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'सतलुज' से पहले आईं वो 8 फिल्में, जिन्हें इंडिया में बैन कर दिया गया

'सतलुज' से पहले भी कई फिल्में अलग-अलग कारणों से सिनेमाघरों में या तो रिलीज़ नहीं हो सकीं, या मुश्किलों में फंसी रहीं.

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'सतलुज' को हनी त्रेहान ने डायरेक्ट किया है. फिल्म में दिलजीत दोसांझ ने जसवंत सिंह खालड़ा का रोल किया है.

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  • दिलजीत दोसांझ की फिल्म 'सतलुज' जो 2022 में पूरी हुई, तीन साल बाद भी सिनेमाघरों और OTT प्लेटफार्म से हटाई गई है और इसके बिना कट संस्करण का प्रीमियर भी हटा दिया गया है।
  • भारतीय फिल्मों को सेंसर बोर्ड और कानूनी प्रतिबंधों के कारण अक्सर रिलीज में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, जैसे सेंसर बोर्ड की कटौती या राजनीतिक कारण जिनसे कई फिल्मों को बैन किया गया।
  • डायरेक्टर दिबाकर बैनर्जी अपनी फिल्म 'तीस' को रिलीज़ कराने के लिए वितरण कंपनियों से बातचीत कर रहे हैं, जबकि कई अन्य फिल्मों के प्रतिबंध और विवादों की वजह से भारतीय अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सवाल उठ रहे हैं।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता. फ्रीडम ऑफ स्पीच. बड़ा ही लिबरेटेड सा कॉन्सेप्ट है. कहने को तो ये हमारे देश में भी है. मगर जब धरातल पर आकर देखते हैं, तो ये एक ख़ूबसूरत झूठ सा महसूस होता है. जिसके साक्षी एकाधिक हैं. और इनके नाम उंगलियों पर गिने भी नहीं जा सकते. सिनेमा भी इस विकृति से अछूता नहीं है. ऐसी कई फिल्में हैं, जिनके रिलीज़ में असंख्य बाधाएं आईं. कभी कानूनी, तो कभी नैतिक बंधनों के चलते कुछ फिल्मों को तो रोशनी नसीब ही नहीं हुई. ये नया मुद्दा या नई बहस नहीं है. और यही डिबेट 5 जुलाई, 2026 की शाम से इंटरनेट पर चल रहा है. इस बार वजह है Diljit Dosanjh की Satluj. वो फिल्म जो 2022 में बनकर तैयार हो गई थी. मगर तीन साल बाद तक आज भी सिनेमाघरों से दूर है. यहां तक कि OTT से भी इसे हटा लिया गया है. हम यहां कुछ ऐसी फिल्मों की याद दिला रहे हैं, जो किसी न किसी वजह से उलझीं. कभी सेंसर बोर्ड ने अड़ंगा लगाया, तो कभी अदलतों ने इन्हें रोक दिया.  

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1. आंधी

डायरेक्टर- गुलज़ार  
कास्ट- संजीव कुमार, सुचित्रा सेन, ओम प्रकाश, ओम शिवपुरी, ए.के. हंगल  
रिलीज़ डेट-  14 फरवरी 1975

