हैं, अनजाने में वो उन्हें ही नुकसान पहुंचा रहे होते हैं. और इसी बात को समझाने की कवायद में बनती है फ़िल्म कैप्टन अमेरिका: सिविल वॉर. एवेंजर्स को समझाने की कोशिश की जा रही है कि कैसे उन्हें जितनी जल्दी हो सके, एक ऐसे कॉन्ट्रैक्ट के अन्दर आ जाना चाहिए जहां उनकी दुनिया को बचाने के सारे प्रयास, सारे दांव-पेंच उलटे ही न पड़ जायें. एवेंजर्स ऐसे में दो खेमे में बंट जाता है. एक जो इस बात से सहमत है और एक जो नो-होल्ड्स-बार्ड लड़ाई लड़ने में यकीन रखता है. और फिर शुरू होता है एक अंतर्द्वंद्व. एवेंजर्स का अंतर्द्वंद्व. अब आप समझ नहीं पाते कि किसके पाले में रहें. निहायती कूल, हाज़िर जवाब, अमीर, दिमागदार और बेहद हॉट टोनी स्टार्क के पाले में या बर्फ़ से सालों बाद निकले, ताकतवर, इमोशनल कैप्टन अमेरिका के पाले में. दोनों कभी बेहद करीबी दोस्त थे. लेकिन सियासत ने उन्हें दुश्मन बना दिया. टोनी के पास उसके दोस्त हैं और कैप्टन अमेरिका के पास उसके. और दोनों आमने सामने हैं. मैंने इससे पहले शायद ही कभी पहले दिन के पहले शो में इस हद तक भरे हुए पिच्चर हॉल को देखा था. फ़िल्म ख़त्म होने तक हम सभी आपस में दोस्त बन गए थे. कहानी के हिसाब से फ़िल्म एक-दो जगहों पर थोड़ी सी बोझिल हो जाती है. फ़िल्म पुरानी एवेंजर्स फ़िल्म्स की तरह हर वक़्त सुपर-कूल ऐक्शन्स से भरी हुई नहीं है. मज़ा पार्ट्स में मिलता है जो कि अच्छा है. आपको इंतज़ार करना पड़ता है. लेकिन उस इंतज़ार के बदले जो भी मिलता है, वो बेहद अच्छा है. एक समय जब टीम टोनी और टीम कैप्टन अमेरिका लड़ रही होती है, उस वक़्त फ़िल्म अपने चरम पर होती है. उस वक़्त आप नहीं चाहते कि इसे ख़त्म होना चाहिए. लेकिन हर अच्छी चीज़ की तरह ये भी ख़त्म होती है. फ़िल्म में एक और रिएलिटी चेक मिलता है. वो ये कि जब हीरो, या कहिये कि सुपर-हीरो आपस में लड़ते हैं तो मालूम चलता है कि कौन उन्नीस है और कौन बीस. आप दांत पीसते रह जायेंगे. गर झुण्ड में गए हैं तो ये भी हो सकता है कि आपका झुण्ड ही दो पार्ट्स में बंट जाये. लेकिन ज़्यादा देर एक ही को सपोर्ट नहीं किया जाता. कैप्टन अमेरिका अपनी मार खाते हुए शील्ड ढूंढता दिखता है तो अहसास होता है कि नामुमकिन भी मुमकिन है. टोनी स्टार्क जिसे स्क्रीन पर देखते ही लगता था कि अब सब कुछ ठीक हो जायेगा, ज़मीन पर धराशायी दिखता है तो अचरज होता है. आपके मिथक तोड़ेगी ये फ़िल्म. फिल्म को थ्री-डी में न देखें. कई जगहों पर, खासकर ऐक्शन सीन्स में थ्री-डी इफेक्ट्स की वजह से कई बार कन्फ्यूज़न खड़ा हो जाता है. फ़्रेम्स गायब होते, खिंचे-खिंचे हुए दिखते हैं. टेक्निकल बातें छोड़ो, इतना ध्यान रखो कि 2-डी में देखनी है. और हां, आखिरी में जब स्टैन ली दिखें तो एक ठंडी आह भरकर उन्हें जितने हो सकें उतने सलाम दे दें. उनका बहुत कुछ उधार है हम सभी पर.

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