अखिलेश यादव जिस समय अंग्रेज़ी और कंप्यूटर की तालीम ले रहे थे, ठीक उसी समय उनके पिता उत्तर प्रदेश की जनता को अंग्रेज़ी और कंप्यूटर से दूरी बनाने को कह रहे थे.नोट : अगर हेडिंग पढ़कर आपकी भावना आहत हुई हो तो कृपया इन चुनावों में वोट डालने तक उसे ऐसे ही रखें.
अखिलेश यादव जनता से अपनी बातचीत हिंदी में करते हैं. मगर उनकी अंग्रेज़ी काफी दुरुस्त है. बीटेक के बाद दो बार एमटेक कर चुके हैं. एक बार मैसूर विश्वविद्यालय से और एक बार ऑस्ट्रेलिया से. उनको दस साल तक अंग्रेज़ी की खास ट्यूशन भी दिलवाई गई. स्वतंत्रता सेनानी और अंग्रेज़ी के जानकार अवध किशोर वाजपेयी अखिलेश को पढ़ाते थे. अमेरिकी रॉक बैंड मैटेलिका के शौकीन अखिलेश यादव अंग्रेज़ी कवियों और साहित्यकारों के कोटेशन निजी बातचीत में इस्तेमाल करते हैं उससे कोई भी उनकी अंग्रेज़ी की समझ को परख सकता है.
नेताजी और टीपू पर तो बातें होती रहेंगी पहले उत्तर प्रदेश की शिक्षा पर बात कर लें.
कुछ दिन पहले की बात है, दिल्ली के मुखर्जी नगर में तैयारी के लिए आए एक लड़के से बात हुई. उसने गणित के साथ बीएससी किया है. फाइनल इयर में C लैंग्वेज और प्रोग्रामिंग भी सीखी है. मगर बंदे को कोई अंदाज़ा नहीं कि अल्बर्ट आइंस्टीन कौन थे. हद तो तब हो गई जब पता चला कि प्रोग्रामिंग में फर्स्ट क्लास नंबरों से पास इस बच्चे को माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस का नाम भी नहीं पता.
गलती उसकी नहीं है बच्चे के पिता ने हमें बताया कि अच्छे नंबरों से इंटर और बीएससी ‘पास करवा दी’. खेत बेच कर दिल्ली में कोचिंग करवा दे रहे हैं. बाप का फर्ज पूरा कर दिया अब अगर ये कुछ न करे तो उनकी क्या गलती. ऐसे लोगों से पूछना चाहिए कि पहले खुद ही उसे न पढ़ने और नकल की आदत लगवाने के बाद अब चाहते हैं कि सब कुछ एकदम से बदल जाए.
ये किसी एक घर या इलाके की कहानी नहीं है. उत्तर प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में ऐसे कई स्कूल, कॉलेजों की चेन मौजूद हैं, जहां हर तरह की डिग्री खरीदी जा सकती है. गांव के कुछ स्कूल तो ऐसे भी हैं जिनमें गांव की आबादी से ज़्यादा बच्चे बोर्ड परीक्षा में बैठते हैं. कहने की ज़रूरत नहीं कि इनको चलाने वालों के सियासी कनेक्शन बड़े मज़बूत हैं.
पिछले लगभग 10 सालों में उत्तर प्रदेश शिक्षामित्रों, अध्यापकों की बड़ी वैकेंसी निकाली गईं. इन नौकरियों के लिए कोशिश की गई कि योग्यता परीक्षा की जगह सीधे स्कूल और कॉलेज की मेरिट पर नौकरियां दे दी जाएं. इन नौकरियों के लिए ऐसे तमाम स्कूलों से अभिभावक डिग्री खरीदने लगे. बच्चे ग्रेजुएट हो गए मगर बिना किसी जानकारी के. इस लायक भी नहीं कि अगर ये नौकरी न मिले तो किसी और नौकरी में जा सकें. पढ़ाएंगे क्या, इसके तमाम नमूने तो आपने सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियोज़ में देखे होंगे. आज स्थिति ये है कि 20 करोड़ की आबादी वाले सूबे में ग्रेजुएशन के अच्छे ऑप्शन तलाशने के लिए दिल्ली यूनिवर्सिटी जैसे केंद्रीय विश्विद्यालयों में जाना पड़ता है. ये वही उत्तर प्रदेश का हाल है जो हिंदी और उर्दू के हर दूसरे बड़े साहित्यकार की जन्म या कर्म-भूमि है. हिंदी सिनेमा, पॉलिटिक्स के कई दिग्गज इसी प्रदेश से निकले हैं. आज इसी उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था ऐसी दशा और दिशा में है कि छात्रों को पढ़ाई तो दूर, छोटे मोटे वोकेश्नल कोर्स और कोचिंग करने के लिए भी दूर के शहरों में जाना पड़ता है.
चलिए आसानी के लिए पार्टी दर पार्टी शिक्षा व्यवस्था के हाल की बात करते हैं.
