# 1) गाइड

गाइड के एक पोस्टर में निर्लिप्त राजू के करैक्टर में देव आनंद
1965 की एक फ़िल्म, जो शायद पूरे भारतीय फ़िल्म इतिहास की सर्वश्रेष्ठ फिल्मों में से एक है. जिसके हर डिपार्टमेंट में एक से एक दिग्गज थे और जिसके हर सीन, हर गीत और हर कलाकार, और उसके इस फ़िल्म से जुड़ाव की कम से कम एक रोचक कहानी और ढेरों ट्रिविया हैं.
गाइड फ़िल्म और उसके म्यूज़िक एल्बम के बारे में अलग अलग लिखा और पढ़ा जाना चाहिए. और म्यूज़िक एल्बम में हर गीत के बारे में भी.
गाइड, जो आर. के. नारायण की नॉवेल ‘दी गाइड’ पर बेस्ड फ़िल्म थी. लेकिन फ़िल्म और नॉवेल में इतना अंतर था कि खुद आर. के. नारायण ने इस फ़िल्म को ‘मिसगाइड – गाइड’ कहा था.
गाइड, जो अपनी रिलीज़ के 42 साल बाद कान में दिखाई गई – 2007 के फ़िल्म फेस्टिवल में.
गाइड, जिसे सत्यजीत रे भी बनाना चाह रहे थे और जो उनकी पहली हिंदी फ़िल्म होती.
तो बेशक हम आज बात कर रहे हैं केवल एक गीत – ‘आज फिर जीने की तमन्ना है...’ की, लेकिन हम गाइड फ़िल्म और इसके गीतों से जुड़े कई और इंट्रेस्टिंग फैक्ट्स भी आपको बताते चलेंगे.
# 2) वहीदा रहमान

वहीदा रहमान - अपने ही बस में नहीं मैं
वहीदा रहमान के बड्डे को लेकर तमाम कन्फ्यूज़न हैं. विकिपीडिया भी उनके बड्डे की दो तारीखें बताता है. 03 फ़रवरी, 1938
और 14 मई, 1938.
लेकिन सारे डाउट क्लियर करते हुए बता दें कि उनका बड्डे 03 फ़रवरी को होता है न कि 14 मई को, जैसा कि बहुत से लोग मानते हैं.
इस मामले में वहीदा रहमान भी कह चुकी हैं कि –
एक साल में दो बड्डे होना किसे अच्छा नहीं लगता लेकिन जब लोग मुझे ग़लत दिन बड्डे विश करते हैं तो उनको सच बताते-बताते शर्मिंदगी सी होने लगती है.गाइड फ़िल्म ऑफर किए जाने से दो तीन साल पहले की बात है. सत्यजीत रे ने वहीदा रहमान को आर. के. नारायण का ‘दी गाइड’ नाम का नॉवेल पढ़ने के लिए कहा. उन्होंने वहीदा से कहा कि वो इस पर फ़िल्म बनाना चाह रहे हैं और मानते हैं कि इसमें रोज़ी का जो किरदार है वो वहीदा से बेहतर कोई नहीं निभा सकता क्यूंकि रोज़ी का किरदार एक डांसर का किरदार है और वहीदा भी एक बेहतरीन डांसर हैं.
ये बात आई-गई हो गई. इसके बाद जब देव आनंद ने ‘गाइड’ फ़िल्म के लिए वहीदा को एप्रोच किया तो वहीदा के आश्चर्य का कोई ठिकाना नहीं रहा. क्यूंकि देव ने वहीदा को बताया कि इस फ़िल्म को लेकर सत्यजीत रे से उनकी कोई बात नहीं हुई, बल्कि उन्होंने तो ये नॉवेल अपने यूरोप प्रवास के दौरान पढ़ा और इसके राइट्स खरीद लिए.
वहीदा का कहना था कि फ़िल्म कोई भी बनाता लेकिन रोज़ी का किरदार उनको ही मिलना था. उस वक्त की कई अभिनेत्रियों ने बाद में वहीदा से संपर्क भी किया – कि अगर किसी वजह से तुम ये रोल नहीं करो तो हमें याद करना.
होने को पहले देव आनंद ने वैजयंती माला को लेने की सोची थी, क्यूंकि वो भी बेहतरीन डांसर थीं. लेकिन बाद में जब देव सा'ब को लगा कि उनकी जोड़ी वहीदा के साथ ज़्यादा फिट बैठेगी तो वहीदा को इस फ़िल्म में कास्ट किया गया.
#3) शैलेंद्र

