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2011 में ममता के मंच पर अनदेखी, शुभेंदु अधिकारी वो 'अपमान' कभी नहीं भूल पाए

शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता, जो राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से भरे और पार्टी के भीतर इतने एक्टीव हों. उनके लिए इस घटना को भूलना काफी मुश्किल रहा. अधिकारी के लिए ये घटना किसी ‘अपमान’ से कम नहीं थी. दूर से देखने पर दर्शकों को लगा होगा कि कुछ नहीं हुआ है.

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शुभेंदु के ममता से अलग होने की कहानी. (फोटो- इंडिया टुडे)

पश्चिम बंगाल में साल 2026 के विधानसभा चुनाव में बड़ा राजनीतिक फेरबदल देखने को मिला है. बंगाल में ममता बनर्जी के अभेद्य राजनीतिक किले को उनके ही एक पूर्व ‘साथी’ ने ढाह दिया. वो शख्स कोई और नहीं बल्कि पश्चिम बंगाल के नए मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी हैं. शुभेंदु कभी ममता बनर्जी के सबसे विश्वस्त सहयोगी होते थे. बंगाल में टीएमसी की जड़ें जमाने में उनका बड़ा हाथ है. लेकिन फिर ऐसा क्या हुआ कि शुभेंदु ने ‘दीदी’ से अपने रास्ते न सिर्फ अलग कर लिए बल्कि बंगाल में उनके सबसे बड़े सियासी दुश्मन बनकर सामने आए. 

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इस सवाल का जवाब एक लंबी कहानी है, जिसके जड़ें 2011 तक जाती हैं. यानी तब ही जब ममता बनर्जी की पहली बार वाली सरकार नहीं आई थी. शुभेंदु के मन में ममता से बगवात के अंकुर तभी फूटने लगे थे. क्या है कहानी, आज हम आपको विस्तार से बताएंगे. 

NDTV में जयंता घोषाल के एक लेख के मुताबिक, शुभेंदु के TMC से अलग होने की ये कहानी साल 2011 में शुरू हो गई थी. उस समय वो युवा तृणमूल कांग्रेस के अध्यक्ष थे. पार्टी में उन्हें एक तेजतर्रार नेता और ममता के करीबी के तौर पर जाना जाता था. शुभेंदु ने पार्टी को मजबूत बनाने के लिए काफी मेहनत भी की. इस दौर में बंगाल में ममता और उनकी पार्टी दोनों की ही तूती बोलती थी. साल 2011 में ही ममता के नेतृत्व में कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड और धर्मतला में बड़े पैमाने पर रैली का आयोजन किया गया.

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इसी रैली में पहली बार शुभेंदु अधिकारी को बड़ा झटका लगा, जब उन्हें पार्टी में ‘साइड’ कर देने का एहसास हुआ. पार्टी का एक महत्वपूर्ण नेता होने के बावजूद शुभेंदु को रैली का मोर्चा संभालने को नहीं मिला. उनकी जगह पार्टी के दूसरे नेता कुणाल घोष रैली की सारी जिम्मेदारी उठा रहे थे. वही मंच संचालन कर रहे थे. पार्टी की ओर से हर घोषणा का उद्घोष कुणाल घोष कर रहे थे. इस रैली में शुभेंदु मंच पर एकदम शांत बैठे रहे. जैसे कोई मूकदर्शक हों. जैसे सिर्फ दिखावे के लिए उन्हें मंच पर बैठा दिया गया हो.

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शुभेंदु-ममता साथ में.

राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं पर गहरी चोट-

शुभेंदु अधिकारी जैसे नेता जो राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से भरे थे, उनके लिए यह कोई सामान्य घटना नहीं थी. ये कोई मामूली अपमान नहीं था. दूर से देखने वालों को लगा होगा कि कुछ नहीं हुआ है लेकिन कहते हैं कि इसी घटना ने शुभेंदु के मन में TMC से अलगाव का बीज बो दिया था. रिपोर्ट्स बताती हैं कि तब शुभेंदु को लगा था कि कुणाल घोष ने पार्टी में उनकी जगह ले ली है और इसमें ममता बनर्जी की भी ‘हामी’ है. 

दरअसल, उस दौर में कई युवा नेता राजनीतिक तौर पर ममता के करीबी बनने की होड़ में लगे रहते थे. इसमें शुभेंदु अधिकारी का भी नाम शामिल था लेकिन अधिकारी एक जिद्दी और स्वाभिमानी नेता माने जाते थे. उन्हें ऐसे व्यक्ति के तौर पर माना जाता था जो अपमान आसानी से नहीं भूलते थे.