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‘आंधी’ की सेंट्रल कैरेक्टर आरती देवी के गेटअप ने इस फिल्म को उलझा दिया. उस समय दक्षिण भारत में एक पोस्टर लगा दिया गया था. जिस पर लिखा था- ‘अपनी प्राइम मिनिस्टर को स्क्रीन पर देखें’. एक फिल्म मैगजीन में लिखा गया- ‘आज़ाद भारत की महान महिला राजनेता की कहानी देखिए’. इसके बाद फिल्म विवादों में आई. इसके बाद इंदिरा गांधी के स्टाफ ने ये फिल्म देखी. और रिलीज की इजाज़त भी दे दी. मगर रिलीज के 20 हफ्ते बाद ही फिल्म को बैन कर दिया गया. सरकार ने फिल्म पर ये कहते हुए बैन लगा दिया कि इससे प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी की छवि खराब हो रही है. दरअसल इस फिल्म में आरती देवी का रोल करने वालीं एक्टर सुचित्रा सेन का लुक तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी इंदिरा गांधी से मिलता-जुलता था. हेयरस्टाइल में सफेद बालों की एक लट, साड़ी पहनने और बॉडी लैंग्वेज में भी कुछ समानताएं देखी गईं. फिल्म में एक महत्वाकांक्षी महिला नेता और उनके पति के बीच अनबन व अलगाव की कहानी दिखाई गई है. लोगों ने इसे इंदिरा गांधी और उनके पति फिरोज़ गांधी के टूटे हुए रिश्ते से जोड़कर देखना शुरू कर दिया. इस फिल्म में सुचित्रा को कई जगह सिगरेट पीते और शराब पीते हुए दिखाया गया था. जो उस समय के रूढ़िवादी भारतीय समाज और एक 'भारतीय महिला राजनेता' की छवि के विपरीत माना गया. गुलज़ार से कहा गया कि इसमें ड्रिंकिंग और स्मोकिंग वाले सीन फिर से शूट किए जाएं. फिल्म फरवरी 1975 में रिलीज हुई और जून में एमरजेंसी लग गई. साथ ही फिल्म पर प्रतिबंध भी लगा दिया गया. मगर साल 1977 में जब आम चुनाव हुए और कांग्रेस हार गई, तब जनता पार्टी की नई सरकार ने ये प्रतिबंध हटा दिया.

2. किस्सा कुर्सी का

डायरेक्टर: अमृता नाहटा
कास्ट: राज किरण, सुरेखा सीकरी, राज बब्बर, शबाना आज़मी
रिलीज़ डेट-  16 फरवरी 1978

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‘किस्सा कुर्सी का’ 1975 में रिलीज होने वाली थी. एमरजेंसी के दौर में हर फिल्म को पहले सरकार देखती थी. ये फिल्म देखने के बाद तत्कालीन सरकार इंदिरा गांधी सरकार को लगा कि ये उनके मारुति कार प्रोजेक्ट का मखौल उड़ा रही है. सरकार की नीतियों को बदनाम कर रही है. दरअसल फिल्म में एक राजनीतिक पार्टी का चुनाव चिह्न ‘जनता की कार’ था. उस वक्त मारुति कार इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी का ड्रीम प्रोजेक्ट था. इसे जनता की कार बताया गया था. बस, इसी के चलते इसके प्रिंट ज़ब्त कर लिए गए. बाद में ये आरोप भी लगा कि प्रिंट मुंबई से मंगवाकर गुड़गांव स्थित मारुति कारखाने में जलवा दिए गए. इसके लिए संजय गांधी को जेल भी जाना पड़ा. जिस प्रिंट को जलाकर नष्ट कर दिया गया था, उस फिल्म में राज बब्बर लीड रोल में थे. चूंकि फिल्म के ओरिजनल प्रिंट्स ही जलाकर नष्ट कर दिए गए थे, इसलिए एमरजेंसी हटने के बाद 1977 में ये फिल्म दोबारा बनी. हालांकि दूसरी बार बनी इसमें राज बब्बर ने काम नहीं किया. नई फिल्म में राज किरण, सुरेखा सीकरी और शबाना आज़मी मुख्य भूमिकाओं में थे.

