पहले पूरा बैकग्राउंड, ताकि आगे सहूलियत रहे
जून से ही सपा में चल रही कबड्डी आज कुश्ती में बदल गई. रविवार को अखिलेश ने शिवपाल को बर्खास्त किया था. फिर शिवपाल ने रामगोपाल को पार्टी से निकाल दिया. इसके बाद मुलायम ने सोमवार को अपने यहां मीटिंग बुलाई. मुलायम की मीटिंग में पहले अखिलेश रोये और फिर शिवपाल ने अपनी भड़ास निकाली.उसके बाद मुलायम ने साफ-साफ कहा कि शिवपाल और अमर सिंह मेरे भाई हैं. अमर नहीं होते तो मैं सात साल के लिये जेल चला जाता. दोनों के खिलाफ मैं एक शब्द भी नहीं सुनूंगा. फिर मुलायम ने अखिलेश को कहा कि चाचा के गले मिलो. गले मिलते ही चाचा-भतीजा भिड़ गये. हाथा-पाई की नौबत आ गई. किसी तरह अलग कराया गया दोनों को.

पर ऐसा क्या है कि मुलायम बेटे का पक्ष खुल के नहीं ले पा रहे? भाई का पक्ष ले तो रहे हैं, पर बेटे को नकार भी नहीं रहे. क्या इन तीनों की लड़ाई में अमर सिंह ही गेम खेल रहे हैं? बाकी लोग क्या कर रहे हैं?
मुलायम ने खुद रचा है चक्रव्यूह, खुद खड़े किये कई स्टेकहोल्डर
ये खेल उतना आसान नहीं है. इसमें खिलाड़ी बहुत हैं. और सबके दांव-पेच अलग हैं. फिर मुलायम को सबको लेकर चलना है. क्योंकि सारा खेल उन्हीं का रचा हुआ है.समाजवादी पार्टी के अंदर आग तो बहुत पहले से जल रही थी. समय-समय पर धुंआ निकल रहा था. पर मुलायम ने अपनी राजनीति ही कोहरे में की है. हर बार सलटा ले जाते हैं. मुलायम सिंह यादव ने अपनी राजनीति लोहिया के साथ और इंदिरा के खिलाफ शुरू की थी. उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह की राजनीति को हथिया लिया. उनके बेटे अजीत सिंह को बहुत पीछे छोड़ दिया. फिर बाद में राजीव की कांग्रेस के सपोर्ट से मुख्यमंत्री बने. 1992 में अपनी नई पार्टी बनाई. 1996-98 में गठबंधन की केंद्रीय सरकार में रक्षामंत्री रहे. फिर मायावती के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री बने थे. जब माया ने सपोर्ट खींचा तो कुख्यात गेस्टहाउस कांड भी हुआ, जिसने माया और मुलायम के बीच वो लकीर खींच दी, जो कभी पाटी नहीं जा सकती. सत्ता के प्रति मुलायम का मोह इस कदर था कि कभी किसी चीज की परवाह नहीं की.

चौधरी चरण सिंह के साथ मुलायम सिंह यादव
एक दौर था कि मुलायम के प्रधानमंत्री बनने का मौका आया था. तब वरिष्ठ पत्रकार कुलदीप नैय्यर ने हरकिशन सिंह सुरजीत से कहा कि आप ऐसे आदमी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं जो अपने फायदे के लिये किसी को मरवा देता है? मुलायम की इच्छा दबी रह गई. फिर से वो उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बन गये. पर 2007 में माया ने इनको पटखनी दी. 2007 में ही एक नामालूम शख्स विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मुलायम को आय से अधिक संपत्ति में कोर्ट में घसीटा कि 1979 में 79000 रुपए की संपत्ति वाला समाजवादी करोड़ों का मालिक कैसे बन गया? इसी केस में कोर्ट में दिये हलफनामे ने मुलायम का एक और राज खोला, जिस पर दशकों से पर्दा पड़ा था. कि मुलायम की दूसरी बीवी भी है और एक बेटा भी है. साधना गुप्ता और प्रतीक यादव.
