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'सिर्फ प्रोफसर ही क्यों, जजों की भी ड्यूटी लगा दो...' कलकत्ता HC ने चुनाव आयोग को कड़ी फटकार लगाई

West Bengal Election 2026: कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा कि भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) के पास अधिकारियों की नियुक्ति करने की पूरी शक्ति है, लेकिन उसे अपने ही नियमों का पालन करना होगा. कोर्ट सरकारी कॉलेजों के असिस्टेंट और एसोसिएट प्रोफेसरों की याचिका सुन रहा था.

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कलकत्ता हाई कोर्ट ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) का फैसला रद्द किया. (फाइल फोटो: इंडिया टुडे)

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले कलकत्ता हाई कोर्ट ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ECI) को कड़ी फटकार लगाई है. कोर्ट ने चुनाव आयोग के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें सरकारी कॉलेजों के असिस्टेंट प्रोफेसरों और एसोसिएट प्रोफेसरों को चुनाव में पीठासीन अधिकारी नियुक्त करने का फैसला किया गया था. कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग ऐसा कोई सबूत नहीं दे सका, जिससे यह साबित हो सके कि कॉलेज प्रोफेसरों को पोलिंग बूथ पर नियुक्त करना जरूरी था.

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लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, कॉलेज शिक्षकों का प्रतिनिधित्व करने वाली एक संस्था ने कलकत्ता हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की थी. इस याचिका में चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती दी गई थी. साथ ही यह भी कहा गया था कि चुनाव आयोग की गाइडलाइन के मुताबिक ग्रुप A के बराबर के अधिकारियों (जैसे कॉलेज के टीचिंग स्टाफ) को पोलिंग ड्यूटी पर तभी लगाया जा सकता है, जब उसके पीछे जरूरी कारण लिखकर दर्ज किए जाएं.

शुक्रवार, 17 अप्रैल को याचिका को मंजूर करते हुए जस्टिस कृष्णा राव ने कहा कि चुनाव आयोग अपने फैसले को सही ठहराने में नाकाम रहा. कोर्ट ने कहा, 

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“इस कोर्ट को लगता है कि अधिकारी कोई ऐसा डॉक्यूमेंट पेश करने में नाकाम रहे हैं कि जिससे यह साबित हो सके कि कुछ जरूरी हालात की वजह से, अधिकारियों ने पिटीशनर्स को पोलिंग बूथ में पीठासीन अधिकारी नियुक्त करने का फैसला किया है.”

कोर्ट ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग के पास अधिकारियों की नियुक्ति करने की पूरी शक्ति है, लेकिन उसे अपने ही नियमों का पालन करना होगा. कोर्ट ने कहा,

“चुनाव आयोग ने फरवरी 2010 के अपने ही सर्कुलर का उल्लंघन किया है. इसमें यह कहा गया था कि ग्रुप 'A' के बराबर सीनियर अधिकारियों को चुनाव ड्यूटी के लिए तैनात नहीं किया जाना चाहिए, जब तक कि जिला निर्वाचन अधिकारी ने लिखित रूप में कोई खास कारण न बताए हों. इसलिए, पोलिंग बूथ में पीठासीन अधिकारी के तौर पर पिटीशनर्स की नियुक्ति रद्द की जाती है.”

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13 अप्रैल को पहली सुनवाई में कोर्ट ने चुनाव आयोग से ऐसे कारण बताने वाले दस्तावेज मांगे थे कि प्रोफेसरों का पोलिंग अधिकारी बनना जरूरी है. 16 अप्रैल को फिर सुनवाई हुई, लेकिन आयोग कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सका और समय मांगा. कोर्ट ने एक और मौका दिया था और शुक्रवार तक जवाब देने को कहा था. शुक्रवार को कोर्ट ने देखा कि आयोग ने अपनी गाइडलाइन का पालन नहीं किया.

कलकत्ता हाई कोर्ट की के मुताबिक, गुरुवार, 16 अप्रैल की सुनवाई के दौरान जस्टिस राव ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा था,

“आप लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 26 के तहत जजों को भी मतदान अधिकारी बना सकते है… मैं खुद जाने के लिए तैयार हूं. यह कोई मजाक नहीं है. आप हर बार अपना नोटिफिकेशन बदल रहे हैं.”

यह टिप्पणी चुनाव आयोग की तरफ से पेश वकील की दलील पर थी, जिसमें उन्होंने कहा था कि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 26 के तहत जिला चुनाव अधिकारी (DEO) को पीठासीन अधिकारी नियुक्त करने का अधिकार है.

हालांकि, कोर्ट ने उन प्रोफेसरों को पीठासीन अधिकारी की ड्यूटी करने की छूट दी है, जिन्होंने पहले ही ट्रेनिंग ले ली थी और चुनाव ड्यूटी के लिए तैयार थे. कोर्ट ने यह भी साफ किया कि चुनाव आयोग गाइडलाइन के मुताबिक, याचिकाकर्ताओं (कॉलेज प्रोफेसरों) को उनके पद, वेतन और स्थिति के मुताबिक नई जिम्मेदारी दे सकता है.

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