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फिल्म रिव्यू- ऐल्फा

YRF Spy Universe की नई फिल्म 'ऐल्फा' कैसी है, जानने के लिए पढ़ें ये रिव्यू.

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'ऐल्फा' को चर्चित फिल्ममेकर राहुल रवैल के बेटे शिव रवैल ने डायरेक्ट किया है. शिव इससे पहले 'द रेलवे मेन' नाम की सीरीज़ भी डायरेक्ट कर चुके हैं.

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  • फिल्म 'ऐल्फा' में निर्देशक शिव रवैल ने आलिया भट्ट, शरवरी वाघ और अन्य कलाकारों के साथ एक फीमेल सेंट्रिक स्पाय थ्रिलर बनाई है, जिसे 2 स्टार की रेटिंग मिली है और यह YRF स्पाय यूनिवर्स से अलग है।
  • YRF स्पाय यूनिवर्स फिल्मों का फोकस मनोरंजन और सुपरस्टार्स पर रहता है, जबकि 'ऐल्फा' को राइटिंग और वास्तविकता से दूर बताया गया है, जिससे फिल्म की आलोचना हुई है।
  • फिल्म का मुख्य प्रभाव यह है कि इसे देखकर लगता है कि स्पाय यूनिवर्स को नए युग अनुसार रचनात्मक स्वतंत्रता और यथार्थपरक सामग्री की जरूरत है, वरना इसका भविष्य संदेहास्पद दिखाई देता है।

फिल्म- ऐल्फा 
डायरेक्टर- शिव रवैल 
एक्टर्स- आलिया भट्ट, शरवरी वाघ, बॉबी देओल, अनिल कपूर, दिया मिर्ज़ा, दिब्येंदु भट्टाचार्य
रेटिंग- 2 स्टार

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YRF Spy Universe कभी एक ऐसी फ्रैंचाइज़ नही थी, जिसे बहुत रूटेड या हार्डकोर स्पाय थ्रिलर्स के लिए जाना जाता हो. इस सीरीज़ में बनी फिल्मों का फोकस हमेशा एंटरटेनमेंट वैल्यू पर रहा है. जिसे पॉपकॉर्न फ्लिक्स कहा जा सकता है. जो सुपरस्टार्स के कंधे पर रखकर बेची गईं. और लोगों ने उन्हें हाथों-हाथ लिया. इसलिए 'धुरंधर' से इसकी तुलना बेमानी है. क्योंकि स्पाय थ्रिलर्स के छतरी तले बनने वाली ये बिल्कुल ही अलग तरह की फिल्में हैं. उनके मक़सद अलग-अलग हैं. 'धुरंधर' जमीन से जुड़ी, वास्तविकता के करीब रहकर बनाई गई फिल्म है. मगर स्पाय यूनिवर्स के अंतर्गत बनने वाली फिल्में फन के लिए बनाई जाती हैं. उनके केंद्र में हमेशा एक बुनियादी मैसेज रहा है कि मिल-जुलकर रहना चाहिए. 

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मगर पोस्ट-धुरंधर वर्ल्ड में वो कॉन्सेप्ट ही आउटडेटेड हो गया है. अब पब्लिक को अमन की आशा और सद्भावना एक्सप्रेस नहीं चाहिए. अब लोगों को पावर पोजिशन चाहिए. सामने वाले पर एक किस्म की अथॉरिटी. 'धुरंधर' ने लोगों को वो स्वाद चखा दिया. जब आप 'ऐल्फा' देखते हैं, तो उसमें भी आपको 'धुरंधर' की छाप नज़र आती है. चाहे वो एक्शन सीन्स में म्यूज़िक का इस्तेमाल हो या क्लाइमैक्स में आने वाला ट्विस्ट. आपको दिखता है कि वो फिल्म कितना ट्राय कर रही है कि आप उसे पसंद कर लें. मगर उसका खोखलापन इसके आड़े आ जाता है.

