जरा सोचकर देखिए, कैसा होगा वो फ्यूचर जिसमें हर घर में आइंस्टाइन के दिमाग, सचिन के टैलेंट, ऋतिक रौशन के लुक्स वाले बच्चे हों? सब डोले-शोले लेकर पैदा हों. कैसा होगा अगर कैंसर जैसी बीमारियां गायब ही हो जाएं? याद्दाश्त हाथी से ज्यादा तेज, नज़र बाज़ से ज्यादा पैनी और कान कुत्ते से भी तेज सुन लें?
लैब में बनेंगे आइंस्टीन, तेंदुलकर? Gene Editing को अच्छे से समझ लीजिए
CRISPR-Cas9 की मदद से वैज्ञानिक Sickle Cell Anemia जैसी बीमारियों का इलाज ढूंढने में लगे हैं. इसमें काफी हद तक सफलता भी मिली है. मगर साथ ही सवाल उठता है कि किस हद तक Gene-Editing कुदरत को मानती है और कहां ये अनैतिक हो जाती है.


वैसे तो कुछ एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी क्वॉलिटीज या तो कुदरत इंसान को देती है या वो टाइम के साथ हासिल करता है. मगर आज साइंस ऐसी छलांग लगा चुका है कि आपको जैसा फ्यूचर चाहिए, जीन में डलवा लीजिए. या यूं कहें, एक्स्ट्रा-ऑर्डिनरी इंसान, ऑन डिमांड.
1997 में एक हॉलिवुड फिल्म आई थी- Gattaca. ये ऐसे फ्यूचर में सेट थी जहां सोसायटी जेनेटिकली परफेक्ट लोग चला रहे थे. पैदा होने के पहले बच्चों का DNA ध्यान से क्राफ्ट किया जाता था. कोई कितना सुंदर होगा, कितना पावरफुल, कितना इंटेलिजेंट होगा, ये डिसाइडेड था. और जो नैचुरली पैदा होते थे, उन्हें दीन-हीन दुखियारे की तरह ट्रीट किया जाता था.
करीब 30 साल पहले आई ये फिल्म कहने को फिक्शन थी, मगर इस दरम्यान साइंस ने ऐसी छलांगें मारी हैं कि इसका रियलिटी बनना शायद ज्यादा दूर ना हो. और ये बात जितनी ज्यादा एक्साइटिंग लग सकती है, उससे भी ज्यादा पसोपेश में डालने वाली है.
कैसे CRISPR-Cas9 जीन-एडिटिंग जैसा साइंटिफिक टूल फिक्शन को रियलिटी में बदलता नजर आ रहा है- DNA के साथ छेड़छाड़ ह्यूमन इंटिलेजिंस की मिसाल है या कुदरत का अपमान? क्या व्यापारियों के हाथ में टेस्ट-ट्यूब थमाना एक न्याय-पसंद सोसायटी के लिए खतरा है? क्या साइंटिस्ट्स का अति-महत्वाकांक्षी होना इवलूशन के साथ छेड़छाड़ है?
DNA एडिटिंग का व्यापार30 साल की चाइनीज-कनैडियन साइंटिस्ट कैथी टाई बायोटेक बार्बी कही जाती हैं. या यूं कहें बायोटेक बिजनेसवुमन बार्बी जिसकी देश में एंट्री को चीन ने बैन कर रखा है.
कैथी कभी घोड़ों से यूनिकॉर्न बनाने की चाह रखती थीं. अब उनका फोकस इंसानी DNA को एडिट करने पर है ताकि हेरिडिटरी बीमारियों को खत्म किया जा सके. यानी ऐसी बीमारियों को जिनकी जड़ पैरंट्स के डीएनए में होती है, और फिर बच्चों में ट्रांसफर हो जाती है. मगर ये तो अच्छी चीज़ है, फिर चीन ने उन्हें बैन क्यों किया है. वजह हैं, उनके पति He Jiankui.
2018 में He Jiankui ने पूरे साइंस वर्ल्ड को हिलाकर रख दिया. Jiankui ने दुनिया को बताया कि उन्होंने दो बच्चियों के पैदा होने के पहले ही उनके DNA को एडिट कर दिया है. इन बच्चों के पिता को HIV था, इसलिए डर था कि बच्चों को भी हो सकता है.
HIV इन्फेक्शन शरीर में एक रिसेप्टर प्रोटीन को सीढ़ी बनाकर होता है. अगर इस सीढ़ी के एक स्टेप को ही काट दिया जाए तो इन्फेक्शन भी टाला जा सकता है. Jiankui ने यही किया. उस जीन को एडिट कर दिया जिससे ये रिसेप्टर प्रोटीन बन रहा था. फिर ऐलान किया कि जो बच्चियां पैदा हुई हैं वो नॉर्मल बच्चों की तरह ही स्वस्थ हैं. मगर Jiankui ने ये नहीं बताया कि इस जीत के लिए उन्होंने गेम के कौन-कौन से रूल्स को तोड़ा है.