3. बैंडिट क्वीन

डायरेक्टर- शेखर कपूर  
कास्ट- सीमा बिस्वास, निर्मल पांडे, गोविंद नामदेव, रघुबीर यादव, मनोज बाजपेयी, सौरभ शुक्ला, आदित्य श्रीवास्तव 
रिलीज़ डेट-  26 जनवरी 1994

चंबल की रहने वाली एक आम लड़की से डकैत बनी फूलन की कहानी है ये फिल्म. शेखर कपूर ने बड़ी दिलेरी से इसे फिल्माया. फिल्म में कुछ न्यूड सीन भी हैं. रेप सीन है. वो सब है, जो फूलन ने सहा था. मगर ये फिल्म कभी सच्चे मगर बोल्ड कॉन्टेंट की वजह से अटकी, तो कभी कानूनी उलझनों के चलते फंसी. जब फिल्म बनकर तैयार हुई, तो सेंसर बोर्ड ने इसे पास करने के इनकार कर दिया. मेकर्स ने अपील की, तो बोर्ड ने फिल्म में बीसियों कट लगाने को कहा. कट लगा दिए गए. फिर खुद फूलन देवी ने ही फिल्म में उनके किरदार के चित्रण पर आपत्त‍ि ली. वो इसके खिलाफ़ कोर्ट तक गईं. और अपील की, कि ये फिल्म सिनेमाघरों या फिल्म फेस्टिवल्स में भी न दिखाई जाए. और इसके सारे नेगेटिव प्रिंट से लेकर ऑडियों भी ज़ब्त कर लिए जाएं. फिर किसी तरह तमाम काटछांट और समझौतों के बाद फिल्म रिलीज़ हुई. मगर कुछ वक्त बाद ही किसी ने हाई कोर्ट में किसी ने केस कर दिया. आपत्ति उस सीन पर पर थी जिसमें सवर्णों की पगड़ी निकाली जाती है. हाई कोर्ट ने इसे बैन कर दिया. फिर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया. और सुप्रीम कोर्ट को इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा. तब ये फिल्म फिर से सिनेमनाघरों में लगी. इसे फिल्म इंडस्ट्री से भी काफ़ी विरोध मिला. लोगों ने कहा- ‘नंगी लड़की लेकर आए हैं, इसलिए हिट हो रही है'. मेकर्स ने वुमन ओनली शोज़ रखे, तो सिनेमाघरों के बाहर औरतों की बेतहाशा भीड़ लगने लगी. तब एक बार फिर इस पर रोक लगी. और फिर इसे एक बार फिर लाने के लिए बहुत देर हो चुकी थी. तब तक कई लोग इसे VCR पर देख‍ चुके थे.

4. ब्लैक फ्राइडे

डायरेक्टर- अनुराग कश्यप 
कास्ट- पवन मल्होत्रा, के के मेनन, आदित्य श्रीवास्तव, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, दिव्येंदु भट्टाचार्य, गजराज राव और अनुराग कश्यप 
रिलीज़ डेट-  9 फरवरी 2007 इंडिया रिलीज़ (13 अगस्त 2004 वर्ल्ड प्रीमियर)

ये 1993 के मुंबई सीरियल बम ब्लास्ट्स पर लिखी गई हुसैन ज़ैदी की किताब पर बनी फिल्म है. दुनिया के दूसरे देशों में तो इसका प्रीमियर 13 अगस्त 2004 को ही हो गया था. और भारत में ये जनवरी 2005 में रिलीज़ होनी थी. मगर इंडिया में ये फिल्म तीन साल बाद रिलीज़ हो सकी. कारण, तब बॉम्ब ब्लास्ट केस का ट्रायल तो हो चुका था. मगर फैसला आना बाक़ी था. फिर बॉम्ब ब्लॉस्ट के 31 आरोपियों में शामिल मुश्ताक़ मूसा तरानी ने कोर्ट में अपील दायर की, कि जब तक केस का फैसला नहीं आ जाता, फिल्म रिलीज़ न की जाए. और इसके रिलीज़ पर रोक लगा दी गई. फिल्म कम्पैनियन को दिए इंटरव्यू में अनुराग ने बताया था कि उन्हें इस पर बैन की सूचना तब मिली जब वो इसके प्रीमियर के लिए वेन्यू पर पहुंच चुके थे. अंतत: ब्लास्ट के केस में कोर्ट का फैसला आया और फिर फरवरी 2007 में ये फिल्म रिलीज़ हो सकी.

