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उस गीत की कहानी जिसे लिखने में जावेद अख्तर के पसीने छूट गए थे

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वो ऐसा दौर था जब हिंदी फिल्मों का संगीत अपने ढलान में था. उसी दौर का अप्रैल का महीना रहा था. और इस फ़िल्म – ‘1942 अ लव स्टोरी’ ने आते ही रजत पटल पर धमाल मचा दिया था.

धमाल मचा दिया था कहना शायद सही नहीं होगा. क्यूंकि फ़िल्म एक औसत हिट रही थी.

लेकिन धीरे-धीरे कल्ट बनती चली गई. खास तौर पर इसके गीत – ‘कुछ ना कहो’, ‘प्यार हुआ चुपके से’, ‘रूठ न जाना’, ‘रिमझिम-रिमझिम’…

सारे ही गीत, जो लोगों की ज़ुबान पर 1993 में चढ़े और आज तक नहीं उतरे हैं. लेकिन इन सभी गीतों में सबसे स्पेशल गीत था – ‘इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.’

ये गीत दरअसल न होते-होते, ‘हो गया’. फ़िल्म में बाकी गीतों की सिचुएशन तो थी लेकिन इस गीत की नहीं थी. लेकिन जब इस फ़िल्म के गीतकार, जावेद अख्तर ने स्क्रिप्ट पढ़ी तो उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा को मनाने की कोशिश की, कि जब लड़का लड़की को गांव में ढूंढ रहा है, तो वहां पर भी एक गीत होना चाहिए. जावेद अच्छे स्क्रिप्ट राइटर रह चुके थे, तो उनकी इंस्टिंक्ट के ऊपर कोई शक न था. फिर भी तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए विधु ना-नुकुर करते रहे और अंत में पीछा छुड़ाने के लिए जावेद से बोले – ‘चलिए आप गीत तो लिखिए फिर देखते हैं.’

विधु विनोद चौपड़ा
विधु विनोद चौपड़ा

मगर जैसा कि अमूमन शायरों के साथ होता है, जावेद अख्तर के साथ भी हुआ – उन्होंने कोई गीत नहीं लिखा. और सोचा कि अब कौन सा विधु को याद होगा, कौन सा वो उस वक्त भी अति उत्सुक था.

तो यही सब सोच के जब वो अगली सिटिंग के लिए विधु और कंपोजर आर डी बर्मन के पास पहुंचे तो विधु ने छूटते ही पूछा – ‘लिखा आपने गीत?’

होने को इस स्थिति में कोई भी बगले झांकने लग जाता, लेकिन जावेद सा’ब ठहरे जीनियस. उन्होंने तुरंत कहा – ‘मैंने सोचा कि आप इंट्रेस्टेड नहीं है तो क्या ही कोई गीत लिखूं, वरना तो ऐसा कुछ सोच रहा था – एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा.’

आर डी बर्मन इंट्रेस्टेड हुए. बोले – ‘तुरंत लिखो.’ जावेद को अब काटो तो खून नहीं. बहरहाल बैठ गए किनारे में, जैसे तैसे अंतरा लिखा –

जावेद अख्तर
जावेद अख्तर

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…

जैसे खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख्वाब
जैसे उजली किरण, जैसे बन में हिरन.
जैसे चांदनी रात, जैसे नरमी की बात
जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया.

बर्मन दा और विधु को गीत पसंद आ गया. बर्मन दा ने टास्क दे दिया जावेद अख्तर को – ‘बस! इसमें अंतरों में भी ऐसा ही फील रखना. ऐसा ही बोले तो – उपमाएं ही उपमाएं.’ मगर जावेद सा’ब अब इतनी उपमाएं लाएं कहां से!! तो उन्होंने बॉल फिर बर्मन दा को पास कर दी – ‘आप पहले म्यूज़िक तो बनाइए.’

बर्मन दा गोया नहले पे दहला – ‘बनाइए? अरे मैं तो बना चुका.’ और हारमोनियम उठाया और तुरंत धुन बजाने लगे.

जावेद सा’ब उनकी इस दक्षता के बारे में कहते भी हैं कि ‘आर. डी. बर्मन के लिए ये कोई नई चीज़ नहीं थी. वो आधे मिनट में मन ही मन में ट्यून कंपोज़ कर लिया करते थे.’ फिर भी न जाने उन्होंने बर्मन दा के सामने ये शर्त क्यूं रक्खी.