साइंटिफिक स्टडीज, एक्सपेरिमेंट्स और रिसर्च के कुछ कार्डिनल रूल्स होते हैं, इन्हें लक्ष्मण रेखा समझ लीजिए. इन्हें पार नहीं ही करना है. खासकर तब जब एक्सपेरिमेंट का सब्जेक्ट इंसान हों, बच्चे हों. और उससे भी ज्यादा माइंडफुल तब रहना है जब ये बच्चे अभी इस दुनिया में आए ही ना हों.
यही वजह थी कि अपने एक्सपेरिमेंट के लिए He Jiankui को तीन साल चीन की जेल में गुजारने पड़े. मगर उन्होंने ऐसा किया क्या था? ये जानने के पहले उस टेक्नॉलजी को समझते हैं जिसे इस्तेमाल करके Jiankui ने एक एथिकल डिबेट छेड़ दी.
2012 में Jennifer Doudna, Emmanuelle Charpentier और उनकी टीम ‘साइंस’ जर्नल में एक रिसर्च पेपर पब्लिश करती है. बताती है कि कैसे बैक्टीरिया खुद को वायरस के इन्फेक्शन से बचाते हैं. इसके लिए DNA सीक्वेंस को ही चेंज कर देते हैं और कैसे इससे इंस्पायर होकर इंसानों में भी DNA सीक्वेंस को चेंज किया जा सकता है.
प्रोटीन्स की इंस्ट्रक्शन मैन्युअल- DNAहमारे शरीर के सारे फीचर्स DNA यानी Deoxyribonucleic Acid के बेसिस पर तय होते हैं. हमारी आंखें काली होंगी या भूरी, या कंजी, बाल कैसे होंगे, हाथ-पैर, दिल-दिमाग सब कुछ. हर एक सेल के अंदर DNA होता है जैसे किसी अप्लायंस के साथ एक इंस्ट्रक्शन्स की किताब आती है ना. DNA भी इंस्ट्रक्शन्स की किताब समझ लीजिए.
मान लीजिए आप खाना बनाने जा रहे हैं. आपके पास चावल है, गरम मसाले हैं, दही है, फूड कलर है, अगर नॉन-वेज खाते हैं तो चिकन-विकन भी है. समझ तो गए होंगे, तैयारी है बिरयानी बनाने की. लेकिन अगर ये सब उठाकर कूकर में डाल दिया जाए और सीटी लगा दें, तो क्या बिरयानी बनेगी? खिचड़ी, तेहरी, पुलाव कुछ भी हो, बिरयानी तो डेफिनिटली नहीं होगी.
बिरयानी बनाने के लिए सामग्री को पतीले में डालने का सीक्वेंस जरूरी है. ऐसे ही हमारी बॉडी में ढेर सारे अमीनो एसिड होते हैं. इनमें से 22 सबसे इंपोर्टेंट होते हैं जो प्रोटीन बनाते हैं. बेसिकली ये अमीनो एसिड किस सीक्वेंस में अरेंज हो रहे हैं, एक दूसरे से जुड़ रहे हैं, इससे तय होता है कि कौन सा प्रोटीन बनेगा. यही सीक्वेंस बताने का काम करता है DNA. फिर ये प्रोटीन हमें अलग-अलग फीचर देते हैं.
DNA ट्विस्टेड सीढ़ी की तरह दिखता है. तीन-तीन सीढ़ियां मिलकर बनाती हैं एक कोड, जिसे कोडॉन कहते हैं. यही कोडॉन तय करता है कि प्रोटीन बनाने के दौरान कौन-सा अमीनो एसिड जोड़ा जाएगा. बेसिकली अमीनो एसिड जिस तरह एक-दूसरे से लिंक होते हैं, फोल्ड होते हैं, उससे प्रोटीन बनता है.
होता क्या है कि जो DNA, या इंस्ट्रक्शन का कोड था, वो ट्रांसक्रिप्शन नाम के प्रोसेस से RNA में कन्वर्ट होता है. ये RNA मॉलिक्यूल हैं गेमचेंजर. ये ट्रांसलेशन नाम के प्रोसेस में सेल को बताता है कि प्रोटीन बनाने के लिए अमीनो एसिड को किस सीक्वेंस में लगाना है. किसी कॉन्ट्रैक्टर या ठेकेदार की तरह. अगर सेल्स लेबर हैं, तो RNA उन्हें रेग्युलेट करता है और बताता है कि कैसे प्रोटीन बनेगा.