5. पांच

डायरेक्टर- अनुराग कश्यप
कास्ट- केके मेनन, आदित्य श्रीवास्तव

अनुराग कश्यप की एक और फिल्म 'पांच', जो सेंसर बोर्ड के चक्कर में बैन रही. इसे सिनेमाघर भी नहीं नसीब हुए. ये अनुराग कश्यप की पहली फिल्म थी. इसे भी 'ब्लैक फ्राइडे' की तरह सेंसर बोर्ड ने सर्टिफिकेट नहीं दिया. कहा गया कि इसमें हत्या, सेक्स और ड्रग्स का महिमामंडन किया गया है. इसे बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया है. इसलिए फिल्म बैन की गई. पर 2001 में इसे सेंसर बोर्ड ने पास कर दिया. मगर प्रोड्यूसर्स और डिस्ट्रीब्यूटर्स की किसी समस्या के चलते 'पांच' थिएटर में रिलीज नहीं हो सकी. बाकी पब्लिक प्लेटफॉर्म्स पर फिल्म मौजूद है. 'पांच' पुणे में हुए जोशी-अभ्यंकर सीरियल मर्डर केस पर आधारित है. इस घटना के एक अभियुक्त मुन्नवर शाह ने इसे किताबी शक्ल दी. मराठी भाषा की इस किताब का नाम था 'यस, आय एम गिल्टी'. ऐसा माना जाता है कि फिल्म इसी पर बेस्ड है. इसमें केके मेनन और आदित्य श्रीवास्तव मुख्य भूमिकाओं में हैं.

6. अनफ़्रीडम
डायरेक्टर: राज अमित कुमार
कास्ट: आदिल हुसैन, प्रीति गुप्ता, विक्टर बनर्जी

लेस्बियन और आतंकी एंगल लिए फिल्म 'अनफ़्रीडम' को भारत में 2014 में बैन कर दिया गया. इस फिल्म को कभी थिएटर में नहीं रिलीज किया गया. सेंसर बोर्ड ने इसे सर्टिफिकेट देने से इनकार कर दिया. कारण बताया गया सेम सेक्स रिलेशनशिप और धार्मिक कट्टरवाद. सेंसर बोर्ड ने फिल्म से तमाम सीन उड़ाने को कहा. मगर डायरेक्टर राज अमित कुमार नहीं माने. वो इसके खिलाफ भारत सरकार के सूचना और प्रसारण अपीलेट ट्रिब्यूनल गए. मगर वहां से उन्हें निराशा ही हाथ लगी और फिल्म को बैन कर दिया गया.

7. तीस

डायरेक्टर: दिबाकर बैनर्जी 
कास्ट: नसीरुद्दीन शाह, कल्कि केक्लां, मनीषा कोइराला, हुमा कुरैशी, ज़ोया हुसैन, शशांक अरोड़ा, दिव्या दत्ता और नीरज काबी

दिबाकर बैनर्जी 2019 में नेटफ्लिक्स के लिए एक फिल्म बना रहे थे. नाम था 'फ्रीडम'. फिल्म बनाकर 2020 में उन्होंने नेटफ्लिक्स को सौंप दी. इस बात को 6 साल बीत चुके हैं. मगर नेटफ्लिक्स फिल्म रिलीज़ नहीं कर रहा है. एक इंटरव्यू में दिबाकर ने कहा था कि नेट‍फ्लिक्स ने उन्हें उनकी फिल्म को रोके रखने की कोई ठोस वजह नहीं बताई. उन्हें बस ये बताया गया कि 'फ्रीडम' को रिलीज़ करने का ये सही वक्त नहीं है.