साधना 28 साल से कर रही हैं राजनीति की साधना
साधना कभी सपा की एक छोटी कार्यकर्ता हुआ करती थीं. ऑफिस में काम करने वालीं. मुलायम राजनीति में औरतों को प्रश्रय देने वाले नहीं थे, पर निजी जीवन में खुद को नहीं रोक पाये. सत्ता के गलियारों में घूमते मुलायम ने बेटे अखिलेश पर ध्यान नहीं दिया था. 1973 में पैदा हुआ था अखिलेश. उसको चाचा शिवपाल ने ही पाला था. मां मालती देवी तो थीं ही. पर मालती एक सीधी-सादी औरत थीं. राजनीति में दखल नहीं था. उनको अहसास भी नहीं हुआ होगा कि अस्सी के दशक में ही मुलायम ने एक और रिश्ता बना लिया था. शायद समझा भी दिया हो कि लड़कों से गलती हो जाती है. 1988 में साधना से पैदा हुआ बेटा प्रतीक यादव. जब तक मालती देवी जिंदा थीं साधना के बारे में कोई जानता नहीं था. प्रतीक भी गुमनाम जिंदगी बिताता था. यहां तक कि उसकी गर्लफ्रेंड अपर्णा को भी उसके बारे में पता नहीं था.
2003 में मालती देवी की मौत के बाद साधना को मौका मिला अपना हक मांगने का. इस काम में हाथ आये अमर सिंह. अमर ने मुलायम को चार साल तक समझाया साधना को पब्लिक में अपनी बीवी मानने के लिये. 2007 में ये हो गया. सबको हैरत हुई थी. पर कमाल की बात ये है कि इतने राजनीतिक विरोधियों के बावजूद किसी ने मुलायम के दो विवाह पर कभी प्रश्न नहीं उठाया था. हालांकि अखिलेश के गुट के उदयवीर सिंह ने अभी चिट्ठी लिख ये कहा था कि साधना ही हैं अखिलेश को लेकर हुये बवाल के पीछे.
इस बात से आहत मुलायम ने कहा कि अटल-आडवाणी तक किसी ने मेरे बारे में ये कभी नहीं कहा और आज का ये लड़का ऐसी हल्की बात बोल गया.

साधना गुप्ता
साधना के साथ आये आहत शिवपाल
पर साधना कमजोर नहीं हैं. जब बेटा बड़ा हुआ तो उनको भी अपने हक की राजनीति समझ आने लगी. इस काम में उनको एक साथी मिला. शिवपाल यादव के रूप में. शिवपाल को निराशा हुई थी अखिलेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद. क्योंकि उन्हें लगा था कि वही मुलायम के उत्तराधिकारी होंगे. पर ऐसा हो नहीं पाया. शिवपाल की इच्छा पूरी नहीं हुई, साधना का शिवपाल की बीवी सरला से बड़ा दोस्ताना है. इनको अखिलेश का राज खटकता है. जब अखिलेश मुख्यमंत्री बने, तो उनको अंदाजा था कि सबसे ज्यादा डर अपनों से ही है.साधना के बारे में कहानी है कि उनको व्यापारियों का सपोर्ट है. व्यापारी वर्ग ने साधना के चलते सपा को वोट भी किया था. वो अपनी वैश्य जाति के लोगों को अफसरशाही में भी प्रमोट करती हैं. चीफ सेक्रेटरी के पद पर दीपक सिंघल की नियुक्ति को इसी नजर से देखा गया था. अखिलेश ने दीपक को सितंबर में हटा दिया था.
वहीं रामगोपाल का उत्तर प्रदेश में ज्यादा दखल नहीं है, तो वो अखिलेश के साथ अपना भविष्य देखते हैं. उनका बेटा अक्षय यादव भी अखिलेश के सपोर्ट में है. दोनों बाप-बेटे अखिलेश के पक्ष में पार्टी को चिट्ठी भी लिख चुके हैं. मीटिंग में रामगोपाल ने कहा जहां अखिलेश, वहां विजय. इसी के बाद शिवपाल ने उनको पार्टी से निकाल दिया. इनके अलावा मुलायम के दो और भाई हैं. एक का पोता तेजप्रताप और एक का बेटा राजनीति में है. तेज की ही शादी लालू की बेटी से हुई थी. ये दोनों अभी तक न्यूट्रल रहे हैं, पर माना जाता है कि निर्णय की स्थिति में दोनों अखिलेश के साथ ही जायेंगे. पर शिवपाल की पकड़ प्रदेश के हर जिले में है. वो पकड़ इनमें से किसी के पास नहीं है.
