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ममता बनर्जी के हाथ से बंगाल फिसलने की पांच बड़ी वजहें

West Bengal Election Result 2026: ममता बनर्जी का तीसरा कार्यकाल बिल्कुल भी आसान नहीं रहा है. इस दौरान कई सारी घटनाएं हुईं, जिनसे पार्टी की साख पर सवाल उठे. इनमें संदेशखाली हिंसा और आरजी रेप-मर्डर केस, शिक्षक भर्ती घोटाला और दूसरे भ्रष्टाचार के आरोप शामिल हैं.

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तृणमूल कांग्रेस (TMC) 88 सीटों पर सिमट गई है. (फाइल फोटो: आजतक)

पश्चिम बंगाल की 293 विधानसभा सीटों पर गिनती जारी है. बीजेपी 197 सीटों पर आगे चल रही है. तृणमूल कांग्रेस (TMC) साल 2021 के विधानसभा चुनावों में 215 सीटों पर काबिज हुई थी. वह घटकर अब सिर्फ 88 सीटों पर सिमट गई है. यह महज हार नहीं है. यह एक तरह का विस्थापन है. एक सामूहिक विस्थापन. बेशक, आंकड़े तो बेजान होते ही हैं. लेकिन जब ये आंकड़े किसी पार्टी के वर्चस्व पर चोट करते हैं तो उन फैक्टर्स को जानना जरूरी हो जाता है, जिनकी वजह से इतना बड़ा बदलाव हुआ.

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15 साल की एंटी-इंकम्बेंसी

ममता बनर्जी का तीसरा कार्यकाल बिल्कुल भी आसान नहीं रहा है. इस दौरान कई सारी घटनाएं हुईं, जिनसे पार्टी की साख पर सवाल उठे. इनमें संदेशखाली हिंसा और आरजी रेप-मर्डर केस, शिक्षक भर्ती घोटाला और दूसरे भ्रष्टाचार के आरोप शामिल हैं. राज्य में लगातार 15 सालों तक शासन करने के बाद, सरकार के खिलाफ जनता में एक स्वाभाविक असंतोष और बदलाव की इच्छा देखी गई.

NDTV के सीनियर पत्रकार अजीत कुमार झा लिखते हैं कि वोटर हमेशा इसलिए पार्टी नहीं बदलते क्योंकि उन्हें अचानक किसी नई पार्टी से प्यार हो जाता है. वे इसलिए भी बदलते हैं क्योंकि वे अब पुरानी कहानी में ज्यादा दिन नहीं रह सकते.

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बेरोजगारी और औद्योगिक विकास की कमी

राज्य में बढ़ती बेरोजगारी ने मतदाताओं, खासकर युवाओं को टीएमसी से दूर कर दिया. सिलीगुड़ी और कोलकाता के पास के इंडस्ट्रियल एरिया में नई बड़ी कंपनियों के न आने से युवाओं को लगा कि राज्य में उनके लिए करियर के ज्यादा मौके नहीं हैं. जब पड़ोसी राज्यों (जैसे ओडिशा या तेलंगाना) में निवेश बढ़ा, तो बंगाल का युवा खुद को पिछड़ा महसूस करने लगा.

बंगाल के पढ़े-लिखे युवाओं को अच्छी नौकरी के लिए बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे या नोएडा जैसे शहरों का रुख करना पड़ता है. अपनी जड़ों से दूर होने की इस मजबूरी ने युवाओं के मन में सत्ता के प्रति नाराजगी पैदा की. शिक्षक भर्ती जैसे घोटालों ने भी युवाओं के भरोसे को बुरी तरह तोड़ा.

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महिलाओं की नाराजगी

महिला मतदाताओं ने 2021 में भारी संख्या में TMC का समर्थन किया था, लेकिन 2026 में उन्होंने अपना पाला बदल लिया. इसकी खास वजह महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा था. कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में 9 अगस्त 2024 को एक ट्रेनी डॉक्टर के साथ रेप के बाद उनकी हत्या कर दी गई. इस घटना ने महिलाओं के अंदर एक स्वाभाविक गुस्सा पैदा कर दिया. अजीत कुमार लिखते हैं,

“जब किसी समाज को यह महसूस होता है कि राज्य उनकी रक्षा करने में नाकाम रहा है, तो वह न केवल नीतियों के लिए, बल्कि अपनी गरिमा के लिए भी वोट देना शुरू कर देता है.”

तुष्टिकरण का टैग

बीजेपी की रणनीति ने ममता बनर्जी पर ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ का आरोप लगाया, जिससे हिंदू वोटर्स का ध्रुवीकरण हुआ और बीजेपी को बढ़त मिली. बीजेपी ने पड़ोसी देश बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रही हिंसा का मुद्दा भी जोर-शोर से उठाया, ताकि हिंदू वोटों को एकजुट किया जा सके. 

TOI की रिपोर्ट के मुताबिक, सितंबर 2025 में पश्चिम ममता बनर्जी ने एक दुर्गा पूजा पंडाल में शिरकत करने के दौरान एक गीत गाया था- ‘दिल में काबा, नजर में मदीना’. इस पर खूब राजनीतिक विवाद हुआ था. बीजेपी नेताओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई और इसे ‘तुष्टिकरण की राजनीति’ और ‘हिंदू धर्म के प्रति अनादर’ करार दिया.

SIR का असर

स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के तहत पश्चिम बंगाल से करीब 90 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए. इसका असर उन प्रवासियों पर पड़ा जो काम की तलाश में राज्य से बाहर (जैसे दिल्ली-एनसीआर या साउथ इंडिया भारत) रहते थे. उन्हें डर था कि अगर वे वोट देने नहीं लौटे, तो उनका नाम कट जाएगा. बड़ी संख्या में घर लौटे इन प्रवासी श्रमिकों और युवाओं ने अपनी ‘मजबूरी के पलायन’ का गुस्सा वोट के जरिए निकाला.

वीडियो: पश्चिम बंगाल में बंगाली इलीट भी ममता से नाराज़? ममता के गढ़ की एक-एक बात

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