मोहनलाल के कैरेक्टर का नाम है जॉन. एकदम ज़िंदादिल आदमी. अच्छे पैसे वाले भी हैं. अपनी बीवी ऐना के साथ रहते हैं और दोनों में खूब प्यार है. इनका एक बेटा है ईशो, यो टाइप बंदा. जिसका रोल निभाया है पृथ्वीराज ने. ईशो बैंगलोर में रहता है. वहां किसी एडवरटाइज़िंग एजेंसी में बतौर क्रिएटिव डायरेक्टर काम करता है. कुल मिलाकर अपने करियर में सक्सेसफुल है. एक दिन अचानक उसके पास जॉन का फोन आता है. जो किसी भी तरह बस उसे वापस घर आने को कहता है. हड़बड़ाहट में ईशो घर आ जाता है. घर आकर पता चलता है कि उसकी मां प्रेग्नेंट है. अब अगर इतना सुनकर सोच रहे हैं कि इसमें नया क्या है, ये तो मलयालम ‘बधाई हो’ है, तो बता दें कि रुको ज़रा, सबर करो. यहां कहानी में कैच ये है कि बैंगलोर में ईशो के साथ रह रही उसकी गर्लफ्रेंड भी प्रेग्नेंट है. वो जल्द ही भाई और बाप बनने वाला है, तभी फिल्म का टाइटल ‘ब्रो डैडी’ है. ईशो इस पूरी सिचुएशन को कैसे संभालेगा, यही पूरी फिल्म की कहानी है.

मोहनलाल ने काफी हद तक फिल्म को कैरी करने का काम किया है.
प्लॉट सुनकर अंदाज़ा लग जाता है कि ये कहानी कैसे खत्म होती है. लेकिन ऐसी फिल्मों में उस एंड तक कैसे पहुंचा जाए, वो पार्ट ही इम्पॉर्टेंट होता है. ‘ब्रो डैडी’ महान फिल्म बनने का कोई दावा नहीं करती. इसका सोल पर्पस आपको सिर्फ एंटरटेन करना है. इसलिए फिल्ममेकिंग के किसी भी पॉइंट में ये डीप नहीं उतरती, जिसका एक बड़ा नुकसान भी है. उस पर आगे बात करेंगे, पहले फिल्म के प्लस पॉइंट्स बताते हैं. फिल्म शुरू होने के बाद कम ही मोमेंट्स आएंगे जब आप बीच-बीच में अपना फोन चेक करेंगे. स्क्रीन पर उतनी ही इनफॉरमेशन दी जाती है, जो आपको किरदारों की दुनिया का बेसिक आइडिया दे सके. फिल्म की टोन हल्की होने की वजह से ह्यूमर को भी जगह मिली है. जैसे एक सीन में जब डॉक्टर ईशो को बधाई देती है कि वो पिता बनने वाला है. वो झटके में स्माइल करता है, और फिर अपने एक्सप्रेशन रोल बैक कर पूछता है कि क्या कहा.
यहां ऐसा ह्यूमर नहीं कि आप ROFL, LMAO हो जाएं. बस आपके चेहरे पर हल्की-फुल्की मुस्कान आती रहेगी. फिल्म का मेन कैरेक्टर भले ही ईशो लगे, लेकिन कहानी को संभाला जॉन ने है. यही वजह है कि मोहनलाल जितने भी सीन्स में होते हैं, उन्हें स्क्रीन पर देखना अच्छा लगता है. वो बात अलग है कि उनका रोल यहां एक्टिंग हैवी परफॉरमेंस की मांग नहीं करता. ये सिर्फ मोहनलाल के केस में ही नहीं, तमाम कास्ट के साथ है. फिल्म जब तक हल्का-फुल्का मज़ाक कर रही है, तब तक ठीक है. लेकिन एक पॉइंट के बाद आप इमोशनल डेप्थ की उम्मीद करते हैं. जो ये फिल्म डिलिवर नहीं कर पाती. फैमिली बॉन्डिंग के महत्व पर बात करने वाली फिल्म में एक भी कायदे का इमोशनल सीन नहीं. राइटिंग फ्रंट पर कमजोर महसूस होती है.

पृथ्वीराज का कैरेक्टर ईशो अपनी ही धुन में रहता है.
ये भी एक मेजर रीज़न है कि फिल्म का क्लाइमैक्स अपनी छाप नहीं छोड़ पाता. फर्स्ट हाफ में सही से शुरू हुई कहानी सेकंड हाफ में लड़खड़ाने लगती है. गैर ज़रूरी सीन्स को जगह दी गई है, जिन्हें हटाकर लेंथ भी कम की जा सकती थी और नैरेटिव पर भी कोई असर नहीं पड़ता. जैसे कुछ पॉइंट्स पर किरदार जो बात कर रहे हैं, कि फलां-फलां करना. थोड़ी देर बाद आप वही होते हुए देखते भी हैं. मतलब स्टेटिंग द ऑबवियस टाइप मामला हो जाता है. ऐसे काफी सारे सीन आराम से अवॉइड किए जा सकते थे.
आपने हफ्ते भर ऑफिस का काम किया. फिर फ्राइडे नाइट आई. अब ऐसे में मन करता है कि कोई फिल्म देखें, जिससे टाइम पास भी हो जाए, और थकान के चलते बीच में नींद आने लगे तो भी कोई दिक्कत नहीं. ऐसे समय में आप ‘ब्रो डैडी’ जैसी फिल्म देख सकते हैं. फिर बता दें कि ये डिज़्नी प्लस हॉटस्टार पर स्ट्रीम हो रही है.










