नौ अप्रैल (2017) को बडगाम में एक उप चुनाव होना था. मुझे पुलिस और सिक्योरिटी फ़ोर्सेज़ के साथ कोऑर्डिनेशन में इन चुनावों को कराने की ज़िम्मेदारी दी गई थी. जब मैं गुंदीपुरा में था.. साढ़े दस बजे आईटीबीपी ऑफिसर का फोन आया. मुझे बताया कि लगभग 1200 लोग घेरकर खड़े हैं और वो उतलीगाम पोलिंग स्टेशन को जला देना चाहते हैं. मैं उस ओर बढ़ा. मैं लगातार ये अनाउंस कर रहा था कि हमें आगे जाने दिया जाए, हम सिर्फ यहां पोलिंग स्टाफ़ और आईटीबीपी के ऑफिसर्स को बचाने आए हैं. मगर किसी ने भी हमारी बात नहीं मानी. इसी दौरान मैंने एक छोटे आदमी को देखा जो मेरी गाड़ी से 30 मीटर दूरी पर खड़ा था. मैंने तुरंत अपनी क्विक रिस्पांस टीम से कहा कि वो उसे पकड़ें. उसका नाम था फारूक अहमद डार. उसे पकड़ने के बाद हमने पोलिंग बूथ की ओर चलना शुरू किया. पोलिंग बूथ पहुंचने से पहले वहां एक आईटीबीपी क की एक गाड़ी मौजूद थी. हमने उसी की मदद लेते हुए पोलिंग स्टेशन की ओर आगे बढ़ना शुरू किया. इस बीच मेरी गाड़ी एक कीचड़ में अटक गई. इसे देख मेरी गाड़ी पर फिर से पत्थरबाजी होने लगी. तभी मेरे दिमाग में उस आदमी को गाड़ी के सामने बांधने का आइडिया आया. और जैसे ही मैंने अपने साथियों को उसे गाड़ी के सामने बांधने का ऑर्डर दिया, ये देखकर पत्थरबाजी कुछ देर के लिए बंद हो गई. ये थोड़ा सा वक़्त था, जिसमें मुझे मौका मिला कि उस जगह से हम सुरक्षित निकल सकें. मैंने तुरंत ही अपने साथियों को गाड़ी के अन्दर आने को कहा और हम उस एरिया से बाहर निकल आए.जांच में क्या निकला था? बाद में जांच में पाया गया था कि 9 अप्रैल, 2017 को उपचुनाव में अपना वोट डालने के बाद फारूक डार अपनी बहन के यहां एक शोक सभा में जा रहा था. आर्मी ने उसे उठाया और जीप पर रस्सी से बांध दिया. इसके बाद सेना की जीप लगभग 28 गांवों से इसी तरह गुजरी. इस घटना के एक साल बाद एक न्यूज एजेंसी को दिए वीडियो इंटरव्यू में फारूक ने कहा था कि मेरी गलती क्या थी? मैं अपना वोट देने गया था. श्रीनगर से कोई 40 किलोमीटर दूर जहां डार को जीप के बोनट पर बांधा गया था, यह घटना स्थानीय लोगों के दिमाग में अब भी ताजा है.
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