ये एक स्लीक और स्टाइलाइज़्ड एक्शन फिल्म है. इसे मार्वल जैसा कूल भी लगना है और देशप्रेमी ऑडियंस को भी केटर करना है. मगर इस सबसे पहले उसे खुद अपना देशप्रेम साबित करना है. वो आज के समय में पाकिस्तान को विलन दिखाए बिना संभव नहीं है. ये फिल्म भी उस ट्रोप में फंस जाती है. इस फिल्म की सबसे बड़ी खामी इसकी राइटिंग है. ये फिल्म कमरे में बैठकर लिखी गई है. रियलिटी से इतनी दूर है कि आप चाहकर भी उसे डिफेंड नहीं कर पाते हैं. आज कल Gen-Z लोग एक टर्म इस्तेमाल करते हैं- Go touch grass. यानी थोड़ा इंटरनेट से दूर हटिए. बाहर जाकर घूमिए-फिरिए. देखिए फिजिकल वर्ल्ड में क्या हो रहा है. स्पाय यूनिवर्स के राइटर्स को वही करने की ज़रूरत है. वरना अब इस यूनिवर्स का कोई भविष्य नज़र नहीं आ रहा.

सुंदर बात ये है कि हमें एक बड़े स्केल पर बनी फीमेल सेंट्रिक स्पाय फिल्म देखने को मिल रही है. जिसका नाम 'ऐल्फा' है. फिल्म का टाइटल अपने आप में सोशल कमेंट्री है. गोया किसी पर कटाक्ष कर रही हो. वो मेटाफर जब लिटरल हो जाता है, तो निराशा होती है. इस फिल्म को देखने के बाद लगता है कि जिस मूल आइडिया के साथ इस पर काम शुरू किया गया था, वो समय के साथ बदलता चला गया. और फाइनल कट वैसा नहीं निकला, जो मेकर्स ने ओरिजिनली सोचा था. मगर ये सिर्फ हमारा अजंप्शन है.

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ख़ैर, 'ऐल्फा' एक ऐसी बच्ची की कहानी है, जिससे उसका बचपन छिन गया. जिसकी कभी कोई फैमिली नहीं रही. जिसे उसने अपना परिवार माना, उसी ने उसके साथ विश्वासघात किया. मगर उस लड़की में इसका गुस्सा या किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होती. इन मामलों में जिस इमोशनल डेप्थ की ज़रूरत पड़ती है, वो इस फिल्म में नहीं है. आप खुद को कभी उस कहानी का हिस्सा नहीं मान पाते. ये सोशल मीडिया ट्रोलिंग और बॉक्स ऑफिस के डर से उपजी फिल्म लगती है. उसे किसी भी हाल में सफल होना है. ये प्रेशर उसे कमतर बनाता है. और उसकी रचनात्मक आज़ादी छीन लेता है.

शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं
इतने समझौतों पे जीते हैं कि मर जाते हैं

ये पंक्ति 'ऐल्फा' पर बिल्कुल फिट बैठती है. फिल्म में जितने भी एक्शन सीक्वेंस वो फ्रेश तरीके से कोरियोग्राफ और शूट किए गए हैं. खासकर वो सीक्वेंस जिसमें आलिया और शरवरी के किरदारों के बीच पहली मुलाकात होती है, जो मुक्का-लात में बदल जाती है. मगर बाकी मौकों पर ये फिल्म मोस्टली फ्लैट ही रहती है.  

देखिए सारा मसला ये है कि अगर आप किसी प्री-कंसिव्ड नोशन के साथ ये फिल्म देखने जाएंगे, तो इस बात से फर्क नहीं पड़ेगा कि ये फिल्म असल में कैसी है. अगर फिल्म की मेरिट पर इसे आंकेंगे, तब भी ये कमज़ोर लगेगी. मगर वो ओपिनियन आपका होना चाहिए. सोशल मीडिया ट्रेंड्स के आधार पर राय कायम मत करिए. खुद फिल्म देखकर आइए और तय करिए. 
 

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