दावा है कि नेटफ्लिक्स डर के मारे 'फ्रीडम' को अपने प्लैटफॉर्म पर रिलीज़ नहीं करना चाहती. ये सारा फ़साद शुरू हुआ 2021 में एमेज़ॉन प्राइम वीडियो के शो 'तांडव' के रिलीज़ के बाद. इस सीरीज़ के एक सीन पर हंगामा खड़ा हुआ. कहा गया कि 'तांडव' हिंदू देवताओं का मज़ाक उड़ाती है. लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करती है. इस शो को लेकर हुए विवाद ने तूल पकड़ लिया. सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भी शो के कुछ हिस्सों पर आपत्ति जताई. डायरेक्टर अली अब्बास ज़फर ने माफी मांगते हुए कहा कि शो के जिस हिस्से से लोगों और मंत्रालय को दिक्कत है, वो उसमें बदलाव करेंगे. मगर विवाद नहीं थमा.

अब ‘फ्रीडम’ का नाम बदलकर 'तीस' कर दिया गया है. ये इंडिया में रहने वाले एक मिडल क्लास मुस्लिम परिवार की कहानी है. ये कहानी तीन जनरेशन में घटती है, जिसे अलग-अलग कालखंडों में तोड़कर दिखाया गया है. फिल्म का पहला हिस्सा 1990 के कश्मीर में घटता है, जब कश्मीरी पंडितों का विस्थापन हुआ. फिल्म का दूसरा सेग्मेंट मुंबई में सेट है. जहां इस फैमिली की एक लड़की आज के समय के मुंबई में अपार्टमेंट खरीदना चाहती है. मगर इसमें उसका धर्म आड़े आ रहा है. कहानी का तीसरा भाग आज से 25 साल आगे भविष्य में घटित होता है. जहां इसी परिवार का एक लड़का अपना लिखा नॉवल छपवाने के लिए संघर्ष कर रहा है. इस फिल्म की मदद से उस परिवार और भारत के आइडियोलॉजिकल और सेक्शुअल इतिहास पर बात होती है. अब दिबाकर बैनर्जी देश-विदेश के तमाम डिस्ट्रिब्यूटर और प्रोड्यूसर से बातचीत कर रहे हैं. ताकि उनमें से कोई उनकी फिल्म को नेटफ्लिक्स से खरीदकर रिलीज़ कर दे.  

8. संतोष

डायरेक्टर: संध्या सूरी 
कास्ट: शाहना गोस्वामी, सुनीता राजवार, संजय बिश्नोई, कुशल दुबे

ये फिल्म ब्रिटेन की तरफ़ से ऑस्कर की ऑफिशियल ऑस्कर एंट्री रही. BAFTA में भी नॉमिनेट हुई. मगर भारत की कहानी पर बनी ये फिल्म भारत के ही सिनेमाघरों का मुंह न देख सकी. यूके बेस्ड भारतीय फिल्ममेकर संध्या सूरी की फिल्म ‘संतोष’ भारतीय समाज में पसरे जातिवाद से उपजी सड़ांध को उघाड़ती है. पुलिस महकमे का बर्बर चेहरा उजागर करती है. दलित महिला के संघर्षों की शिनाख्त नए ढंग से करती है. सेंसर बोर्ड का कहना है कि फिल्म में पुलिस ब्रूटैलिटी और सेक्शुअल वॉयलेंस काफी है. इसे कम किए बग़ैर फिल्म रिलीज़ नहीं की जा सकती. सेंसर बोर्ड ने मेकर्स को लंबे-लंबे कट की फेहरिस्त थमाई है. सूत्रों के मुताबिक ये कट इतने लंबे थे, कि जो लिस्ट मेकर्स को दी गई, वो कई पन्नों में पूरी हो सकी. फिल्म पर बैन लगने के बाद इंडिया टुडे ने शहाना ने इस विषय पर बात की. उन्होंने बताया कि मेकर्स ने स्क्रिप्ट के रफ़ ड्राफ्ट पर ही सेंसर बोर्ड से अप्रूवल ले लिया था. फिर भी वो इसकी रिलीज़ पर रोक लगा रहे हैं. सेंसर बोर्ड (CBFC) के मुताबिक फिल्म में मिसोजिनी, सेक्शुअल वायलेंस सहित अति संवदेनशील मसलों का फिल्मांकन है. इसलिए सेंसर इसमें काट छांट करना चाहता है.  