तीसरी कसम के एक सीन में राजकपूर और वहीदा. फणीश्वर नाथ रेणु द्वारा लिखित कहानी पर बनी इस फ़िल्म के निर्माता शैलेंद्र थे. फ़िल्म क्रिटिक्स द्वारा तो काफी सराही गई लेकिन शैलेंद्र को कंगाल कर गई. होने को तब वो एक गीतकार के रूप में बहुत चल रहे थे लेकिन फिर भी आर्थिक रूप से ही नहीं मानसिक रूप से भी इस फ़िल्म की असफलता ने उन्हें काफी तोड़ा.
शैलेंद्र एक क्रांतिकारी कवि थे. मंचों पर बुलाए जाते थे. ऐसे ही किसी मंच पर राजकपूर ने उन्हें जोश से भरा कविता पाठ करते हुए देख लिया. राज कपूर ने उन्हें फ़िल्म ऑफर की. लेकिन शैलेंद्र कविताओं ही नहीं कर्म से भी गोया क्रांतिकारी. मना कर दिया.
लेकिन एक तरफ घर की बुरी हालत, दूसरी तरफ बीवी की बिगड़ती तबियत और तीसरी तरफ बार-बार राजकपूर द्वारा की जा रही अनुनय विनय, उन्होंने गीत लिखने के लिए हामी भर ही दी. और यूं इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री को सबसे बेहतरीन गीतकारों में से एक – शैलेंद्र मिला.
बहरहाल शैलेंद्र से पहले गाइड में हसरत जयपुरी को लिरिक्स राइटर के रूप में रखा जा रहा था. यानी शैलेंद्र, विजय आनंद की पहली पसंद नहीं थे. लेकिन चूंकि हसरत जयपुरी के साथ बात नहीं बनी, तो विजय आनंद फिर शैलेंद्र के पास गए. शैलेंद्र सीधे तो मना नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने इतने बड़े साइनिंग अमाउंट की मांग कर दी जो देना किसी निर्माता/निर्देशक के बस की बात नहीं थी. लेकिन विजय और देव मान गए. और यूं उन्होंने गाइड के गीत लिखे और लिखा – 'कांटों से खींच के ये आंचल' भी.
होने को ‘दिन ढल जाए, हाय रात न जाए...’ का मुखड़ा हसरत जयपुरी लिख चुके थे. और यही वो गीत था जो देव और विजय को पसंद न आया था. लेकिन बाद में शैलेंद्र ने बाकी की लाइनें लिखीं.
आगे बढ़ने से पहले सुनिए 2016 में आई सुपरहीरो की मूवी डेडपूल में शैलेंद्र का लिखा एक वर्ल्ड – फेमस गीत.
#4) विजय आनंद

विजय आनंद
गाइड हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ बन रही थी. हिंदी में इसे चेतन आनंद निर्देशित कर रहे थे और अंग्रेजी में टेड डेनियलेविस्की. चेतन आनंद अपनी पहली ही फ़िल्म – 'नीचा नगर', जिसने कान में प्रथम ग्रां प्रीं अवार्ड जीता, से विश्व प्रसिद्ध निर्देशक हो गए थे.
बहरहाल, गाइड की शूटिंग शुरू हुई तो टेड और चेतन के बीच कैमरा एंगल और शॉट वगैरह को लेकर गहमागहमी हो गई, इसके चलते निर्माता – देव आनंद ने निर्णय लिया कि पहले अंग्रेजी वाले वर्ज़न की शूटिंग कर ली जाए फिर हिंदी वाले की. अंग्रेजी वाला वर्ज़न बना, रिलीज़ हुआ और फ्लॉप हो गया. अब तक चेतन आनंद अपने ड्रीम प्रोजेक्ट – हक़ीकत में बिज़ी हो चुके थे. हक़ीकत को पंजाब सरकार द्वारा प्रोड्यूस किया जा रहा था.
इसलिए गाइड फ़िल्म के निर्देशन के लिए देव ने अपने दूसरे भाई विजय आनंद को एप्रोच किया. विजय आनंद इस फ़िल्म को करने के लिए राज़ी तो हो गए मगर उनकी एक शर्त थी. वो ये कि फ़िल्म की स्क्रिप्ट वो खुद लिखेंगे. और यूं उन्होंने पहले वाली स्क्रिप्ट को नकार कर, आर. के. नारायण की नॉवल – दी गाइड को पढ़ने के बाद शुरू से गाइड के हिंदी वर्ज़न की स्क्रिप्ट लिखी. वो स्क्रिप्ट जिस पर गाइड हिंदी में बनी.
#5) एस. डी. बर्मन