DNA एडिटिंग के लिए RNA की ये क्वॉलिटी काम आती है. CRISPR यानी Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats, बेसिकली बैक्टीरियल DNA का एक हिस्सा होता है. एक पर्टिकुलर सीक्वेंस. इस सीक्वेंस से इंस्पायर होकर साइंटिस्ट्स एक गाइड RNA बनाते हैं. बेसिकली जिस DNA को आगे जाकर एडिट करना है, उससे मेल खाता हुआ गाइड RNA बनाते हैं. जब वो DNA एडिट होगा तब उससे जुड़े प्रोटीन पर भी असर पड़ेगा.
यहां एंट्री होती है Cas9 की. Cas9 एक प्रोटीन एन्जाइम है जिसे मॉलिक्यूलर कहते हैं, कैंची. यानी जेनेटिक-एडिटिंग का असल काम यही Cas9 करेगा. टारगेट DNA पर ये कैंची चलेगी. हो सकता है ये DNA embryo यानी भ्रूण के अंदर हो.
जो RNA मॉलिक्यूल लैब में तैयार हुआ था, वो कॉम्प्लिमेंटरी DNA को खोजता है. उसके साथ Cas9 चिपका होता है, वो आकर DNA सीक्वेंस पर कैंची चलाता है. सेल रिपेयर के बाद सीक्वेंस एडिट हो गया, यानी प्रोटीन बनने की रेसिपी अब चेंज हो गई. बिरयानी की जगह पुलाव बनने का रास्ता साफ.
यहां तक तो ठीक है. 2012 में ये रिसर्च पब्लिश हुई. इसमें डीटेल में बताया गया कि कैसे CRISPR-Cas9 को एक टेक्नॉलजी के तौर पर जीन-एडिटिंग के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. 2020 में इसके लिए Jennifer और Emmanuelle को नोबेल प्राइज भी मिल गया. ये एक रेवॉलूशनरी पॉइंट था. इसका इस्तेमाल जिस तरह He Jiankui ने किया, वो कॉन्ट्रोवर्शियल हो गया.
साइंस कई बार नेचर को कंट्रोल करने, उसको बदलने का रास्ता दिखाती है. और यहां साइंटिफिक कम्यूनिटी का खुद का विवेक मायने रखता है. एक अनकही बंदिश होती है. जीन्स में जो बदलना है, जो कीमियागिरी दिखानी है, वो सिर्फ एक जेनरेशन में की जानी चाहिए.
हमारे शरीर में दो तरह के सेल्स होते हैं- Somatic और Germline.
Germline मतलब ऐसे सेल जो आगे की पीढ़ियों में ट्रांसफर होते हैं. यानी males के केस में स्पर्म और females के केस में eggs. बाकी सारे सेल्स Somatic cells होते हैं. जैसे आपकी स्किन, बोन्स, नर्व्स वगैरा.
जीन-एडिटिंग पर बवाल क्यों?जीन-एडिटिंग जब तक Somatic cells में की जा रही है, तब तक कोई आंखें नहीं तरेरता. जैसे Victoria Gray के केस में हुआ. 3 महीने की उम्र से ही विक्टोरिया को Sickle Cell Anemia का पता चला. ये ऐसी कंडीशन होती है जिसमें रेड ब्लड सेल्स का शेप sickle या हसिया की तरह होता है. इसकी वजह से ब्लड फ्लो ब्लॉक होता है और ऑक्सिजन की डिलिवरी गड़बड़ा जाती है. भयानक दर्द होता है.
2019 में एक क्लिनिकल ट्रायल हुआ जिसमें Victoria की बॉडी के Somatic Cells में CRISPR-Cas9 टेक्नीक की मदद से एडिटिंग की गई. Sickle Cell Anemia तब होता है जब हीमोग्लोबिन से जुड़ा एक जीन म्यूटेट हो जाता है. यानी हम जो ऊपर सीक्वेंस-सीक्वेंस कर रहे थे, वो यहां बिगड़ जाता है. अब ये जीन पैरंट्स से बच्चे में जाता है. मगर ये बीमारी किसी को तब होती है जब उसे दोनों पैरंट्स से ये बिगड़ा हुआ जीन मिले.
इसीलिए विक्टोरिया के Germline cells में एडिटिंग नहीं की गई. क्योंकि उनके बच्चों को ये बीमारी तभी होगी जब वो पिता से भी mutated genes इनहेरिट करें. इसीलिए सिर्फ Somatic cells को ही एडिट किया गया. He Jiankui की रिसर्च पर साइंटिस्ट्स को इस बात के लिए भी ऑब्जेक्शन था.
एक तो HIV इन्फेक्शन से बचाने और उसके इलाज के लिए दूसरे ऑप्शन्स हैं, Germline cells में जीन-एडिटिंग की जरूरत नहीं थी. यहां म्यूटेशन करने का मतलब है फ्यूचर जेनरेशन, एवलूशन के प्रोसेस में दखल देना. ये नैचरल ऑर्डर के खिलाफ है.