एक नाम और, बड़ा पत्रकार और उसकी महत्त्वाकांक्षी बेटी, सपा की बागी
इस लड़ाई में एक और नाम है. अरविंद सिंह बिष्ट. प्रतीक की बीवी अपर्णा के पिता अरविंद सिंह बिष्ट टाइम्स ऑफ इंडिया के वरिष्ठ पत्रकार हुआ करते थे लखनऊ में. लखनऊ की राजनीति को अच्छे से पहचानते हैं. उनको मौका भी मिला है अपने अनुभव को इस्तेमाल करने का. सूचना आयुक्त थे अभी उत्तर प्रदेश में. पर इन पर सबसे खराब आयुक्त होने का इल्जाम लगा था. पर इनके पास राजनीति में रहने का मौका तो है ही. प्रतीक लीड्स यूनिवर्सिटी से पढ़ा था. बॉडी-बिल्डिंग का शौकीन है. रियल एस्टेट में बिजनेस जमाना चाहता है. राजनीति में कतई दिलचस्पी नहीं. पर मां का मन है कि बेटा गद्दी पर आये. ये चीज ही राजनीति को घुमाती है. वहीं अपर्णा बेहद महत्त्वाकांक्षी है. ठीक अपनी सास की तरह. अरविंद इसमें पूरी तरह बेटी के साथ हैं.
अरविंद सिंह बिष्ट
वहीं प्रतीक की मां बेटे को लोकसभा से लड़ाना चाहती थी पर सौतेले भाई अखिलेश ने रोक दिया था. ये आग जलती रही. अपर्णा ने भी इस चीज को हल्के में नहीं लिया था. स्वच्छता अभियान पर वो मोदी के सपोर्ट में बोलने लगी. निर्भया डॉक्युमेंट्री विवाद में खुलकर बोला. मोदी की खुलेाम बड़ाई करने लगी. कयास लगने लगे कि वो भाजपा के साथ जा सकती है. मुलायम को धक्का लगने वाला था, पर अपर्णा को मना लिया गया कि 2017 के विधानसभा चुनाव में तुमको लड़ना है. अपर्णा पैट्रियार्की को नहीं मानती. खुलकर बोलना उसकी फितरत है. डिंपल की ही तरह वो भी ठाकुर है. पढ़ी-लिखी है. पर एक अंतर है. डिंपल ने कभी मुलायम की सत्ता को चुनौती नहीं दी. डिंपल हर जगह एक पारंपरिक औरत के तौर पर ही नजर आती हैं. अपने पति के साथ. पर अपर्णा ने अपने पति के राजनीति में इंटेरेस्ट ना होने पर अपनी खुद की पहचान बनाई है. अब प्रतीक भी अपर्णा के लिया खुल के बोलने लगे हैं.

अपर्णा और प्रतीक
अखिलेश के लिये मुश्किल यहीं तक नहीं है. ये तो घर की बात है. सपा को गुंडों की पार्टी कहा जाने लगा था. तो जाहिर सी बात है कि लोगों ने खून भी बहाया होगा. अब अखिलेश पार्टी की इमेज बदलना चाहते हैं. तो उन लोगों को ये बात नागवार गुजरी है. क्योंकि सबको लगने लगा है कि जिस पार्टी के लिये नाम-बदनाम दोनों झेला वहीं पर अब हमें नकारा जा रहा है. क्योंकि अखिलेश ने कई लोगों को मंत्रिमंडल से हटाया भी था. उनकी पसंद के लोगों मुख्तार और डी पी यादव को पार्टी से सटने भी नहीं दिया था.