बाएं से दाएं - आशा, आर डी बर्मन, मीरा बर्मन, एस डी बर्मन
देव आनंद का मानना था कि एस.डी. बर्मन के अलावा इस फ़िल्म का म्यूज़िक कोई और दे ही नहीं सकता. लेकिन एस. डी. बर्मन तो बहुत बीमार चल रहे थे. देव आनंद के कॉम्प्रोमाईज़ करने के बदले इंतज़ार करना चुना और अंततः एस. डी. बर्मन ही इस फ़िल्म के संगीतकार बने.
‘आज फ़िर जीने की तमन्ना है...’ एस. डी. बर्मन की ऐसी कंपोजिशन है जो मुखड़े (आज फिर जीने की तमन्ना है...) से नहीं अंतरे से (कांटों से खींच के ये आंचल...) से शुरू होती है. –
कांटो से खींच के ये आंचल, तोड़ के बंधन बांधी पायल. कोई न रोके दिल की उड़ान को, दिल वो चला, आ हां हां हां...इस पूरे अंतरे के बाद मुखड़ा आता है –
आज फिर जीने की तमन्ना है, आज फिर मरने का इरादा है.उस वक्त के एक और मशहूर संगीतकार ओ. पी. नैयर ने ‘आज फ़िर जीने की तमन्ना है...’ के बारे में कहा –
‘आज फ़िर जीने की तमन्ना है...’, हिंदी फिल्मो का सर्वश्रेष्ठ गीत है. इसमें गीत के बोल और संगीत जिस तरह से एक दूसरे को पूरी तरह से कॉम्प्लीमेंट करते हैं वैसे किसी और गीत में कभी नहीं किए.बहरहाल तीन और मज़ेदार फैक्ट बाकी गीतों से जुड़े –
A) बप्पी लाहिड़ी ने शराबी में ‘दे दे प्यार दे’ के लिए ‘गाइड’ फ़िल्म के एक गीत का म्यूज़िक यूज़ किया था. गाइड का वो गीत था - ‘अल्लाह मेघ दे’. और ‘अल्लाह मेघ दे’, खुद एक बंगाली लोक-गीत से इंस्पायर्ड था.
B) ‘मो से छल किए जाए’ और ‘क्या से क्या हो गया’ गीत का म्यूज़िक एक ही था बस टैंपो यानी स्पीड अलग थी. ये दोनों गीत फ़िल्म में एक के बाद एक आते हैं और दोनों (क्रमशः नायक और नायिका) की मनोदशा को दर्शाते हैं. जहां रोज़ी यानी वहीदा, राजू यानी देव आनंद के छल की बात कर रही होती है वहीं राजू बेवफ़ाई की जो, कथित तौर पर रोज़ी ने उससे की है.
C) आज जहां पर फ़िल्म में – ‘दिन ढल जाए, रात न जाए...’ है वहां पर पहले ‘हम ही में थी न कोई बात याद न तुम को आ सके...’ था. और ये गीत मुहम्मद रफ़ी ने रिकॉर्ड भी कर लिया था. लेकिन फिर वही बात – परफेक्शन की चाह के चलते ये हटा और ‘दिन ढल जाए, रात न जाए...’ आया.
# 6) लता मंगेशकर

भारत रत्न – लता मंगेशकर
लता मंगेशकर को 6 फ़िल्मफ़ेयर पुरस्कार मिल चुके हैं, जिनमें से एक इस मूवी के लिए मिला था. और गीत था, वही जिसकी बात हम कर रहे हैं – ‘आज फिर जीने की तमन्ना है...’. होने को शुरुआत में उन्हें ये गीत ख़ास पसंद नहीं था. उन्होंने खुद ये बात कही –
गाइड फ़िल्म का मशहूर गाना, ‘आज फिर जीने की तमन्ना है...’, जब बर्मन दादा ने सुनाया, तब देव आनंद सा’ब को वो धुन बिल्कुल अच्छी नहीं लगी और मैं भी बहुत खुश नहीं थी. लेकिन डायरेक्टर विजय आनंद जी का निर्देशन और वहीदा जी की खूबसूरत अदाकारी ने हमारी राय बदलने पर हमें मजबूर कर दिया.# 7) रोज़ी, राजू और ये गीत