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बात यहीं तक रहती तो भी ठीक था. इसके कुछ समय के बाद शुभेंदु को एक और बड़ा झटका लगा, जब उन्हें पता चला कि यूथ TMC के अध्यक्ष पद पर उनकी जगह सौमित्र खान को नियुक्त कर दिया गया है. शुभेंदु के लिए यह घटना किसी ‘धोखे’ से कम नहीं थी. उस दौर में TMC के नेता और ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी पार्टी के भीतर किसी बड़े रोल में नहीं थे. फिर भी ममता के उत्तराधिकारी के तौर पर उनके नाम की सुगबुगाहट होने लगी थी. वहीं पार्टी में मुकुल रॉय के उभरने से भी शुभेंदु को दिक्कत हुई. इससे पार्टी में दूसरे नंबर की पोजिशन का उनका दावा बार-बार चैलेंज होता, जिसने उन्हें टीएमसी में काफी असुरक्षित कर दिया था. 

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शुवेंदु अधिकारी. 

शुभेंदु अधिकारी ये सारी घटनाएं बारीकी से देख रहे थे. साथ ही पार्टी के भीतर अपनी भूमिका और हाथों से खिसक रहे पद को लेकर मन ही मन सुलग भी रहे थे. वह धीरे-धीरे पार्टी के भीतर खुद को अलग-थलग होता हुआ पा रहे थे. यानी ममता के करीबी होने के बाद भी दूसरे नंबर की पोजिशन से उनकी दूरी बढ़ती जा रही थी. 

BJP को TMC के भीतर की खबर

BJP नेताओं को TMC के भीतर चल रहे इस खींचतान की भनक लग चुकी थी. शायद इसी वजह से BJP ने शुभेंदु से संपर्क साधना शुरू कर दिया था. हालांकि BJP की ये राह आसान नहीं थी. क्योंकि, शुभेंदु के पिता शिशिर अधिकारी कांग्रेसी नेता थे. वो पार्टी से अलग होने की बात के खिलाफ थे. कई जानकार ऐसा भी कहते हैं कि जब शुभेंदु TMC छोड़ने पर विचार कर रहे थे तो ममता बनर्जी ने शुभेंदु के पिता शिशिर से मदद भी मांगी थी. बताया जाता है कि ये मनमुटाव असल में ममता और शुभेंदु के बीच नहीं था बल्कि टीएमसी में अभिषेक बनर्जी का बढ़ता प्रभाव शुभेंदु को बिल्कुल रास नहीं आ रहा था.

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अभिषेक बनर्जी.

उधर बीजेपी भी यह अच्छे से जानती थी कि अगर शुभेंदु उनकी पार्टी में शामिल हो गए तो वह केवल दलबदलू नेता के तौर पर नहीं जाने जाएंगे. बल्कि, ममता के कट्टर विरोधी और बंगाल की क्षेत्रीय राजनीति को बदलने वाली ताकत के तौर पर उभरेंगे. यानी एक ऐसी ताकत जो राज्य में सत्ता पर काबिज पार्टी के खिलाफ खुलकर फ्रंटफुट पर खड़ा है. लेकिन बीजेपी की ओर से अभी ताबूत में आखिरी कील लगाना बाकी था.

दीघा की रैली ने खेल कर दिया

TMC ने दीघा में एक बड़े प्रोग्राम का आयोजन किया था. प्रोग्राम में शुभेंदु भी मुख्य कार्यकर्ताओं में से एक थे. उन्हें इस प्रोग्राम को लेकर काफी उम्मीदें थीं कि शायद उन्हें इसका क्रेडिट मिलेगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. यही वो आखिरी घटना थी, जिसने शुभेंदु को TMC से अलग होने के लिए प्रेरित कर दिया. 

शुभेंदु अधिकारी 19 दिसंबर 2020 में आधिकारिक तौर पर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए. उनके बीजेपी में शामिल होने के प्रोग्राम में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी मौजूद थे. इसके बाद जो-जो हुआ वो इतिहास है. साल 2021 के बंगाल विधानसभा चुनाव में शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को नंदीग्राम में हरा दिया.

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मोहन भागवत.

BJP में शामिल होने के बाद शुभेंदु RSS के भी करीब होते गए. RSS का एक प्रोग्राम उस समय चर्चा का केंद्र बन गया, जब शुभेंदु अधिकारी प्रोग्राम में RSS के पारंपरिक वर्दी ‘गणवेश’ में पहुंचे. वहीं, जुलाई 2023 में भी शुभेंदु RSS के एक प्रोग्राम में पहुंचे जहां, संघ प्रमुख मोहन भागवत भी मौजूद थे. इसके बाद कई जानकारों ने इस बात की पुष्टि कि RSS ने उन्हें औपचारिक रूप से 'संघ परिवार' का हिस्सा मान लिया है.

वीडियो: नेतानगरी: बंगाल में ममता क्यों हारीं? शुभेंदु को CM बनाना BJP का दांव या मजबूरी? इनसाइड स्टोरी समझिए

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