बहरहाल फिर बॉल जावेद के कोर्ट में. वो जावेद जो आधे घंटे में एक बेहतरीन गीत लिख लेते थे. उन्होंने दो अंतरे तो बना लिए – भर भर के सिमली (उपमाएं) डालीं, लेकिन फिर तीसरे अंतरे तक पहुंचते-पहुंचते थक गए. दोनों साथियों से कुछ और देर की मोहलत मांगी.

उनके लिए उपमाएं ढूंढना मुश्किल नहीं था, लेकिन वो इस गीत को प्योर और इनोसेंट रखना चाह रहे थे, शराब, जाम, हुस्न, लब जैसे शब्दों को खुद ही निषेध करके खुद के लिए एक टास्क निर्धारित कर दिया था. और इस टास्क को पाने में लग गए पूरे दो दिन.

यूं गीत आया, गीत 21 उपमाओं वाला और आज तक हिंदी गीतों के इतिहास में लैंडमार्क है. लिरिक्स देखिए –

बर्मन दा
बर्मन दा

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…

जैसे खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख्वाब,
जैसे उजली किरण, जैसे बन में हिरन.
जैसे चांदनी रात, जैसे नरमी की बात,
जैसे मन्दिर में हो एक जलता दिया.

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…

जैसे सुबह का रूप, जैसे सरदी की धूप,
जैसे वीणा की तान, जैसे रंगों की जान.
जैसे बलखायें बेल, जैसे लहरों का खेल,
जैसे खुशबू लिये आये ठंडी हवा.

एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा…

जैसे नाचता मोर, जैसे रेशम की डोर,
जैसे परियों का राग, जैसे सन्दल की आग.
जैसे सोलह सिंगार, जैसे रस की फुहार,
जैसे आहिस्ता आहिस्ता बढ़ता नशा.

उस वक्त उत्तराखंड नहीं बना था लेकिन उस वक्त मैं उत्तराखंड में रहता था. मेरे शहर से कोई चालीस पचास किलोमीटर की दूरी पर इस फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी. जगह थी कौसानी. जब फ़िल्म रिलीज़ हुई तो आस पास के पहचाने हुए इलाके फ़िल्म में पहचानने की कोशिश की, और इसी दौरान पूरा गीत याद हो गया.

होने को ये भी एक ट्रिविया है कि यह पहली फ़िल्म थी जिसमें डॉल्बी – स्टीरियो यूज़ किया गया था.

'1942 अ...' में कौसानी का एक विहंगम दृश्य
‘1942 अ…’ में कौसानी का एक विहंगम दृश्य

खैर सा’ब, उस दौर की बाकी फिल्मों को आप देखेंगे तो आप ये कहेंगे कि ये फ़िल्म अपने वक्त से पहले और अपने वक्त से आगे की फ़िल्में एक साथ थी. इसका ऑडियो एल्बम भी. फिल्मों में शायरियां लगभग ख़त्म हो गईं थीं. आर. डी. बर्मन फ्लॉप हो चुके थे. फ्लॉप हो चुके थे इसलिए किनारे कर दिए गए थे. उस दौर में विधु का बर्मन दा पर विश्वास जताना एक पहले से ही हार चुका दांव खेलने सरीखा था.

साथ ही इसे भी करेला वो भी नीम चढ़ा कहा जाएगा कि उन्होंने जावेद अख्तर को भी ऐसे गीत लिखने को कहा कि जो गीत कम, और कविताएं या शायरियां ज़्यादा लगें.

आर. डी. बर्मन ये फिल्म उस समय में कर रहे थे जब उनका करियर पूरी तरह उतार पर आ गया था. वे अपना आत्मविश्वास इतना अधिक खो चुके थे कि किसी बात पर एक दिन विधु विनोद चौपड़ा के सामने रो पड़े – ‘कहीं तुम मुझसे ये फ़िल्म छीन तो नहीं रहे हो न?’

एक जीनियस को ये दिन देखना पड़ा कि मज़बूरी गिडगिडाहट में बदल गई.

कुमार शानू
कुमार शानू

खैर फ़िल्म रिलीज़ हुई, बर्मन म्यूज़िक वर्ल्ड में धमाकेदार कमबैक कर चुके थे. लेकिन अपनी ये आखिरी सफलता और पहला कमबैक देखने से पहले ही, वो इस फ़ानी जहान को अलविदा कर चुके थे.

और यूं वो कभी कमबैक न कर पाए.

कुमार शानू को इस गीत के लिए फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला. गाने के लिए. और बाकियों को यानी – आर डी बर्मन और जावेद अख्तर को भी. मिलना ही था. नहीं मिलता तो फ़िल्म और इस गीत के ऊपर नहीं फ़िल्मफ़ेयर के ऊपर शक होने लग जाता.


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