एक जिन्न भी मौजूद है पार्टी में जो बार-बार आ जाता है
इसमें एक नाम है जो किस्सों के जिन्न की तरह हर जगह मौजूद है. अमर सिंह. जिसके बारे में बात करते हुये आज मुलायम सिंह ने कह दिया कि वो मेरा भाई है. मुझे जेल जाने से बचाया. नहीं मैं सात साल के लिये अंदर जाता. अमर सिंह ही वो शख्स थे जिसने सपा को ग्रामीण पार्टी से ग्लैमर तक ढकेल दिया. जिस फंड के लिये मुलायम और शिवपाल साइकिल पर घूमते थे, अब बॉलीवुड और कॉर्पोरेट से आने लगा वो फंड. सैफई में हर साल फेस्टिवल होने लगा. अमर सिंह ने 2003 में भाजपा के साथ दिमाग भिड़ाकर मुलायम की सरकार भी बनवा दी थी. पर आजम खान के साथ उलझनों और कुछ अपनी दांव-पेच के चलते अमर को 2010 में पार्टी से बाहर होना पड़ा. पर अमर तो अमर हैं. 2016 में फिर आ गये. इज्जत से राज्यसभा में. तभी कयास लगने लगे कि अब तो कुछ होगा. ये भाई चैन से नहीं बैठता. कुछ खुराफात तो होगी. अखिलेश को मुख्यमंत्री बनाने में अमर का भी योगदान था. जाने से पहले अखिलेश को खूब प्रमोट किया था. जाते-जाते शिवपास के मुख्यमंत्री बनने का रास्ता ब्लॉक कर दिया था. वापस आये तो प्रतीक बड़ा हो चुका था. अमर को प्रतीक का स्नेही माना जाता है. अमर ने अपना काम शुरू कर दिया. दिल्ली के हलकों में बात उड़ने लगी कि अमर कह रहे हैं अखिलेश नवंबर से आगे मुख्यमंत्री नहीं रह सकते.
मई 2016 से ही कबड्डी शुरू हो गई थी. मुख्तार अंसारी की पार्टी कौमी एकता दल के सपा में विलय को लेकर. शिवपाल की मंजूरी थी. अखिलेश की ना. उस समय तो अखिलेश जीत गये थे. पर कौन हार मानना चाहता था. फिर शुरू हो गया खेल. अखिलेश के दोस्तों को पार्टी से बाहर किया शिवपाल ने. उनको मुख्यालय तक में घुसने नहीं दिया गया. फिर अखिलेश ने शिवपाल के अफसरों और मंत्रियों को बाहर करना शुरू किया. शिवपाल को भी बर्खास्त कर दिया. फिर शिवपाल ने अखिलेश के नजदीकी रामगोपाल को निकाल दिया.
और आज दोनों ने कुश्ती कर ली. इसका नतीजा आज शाम या कल तक आ जायेगा.
इन सारी चीजों के अलावा एक और बात आई है. ये लड़ाई घरेलू पॉवर स्ट्रगल होने के अलावा जेनरेशन की भी है. जिन लोगों ने पार्टी बनाने में मदद की है वो अपने को ज्यादा काबिल मानते हैं. कई बार ऐसा हो गया कि मुलायम ने अखिलेश को उनके चलते लताड़ लगा दी. पर राजनीति करते-करते अखिलेश को भी अंदाजा हो गया है कि क्या करना चाहिये. उनका राजनीति का अंदाज अलग है. इस कार्यकाल में अखिलेश ने मेट्रो, रोड के अलावा कई योजनायें निकालीं. काफी पॉपुलर भी रहे. पर हर बार यही लगता रहा कि मुलायम अपने बेटे के पैर काट रहे हैं. क्योंकि अखिलेश पार्टी की इमेज गुंडई वाली नहीं रखना चाहते थे. आज उन्होंने कहा भी कि लोग मुझसे पूछेंगे तो मैं क्या जवाब दूंगा. मुझे काम करना है. मेरा पार्टी में कुछ नहीं है. मैं बस काम करना चाहता हूं.