एक चुटकुला है कि सपा को वोट देने वाले छात्र इसके नाम को उल्टा पढ़ते हैं. पिछली सरकारों में क्या हुआ इसकी एक बानगी हम ऊपर दिखा ही चुके हैं. मिस्टर क्लीन मुख्यमंत्री अखिलेश ने उत्तर प्रदेश टेक्निकल यूनिवर्सिटी का नाम बदल कर डॉ. कलाम के नाम पर किया. कलाम साहब की ही सलाह पर अमल करते हुए स्कूलों में सोलर आर.ओ. की सुविधा शुरू की. छात्रों के लिए वजीफे और लैपटॉप बांटने और फिल्म बंधु जैसी अच्छी शुरुआत की. मगर राज्य की 12वीं तक की शिक्षा को सुधारने के लिए इनके कोई पुख्ता प्रयास पिछले 5 सालों में नहीं दिखते. अनुदेशक, कंप्यूटर शिक्षक और भर्ती परीक्षाएं दे चुके शिक्षक बेहाल हैं जबकि ज़्यादातर नकल माफिया उन जिलों में ही सक्रिय हैं जिन्हें सपा का गढ़ माना जाता है. टीपू भैया, वजीफे से प्रोत्साहन तो मिलता है मगर जब स्कूल और कॉलेज का स्तर ही नहीं सुधरेगा तो बेचारे स्टूडेंट्स क्या करेंगे. आप ही बताएं जनेश्वर मिश्र पार्क से बेहतर श्रद्धांजलि जनेश्वर मिश्र अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय होता कि नहीं?
लखनऊ में प्रदर्शन करते बीटीसी छात्र. फोटो-अमरउजाला
अखिलेश यादव से पहले मायावती ने भी तमाम जिलों के नाम बदले. लखनऊ में कई खूबसूरत पार्क बनाए. गुमनाम से रहे तमाम महापुरुषों के नाम इस बहाने आम लोगों तक पहुंचे. मगर बहन जी से पूछा जाना चाहिए कि समाजवादी पार्टी के लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल उठाने के अलावा उन्होंने खुद कितना ध्यान दिया है प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पर. राज्य में कितने नए विश्वविद्यालय बने. उनके शासन काल में कितने लेक्चरर्स की नियुक्ति हुई. बहनजी के समय से ही उत्तर प्रदेश की स्टेट युनिवर्सिटीज़ में पीएचडी की दशा ऐसी है कि डॉक्टरेट की डिग्री के बाद लोग बीटीसी करके प्राइमरी में मिड-डे मील पकवा रहे हैं. चपरासी और सफाईकर्मी भर्ती में एप्लाई करने की खबरें तो मीडिया में आती ही रहती हैं.

इलाहाबाद में सफाईकर्मी की ट्रेनिंग में इंजीनियर और MBA वाले. ये तस्वीर 2008 की है. फोटो- हफिंग्टन पोस्ट
राज्य की दूसरी दो पार्टियों में कांग्रेस और भाजपा हाल फिलहाल में सत्ता से दूर होने की बात करके बच सकती हैं मगर उनके घोषणाओं में सांप्रदायिकता से लड़ने और मंदिर वहीं बनाने की बातों से इतर शिक्षा नीति से जुड़ी ठोस बातें ढूंढना अपने आप में एक मेहनत वाला काम है. वैसे पूछा जा सकता है कि जब काशी क्योटो बन जाएगा तो क्या उसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नए विश्वविद्यालय की जगह होगी.
दरअसल समस्या मात्र इन पार्टियों की नहीं है. उत्तर प्रदेश के रास्ते दिल्ली तक पहुंचने की सियासत ने पूरे प्रदेश को एक वोट बैंक बना दिया है. एक ऐसा वोट बैंक जिसमें कोई हिंदुओं के सम्मान के नाम पर ध्रुवीकरण कर रहा है, किसी ने मुसलमानों को खतरे से बचाने के नाम पर जमा कर रखा है. कोई जाति का हवाला दे रहा है कोई दलित अस्मिता का. करोड़ों की आबादी सियासत के सर्कस का सबसे खास तमाशा बनकर रह गई है. बाप बेटे की लड़ाई, बहनजी की लड़ाई, विवादास्पद बयानों के बहाने साम्प्रदायिकता की लड़ाई. वासेपुर का डायलॉग याद है न, यहां सबके दिमाग में एक अलग सनीमा चल रहा है, हर कोई अपनी-अपनी फिलिम का हीरो है.आज की तारीख में उत्तर प्रदेश के किसी भी कस्बे से जुड़े फेसबुक पेज और ग्रुप पर जाइए. फलाने भैया को लाओ और प्रदेश बचाओ, कहने की बात नहीं ये सारे भाई और दादा वो होते हैं जिनके ऊपर हत्याओं के तमाम मुकदमें होते हैं. जिनके नाम पर उगाहे गए पैसों का कोई हिसाब नहीं होता. मगर क्या है न दद्दा, अपनी बिरादरी अपनी कौम के होते हैं तो उनको लाना सबकी मजबूरी है.