9. सतलुज (पंजाब 95)

डायरेक्टर- हनी त्रेहान 
एक्टर्स- दिलजीत दोसांझ, गीतिका विद्या ओहल्याण, अर्जुन रामपाल, सुविंदर पाल विकी

ये फिल्म पंजाब के ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट जसवंत सिंह खालड़ा की कहानी पर आधारित है. सबसे पहले इसका नाम  ‘घल्लूघारा’ था. घल्लूघारा यानी नरसंहार. इसी नाम के साथ फिल्म का ट्रेलर रिलीज़ किया गया. मगर एक दिन बाद ही उसे यूट्यूब से हटा दिया गया. बाद में इसका नाम ‘पंजाब 95’ कर दिया गया. 

जसवंत सिंह खालड़ा अमृतसर सेंट्रल को-ऑपरेटिव बैंक में डायरेक्टर थे. वो शिरोमणि अकाली दल के मानवाधिकार विंग से भी जुड़े थे. उनके सहकर्मी प्यारा सिंह एक दिन अचानक गायब हो गए. उनकी तलाश में ही जसवंत श्मशान घाट पहुंचे. वहां उन्हें बड़ी तादाद में लाशों को लावारिस बताकर जलाने की बात पता चली. उन्होंने पड़ताल शुरू की और कुछ वक्त बाद दावा किया कि पुलिस ने फ़र्जी तरीके से आम लोगों को मारा या गायब कर दिया. उन्होंने 1984 से 1994 तक हुई ऐसी हज़ारों अवैध हत्याओं और दाह संस्कारों की जानकारी जुटाई. जिसके मुताबिक लावारिस बताकर लाशों का अंतिम संस्कार कर दिया गया, या लाशें नदी-नहर में फेंक दी गईं. 1995 में एक दिन अचानक जसवंत सिंह खालड़ा उन्हीं के घर के बाहर से ग़ायब हो गए. 10 साल तक उनकी कोई ख़बर नहीं मिली. फिर एक दिन छह पुलिसवालों को उनके किडनैप और क़त्ल के इल्ज़ाम में गिरफ्तार किया गया. मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सीबीआई को जांच के आदेश दिए गए. सीबीआई ने माना कि पंजाब पुलिस ने कई लोगों को फेक एनकाउंटर में मारा था. अब सेंसर बोर्ड का कहना है कि‍ फिल्म में बताए गए बदलावों के बग़ैर उसे रिलीज़ नहीं किया जा सकता. इसलिए तीन साल पहले बनकर तैयार हुई ये फिल्म, आज भी सेंसर बोर्ड के पास फंसी हुई है. बोर्ड ने इसमें कुल 127 कट और कई बड़े बदलाव करने को कहा है. मगर मेकर्स का कहना है कि इसके बाद फिल्म में कुछ बचेगा ही नहीं. लिहाज़ा 3 जुलाई 2026 को एक तीसरे नाम ‘सतलुज’ के साथ बिना शोर-शराबे के इसका अनकट वर्ज़न Zee5 पर प्रीमियर हुआ. मगर जैसे ही इसकी चर्चा हुई, इसे वहां से भी हटा दिया गया.

आप इंटरनेट पर खोजेंगे, तो मुश्किलों में फंसी या बैन्ड मूवीज की लिस्ट में और भी फिल्में मिल जाएंगी. दीपा मेहता की ‘फायर’ से लेकर अनंत महादेवन की ‘फुळे’, ‘मंकी मैन’ तक... फिल्मों के नाम बदलते रहेंगे. मगर मूल में एक ही बात मिलेगी, और वो है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश. 

वीडियो: फिल्म Satluj को OTT प्लेटफार्म से हटाया गया, दिलजीत दोसांझ क्या बोले?

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