कांग्रेस- 114 बीजेपी- 109 बहुजन समाज पार्टी (BSP)- 2 समाजवादी पार्टी (SP)- 1 निर्दलीय- 4
सरकार बनाने के लिए चाहिए 116 सीटें
11 दिसंबर, 2018 को काउंटिंग शुरू हुई. इसके चौबीस घंटे बाद जाकर फाइनल नतीज़ा आया. सबसे आखिर तक भिंड़ जिले की मेहगांव सीट अटकी रही. 23 राउंड की गिनती के बाद जाकर 12 दिसंबर की सुबह 7 बजे कांग्रेस के ओ पी एस भदौरिया को जीत का सर्टिफिकेट मिल गया. इसके तकरीबन डेढ़ घंटे बाद चुनाव आयोग ने अपनी वेबसाइट अपडेट की. और तब जाकर Madhya Pradesh Assembly के नतीज़ों के ऐलान का काम पूरा हुआ. कांग्रेस और बीजेपी के बीच पांच सीटों का फासला है. वोट शेयर के हिसाब से दोनों पार्टियों के बीच एक बिंदु भर का फर्क है. बीजेपी को 41 फीसद वोट मिले हैं और कांग्रेस को इससे दशमलव एक फीसद कम, यानी 40.9 पर्सेंट वोट मिले हैं.

वोटों की गिनती शुरू होने के 24 घंटे से भी ज्यादा वक़्त बाद, 12 दिसंबर की सुबह साढ़े आठ बजे के करीब जाकर चुनाव आयोग ने मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव का फाइनल रिज़ल्ट जारी किया.
भयंकर फंसा हुआ मामला था मध्य प्रदेश में 230 सीटों की मध्य प्रदेश विधानसभा के लिए 28 नवंबर, 2018 को वोटिंग हुई थी. यहां सत्ता में थे बीजेपी के शिवराज सिंह चौहान. 2014 के लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी की जीत के बाद शायद ये पहली बार था कि किसी राज्य में चुनाव हुए और इलेक्शन मोदी की फेस वैल्यू पर नहीं लड़ा गया. मध्य प्रदेश में बीजेपी का मतलब ही शिवराज है. मगर इस बार शिवराज के लिए स्थितियां मक्खन कतई नहीं थीं. उन्हें कांग्रेस की तरफ से काफी तगड़ी चुनौती मिली. जानकारों ने कहा, कौन जीतेगा और कौन हारेगा, ये अंदाजा लगा पाना बहुत मुश्किल है. गिनती शुरू होने के बाद घंटों तक कभी कांटा बीजेपी की तरफ जाता रहा, तो कभी कांग्रेस की तरफ. कभी बीजेपी आगे होती, कभी कांग्रेस आगे होती. नतीज़ा आने में इतनी देर यूं लगी कि हर राउंड की गिनती के बाद रिजल्ट ऐलान किया जाता और प्रत्याशियों से दस्तखत करवाए जाते. ताकि किसी कन्फ्यूजन का या शिकायत का स्कोप न रहे.

ये मंदसौर में हुए किसान प्रदर्शनों के समय की दो तस्वीरें हैं. यहां पुलिस के गोलियां चलाने के बाद बात काफी बिगड़ गई थी (फोटो: PTI)
शिवराज सरकार के पांच साल शिवराज सिंह चौहान का पिछला कार्यकाल, यानी 2008 से 2013 के बीच वाले पांच साल की छवि काफी पॉजीटिव रही थी. मगर इस बार के उनके कार्यकाल में उपलब्धियां कम और विवाद ज्यादा रहे. सरकार की किसी योजना से आबादी का एक बड़ा धड़ा खुश हो, ऐसा दिखा नहीं. सबसे बड़ा मुद्दा व्यापमं का रहा. शिवराज सरकार पर व्यापमं के मुद्दे को दबाने और मैनेज करने के भी गंभीर इल्जाम लगे. हालांकि व्यापमं चुनाव में बड़ा मुद्दा नहीं बन पाया. बल्कि हैरत की बात ये रही कि ये कोई चुनावी फैक्टर बना ही नहीं. वैसे इसको शिवराज की बड़ी उपलब्धि और कांग्रेस की बड़ी नाकामी मानेंगे. शिवराज सरकार के लिए जो दूसरी सबसे बड़ी मुश्किल रही, वो थी मंदसौर की घटना. जून 2017 में मंदसौर के अंदर किसानों ने प्रदर्शन किया. वो अपनी फसल की बेहतर कीमत मांग रहे थे. पुलिस ने उनपर गोलियां चलवाईं. छह किसान मारे गए. किसानों पर गोलियां चलीं, इस बात ने न केवल मध्य प्रदेश में बल्कि बाकी जगहों पर भी बीजेपी की खूब किरकिरी की. इसी मंदसौर में एक आठ साल की बच्ची से हुआ नृशंस रेप भी काफी सुर्खियों में रहा.

ये 2013 में हुए मध्य प्रदेश विधानसभा के पार्टी वाइज़ रिजल्ट देखिए.
पिछली विधानसभा चुनाव में क्या हुआ था? बीजेपी को सबसे ज्यादा 165 सीटें मिली थीं. सरकार बनाने के लिए कम से कम 116 सीटें चाहिए होती हैं. इस लिहाज से बीजेपी को बड़ी जीत मिली थी. रिजल्ट के हिसाब से दूसरे नंबर पर थी कांग्रेस. कांग्रेस ने कुल 229 सीटों पर चुनाव लड़ा था. इसमें से 58 सीटें उसके पास आईं. बहुजन समाज पार्टी (BSP) को मिली थीं चार सीटें. तीन सीटें निर्दलीय उम्मीदवारों की झोली में गईं. वोटिंग पर्सेंटेज के हिसाब से बीजेपी को कुल 45.19 फीसद वोट मिले. कांग्रेस को भी ठीक-ठाक 36.79 पर्सेंट वोट मिले. BSP को साढ़े छह फीसद वोट मिले थे.
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