दूसरी चीज, इसके पहले ऐसे भ्रूण पर एक्सपेरिमेंट किए गए हैं, जिनसे आगे चलकर बच्चे नहीं पैदा होने वाले. Consent एक बहुत बड़ा एथिकल पैरामीटर है. ये बच्चे कन्सेन्ट दे नहीं सकते, इसलिए इन भ्रूणों पर एक्सपेरिमेंट करना गलत माना जाता है. इस पर्टिकुलर केस में इशू ये भी रहा कि डेटा ट्रांसपेरेंसी नहीं थी. उन बच्चों में कहीं ऑफ-टारगेट एडिटिंग तो नहीं हो गई. ऐसा तो नहीं हुआ कि कोई और चेंज हुआ हो, जिसके बारे में पता ना चला हो.
मगर इस रिसर्च पर सबसे बड़ा ऑब्जेक्शन प्रिंसिपल के बेसिस पर है. अगर आज बच्चों के पैदा होने के पहले उनके DNA को बीमारी हटाने के लिए एडिट किया जा सकता है तो कल किसी और ऑब्जेक्टिव से भी हो सकता है.
अगर DNA ऐसे ही कस्टमाइज होने लगा तो ये कैसे समाज में खाई पैदा कर सकता है? Birth के पहले जेनेटिक बीमारियों का पता लगाने के लिए एक टेस्ट होता है amniocentesis. इंडिया में इसका इस्तेमाल सेक्स डिटरमिनेशन और फीमेल फीटिसाइड के लिए किया जाने लगा. यानी सामाज की पिछड़ी सोच को और ज्यादा रफ्तार देने के लिए.
ऐसा ही जीन एडिटिंग से हो सकता है. जो लोग अफोर्ड कर पाएंगे, जो रेस में पहले से ही आगे हैं, वो अपने बच्चों को Einstein बनाने की कोशिश करेंगे. यानी असामनता की खाई और गहराएगी. Jennifer Doudna की बायोग्राफी लिखने वाले Walter Isaacson कहते हैं कि बिजनेसमैन जीन शॉपिंग को प्रमोट कर रहे हैं. इसको फ्री मार्केट में पुश करने से ब्लैक मार्केटिंग और एक पर्मानेंट यूजेनिक (eugenic) चालू हो सकता है. Eugenic मतलब ऐसी फिलॉसफी जो इंसानों की जेनेटिक क्वॉलिटी को बेहतर करने के लिए आर्टिफिशल तरीकों के इस्तेमाल को सपोर्ट करती है.
नेशनल लेवल पर तो मामला और खतरनाक हो सकता है. नाजी जर्मनी में या बाद में चीन में देखा गया कि एक कम्यूनिटी, एक रेस का सफाया करने से भी गुरेज नहीं किया गया. अगर जीन-एडिटिंग का टूल साइंटिस्ट ऐसे इस्तेमाल करने लगे, तब तो gene-drive चलने लगेगी.
सिर्फ देश के अंदर नहीं, दो देशों के बीच ये हथियार बनने की कुव्वत भी रखता ही है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन पहले ही वॉर्निंग दे चुके हैं कि जीन एडिटिंग करके अगर ऐसे सैनिक बनने लगे जिन्हें डर नहीं लगता, दर्द नहीं होता, गिल्ट नहीं होता, तो ये न्यूक्लियर बम से भी ज्यादा खतरनाक होगा.
Gene editing ट्रीटमेंट के लिए इस्तेमाल हो तब तक तो ethical मानी जाती है. इसको टेक्नॉलजी के तौर पर भी और पैना करने की जरूरत है. ऑफ-टारगेट एडिटिंग ना हो, इसके लिए बेस एडिटिंग और प्राइम एडिटिंग टूल्स डिवेलप किए भी जा रहे हैं जो ज्यादा ऐक्यूरेट होते हैं. हो सकता है टेक्नॉलजी अडवांस्टमेंट के साथ-साथ इसकी कीमत भी गिरे, जो अमूमन हर टेक्नॉलजी के साथ होता है. तब असामनता वाली चिंता कम हो भी सकती है.
He Jiankui के रिसर्च को नैतिक रूप से गलत मानते हुए साइंटिफिक जर्नल्स ने इसको पब्लिश करने से इनकार कर दिया. साइंटिस्ट कम्यूनिटी का खुद को इस तरह रेग्युलेट करना एक आश्वासन देता है. टेक्नॉलजी के रिस्पॉन्सिबल इस्तेमाल की ओर इशारा देता है.
Jennifer Doudna का कहना है कि हो सकता है फ्यूचर में ऐसा वक्त आए जब Germline cells में जीन-एडिटिंग करना नैतिक हो जाए. हो सकता है तब एडिटिंग ना करना अनैतिक हो जाए. मगर वो वक्त अभी नहीं आया है.
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