'याद में नशा करता हूं, और नशे में याद करता हूं.' (गाइड फ़िल्म का एक डायलॉग)
रोज़ी का पति गाने बजाने को लेकर रोज़ी से नाराज़ है इसलिए रोज़ी अपनी सबसे फ़ेवरेट चीज़ – नाचना, त्याग देती है. लेकिन इस गीत से पहले आत्महत्या के कुछ असफल प्रयासों के बाद उसे राजू और पायलों के रूप में एक नई आज़ादी का अनुभव होता है. अवसादों वाली रोज़ी का जब कायांतरण होता है तो ठीक इस गीत से पहले राजू कहता है –
मेरी समझ में नहीं आ रहा. कल तक आप लगती थीं 40 साल की औरत जो ज़िंदगी की हर ख़ुशी हर उमंग हर उम्मीद बीच कहीं रास्ते में खो आई है. और आज लगती हैं 16 साल की बच्ची – भोली, नादान, बचपन की शरारत से भरपूर.तब रोज़ी उत्तर देती है –
जानते हो क्यूं?और फिर गीत गाती है –
कांटो से खींच के ये आंचल, तोड़ के बंधन बांधी पायल. कोई न रोके दिल की उड़ान को, दिल वो चला, आ हां हां हां...एक दूसरे अंतरे में जब शैलेंद्र लिखते हैं –
जाने क्या पाके मेरी ज़िंदगी ने, हंस कर कहा हा हा हा...तो एक जीनियस का काम दिखता है. क्यूंकि इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता, जो काफ़िया (राइमिंग) भी मिला दे और पूरा अंतरा जस्टिफाई भी कर दे.
# 8) पद्मावती

जिस चीज़ के चलते पद्मावती विवादों में रही, उसका एक पैसिव रेफरेंस इस गीत में भी है.
इस गीत को चित्तौड़गढ़ किले में शूट किया गया था. चित्तौड़गढ़ किले में रानी 'पद्मिनी' का तिमंजिला महल है. वही रानी जिस पर ‘पद्मावती’ या ‘पद्मावत’ नाम की फ़िल्म बेस्ड थी.
‘आज फिर जीने की तमन्ना है...’ गीत में महल के दर्पणों में से एक में रोज़ी का प्रतिबिंब बनना - राजा रतन सिंह, पद्मिनी और अलाउद्दीन खिलजी की उस कहानी से इंस्पायर्ड है जिसमें अलाउद्दीन खिलजी पद्मिनी का प्रतिबिंब दर्पण में देखकर उसपर मंत्रमुग्ध हो जाता है और चित्तौड़ में आक्रमण करता है.
# 9) आर. के. नारायण

दी गाइड को पेंगुइन पब्लिकेशन ने प्रकाशित किया है, जो ऑनलाइन भी खरीदी जा सकती है.
‘दी गाइड’ वो नॉवेल जिसपर ये मूवी बेस्ड थी लिखने के लिए आर. के. नारायण को एक असली घटना से प्रेरणा मिली. राजू और रोज़ी की प्रेम कहानी, रोज़ी की आज़ादी और राजू का निर्वाण से इतर उपन्यास का मुख्य प्लॉट सूखे का प्रकोप था. आर. के. नारायण के गृह नगर मैसूर में यह आपदा वास्तव में आई थी. जब प्रकृति के इस प्रकोप के सामने सभी लोग हतोत्साहित हो चुके थे तो वहां के नगरपालिका परिषद ने अनुष्ठानों और प्रार्थनाओं का सहारा लिया. ब्राह्मणों का एक समूह सूखी कावेरी नदी पर खड़ा रहा. बारहवें दिन वास्तव में बारिश हो गई.
आर. के. नारायण ने फ़िल्म देखने के बाद असंतोष व्यक्त किया. खासतौर पर इसके अंग्रेजी वाले वर्ज़न को तो सिरे से नकारते हुए - ‘मिसगाइड – गाइड’ की संज्ञा दे डाली.
और अंत में आपको छोड़े जाते हैं उस गीत के साथ, जिसको लेकर ये पूरा लेख लिखा है:
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