महाभारत का लास्ट चैप्टर मज़ेदार है. कहा जाता है सारे पाण्डव शरीर समेत स्वर्ग जाने के लिए निकले. रास्ते में चारों पांडव और द्रौपदी तो बचे नहीं. इकलौते युधिष्ठिर ज़िंदा रहे. लेकिन युधिष्ठिर के साथ स्वर्ग के दरवाज़े तक उनका एक ही साथी पहुंचा. कौन ? उनका कुत्ता. अब कहने को तो ये पौराणिक कथा है, लेकिन इतना तो अंदाज़ा लगता ही है कि तब भी कुत्ता बेहद वफ़ादार जीव था.
क्या हुआ बीजेपी का प्रचार करने निकले कुत्ते का?
चुनाव आयोग भी झक्क मार रहा होगा कि 'इस कुत्ते का क्या करें'.

अब भी कहा जाता है Dog is the best companion of man. इंसान का परममित्र होता है कुत्ता. जहां उसका मालिक, वहां कुत्ता. इंसान के साथ ये दोस्ती कुत्ता नहीं तोड़ता. चाहे इंसान दुनिया जहान के कानून तोड़ दे.

अक्सर दोस्तियां ऐसे ही बनती हैं, जब प्यार का तराजू एक ओर झुक जाता है
यही हुआ महाराष्ट्र में :-
देश में लोकसभा चुनाव 2019 जारी हैं. कई चरणों में होने वाले इस चुनाव में लगभग हर रोज़ कुछ ऐसा हो जाता है, जिसे देखकर मन में एक ही बात आती है 'अब और क्या देखना बाक़ी है'. चौथे चरण में महाराष्ट्र की 17 सीटों पर भी मतदान हुए. PTI की एक ख़बर के अनुसार इसी दौरान पुलिस को शिकायत मिली कि 'आदर्श आचार संहिता' का उल्लंघन हो रहा है. और कर कौन रहा था. एक कुत्ता. मतलब जब मौक़े पर पुलिस पहुंची, तो कुत्ता पूरी तरह से 'मोदी लाओ, देश बचाओ' लिखे हुए पोस्टर, और भाजपा के चुनाव चिन्ह वाले झंडों से लदा पड़ा था.
अब कुत्ता ख़ुद तो अपना फ़ैशन चुनता नहीं है. ना उसकी कोई राजनैतिक विचारधारा होती है. तो एक चीज़ कही जाती है 'किसी और के कंधे पर रखकर बंदूक चलाना'.
इस केस में कुत्ता बना कंधा, और निशाना साध रहे थे कुत्ते के मालिक साहब. एकनाथ मोतीराम चौधरी. 65 साल के ये शख़्स महाराष्ट्र में नवनाथनगर के रहने वाले हैं. शिकायत हुई, पुलिस आई तो यही भाई साहब पोलिंग बूथ के आस-पास कुत्ता टहलाते पाए गए. आचार संहिता उल्लंघन में ख़ुद तो धरे ही गए, साथ में कुत्ता भी भेज दिया गया नगरपालिका की कस्टडी में. एकनाथ पर पुलिस ने IPC के सेक्शन 171 (A) के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया है.
अब सोचने वाली बात क्या है?विज्ञापन की दुनिया में एक टर्म चलता है 'सेरोगेट एडवर्टाइज़िंग'. यानि की विज्ञापन कोई और करना चाह रहा है, लेकिन हो किसी और के नाम से रहा है. जैसे भारत में हर शराब और बियर कंपनी अपने ब्राण्ड का सोडा और पानी भी बनाते हैं. वजह ?
वजह सिर्फ़ इतनी कि भारत में शराब और बियर का विज्ञापन बैन है. और जब ब्राण्ड को अपना विज्ञापन करना हो तो, पानी और सोडे के नाम पर अपना धुंआधार विज्ञापन करती हैं. क्योंकि जब पानी की बोतल के ऊपर लिखा आएगा कि 'खूब पियो', तो इसका सामने से मतलब होगा कि पानी खूब पियो. लेकिन असल में कंपनी जानी जाती है अपने शराब या बियर प्रोडक्ट से - छोटा मिलाते जाओ लार्ज बनाते जाओ, यू सी. ;-)
तो ऐसे ही केवल प्रोडक्ट की ही 'सेरोगेट एडवर्टाइज़िंग' नहीं होती, बल्कि विचार और मान्यताओं की भी होती है.
भाई साहब ने भी कुछ ऐसा ही करने की कोशिश की लेकिन मुक़दमा दर्ज हो गया.

आपको क्या लगता है कि कुत्तों के पास कॉमन सेन्स नहीं होता? आप कहेंगे ये तो बड़ा अन-कॉमन सवाल है
और एक बात:-
अगर कुत्तों में इतना ही दिमाग़ होता, तो सबसे पहले कुत्ते जाते मुंबई फ़िल्म इंडस्ट्री. और कराते मुक़दमा धर्मेंद्र के खिलाफ़. जिन्होंने कुत्तों का ख़ून पीने की अनंत धमकियां दी हैं. इसका मतलब है कि कुत्तों को बेइज़्ज़ती टाइप का ज़्यादा कुछ फ़ील होता नहीं है.
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