The Lallantop

अमेरिका में पढ़ाई से भारतीय छात्रों का मोहभंग? आवेदन 15% घटे, वजह सिर्फ वीजा नहीं

अमेरिका में ग्रेजुएशन की पढ़ाई के लिए भारतीय छात्रों के आवेदनों में 15 फीसदी की गिरावट ने शिक्षा क्षेत्र में नई बहस छेड़ दी है. कॉमन ऐप के आंकड़ों, एफ-1 वीजा, सीपीटी और ओपीटी के नियमों, अगस्त 2026 में विश्वविद्यालयों की सीपीटी नीति में आए बदलाव और अमेरिका में पढ़ाई की लागत को आसान भाषा में समझिए.

Advertisement
post-main-image
अमेरिका जाने वाले भारतीय छात्रों के आवेदन 15 फीसदी क्यों गिर गए? (फोटो-AI)

Quick AI HighlightsClick here to view more

  • कॉमन ऐप की 2025-26 रिपोर्ट के अनुसार, भारत से अमेरिका में ग्रेजुएशन स्तर के लिए आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या में लगभग 15 प्रतिशत की कमी आई है।
  • अमेरिका में वीजा नियमों, इमिग्रेशन नीति में बदलाव, पढ़ाई के बाद नौकरी के अवसरों में अनिश्चितता और बढ़ती शिक्षा लागत ने भारतीय छात्रों के आवेदन घटाने में भूमिका निभाई है।
  • इस गिरावट के कारण छात्रों और परिवारों को करियर योजना बनाते समय वीजा जोखिम, कुल खर्च, छात्रवृत्ति और इंटर्नशिप नियमों जैसे कई पहलुओं को ध्यान में रखना आवश्यक हो गया है।

अमेरिका में पढ़ाई का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के लिए तस्वीर थोड़ी बदलती दिख रही है. कॉमन ऐप के 2025-26 दाखिला आंकड़ों के मुताबिक भारत से अमेरिकी कॉलेजों में आवेदन करने वाले छात्रों की संख्या करीब 15 फीसदी घटी है. खास बात ये है कि गिरावट ऐसे समय आई है जब अमेरिकी कॉलेजों में ग्रेजुएशन लेवल के आवेदनों की कुल संख्या बढ़ी है. यानी अमेरिका से छात्रों का मोह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ, लेकिन विदेशी छात्रों के लिए तस्वीर जरूर बदलती जा रही है.

Advertisement

कॉमन ऐप की 20 अगस्त 2026 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक 2025-26 एडमिशन सत्र में विदेशी आवेदकों की संख्या भी कम हुई है. भारत से आवेदकों में करीब 15 फीसदी की गिरावट सामने आई. इसलिए इसे सिर्फ अमेरिका की पढ़ाई में सामान्य उतार चढ़ाव मानना सही नहीं होगा. वीजा नियम, इमिग्रेशन नीति, पढ़ाई के बाद नौकरी के रास्ते और बढ़ती लागत को लेकर अनिश्चितता ने छात्रों और उनके परिवारों के फैसले को प्रभावित किया है.

पहला कारण: एफ-1 वीजा को लेकर अनिश्चितता

अमेरिका में फुलटाइम पढ़ाई करने वाले ज्यादातर विदेशी छात्र एफ-1 छात्र दर्जे के तहत पढ़ते हैं. लेकिन किसी अमेरिकी कॉलेज से दाखिला मिलना और एफ-1 वीजा मिलना दो अलग चरण हैं. दाखिला मिलने के बाद छात्र को जरूरी दस्तावेज लेकर वीजा प्रक्रिया पूरी करनी होती है.

Advertisement

भारतीय परिवारों के लिए अब सवाल सिर्फ ये नहीं है कि बच्चे को अच्छी यूनिवर्सिटी मिलेगी या नहीं. सवाल ये भी है कि वीजा प्रक्रिया कितनी आसान और अनुमानित रहेगी. पाठ्यक्रम पूरा होने के बाद कानूनी रूप से काम करने का मौका क्या होगा और पढ़ाई पूरी होने के बाद अमेरिका में करियर बनाने का रास्ता कितना सुरक्षित रहेगा.

‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ट्रंप प्रशासन के दौरान आव्रजन और विदेशी छात्रों से जुड़ी नीतियों को लेकर कई बदलाव और प्रस्ताव सामने आए हैं. इससे विदेशी छात्रों के बीच अनिश्चितता बढ़ी है. हालांकि ये कहना सही नहीं होगा कि सिर्फ ट्रंप प्रशासन की किसी एक नीति की वजह से भारतीय छात्रों के आवेदन 15 फीसदी गिरे हैं. उपलब्ध आंकड़े इतना जरूर बताते हैं कि आवेदनों में बड़ी गिरावट हुई है और इसके पीछे नीति संबंधी अनिश्चितता समेत कई कारण हो सकते हैं.

दूसरा बड़ा मुद्दा: पढ़ाई के साथ काम करने का रास्ता

भारतीय छात्रों के लिए अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी खूबी पढ़ाई के साथ व्यावहारिक अनुभव हासिल करने का मौका रही है. लेकिन यहां नियम समझना बेहद जरूरी है.

Advertisement

एफ-1 छात्रों के लिए सीपीटी यानी पाठ्यक्रम से जुड़ी व्यावहारिक प्रशिक्षण व्यवस्था और ओपीटी यानी वैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण अलग चीजें हैं. सीपीटी पढ़ाई के दौरान पाठ्यक्रम से सीधे जुड़े प्रशिक्षण, इंटर्नशिप या सहकारी शिक्षा के लिए होता है. वहीं ओपीटी पढ़ाई के दौरान या  ग्रेजुएट होने के बाद अपने विषय से संबंधित व्यावहारिक प्रशिक्षण का रास्ता देता है.

विज्ञान, तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित से जुड़े योग्य पाठ्यक्रमों के छात्रों को सामान्य पढ़ाई पूरी करने के बाद मिलने वाले ओपीटी के बाद 24 महीने का अतिरिक्त प्रशिक्षण विस्तार भी मिल सकता है.

सीपीटी को लेकर अगस्त 2026 में क्या बदला

अगस्त 2026 में कुछ अमेरिकी विश्वविद्यालयों ने नए संघीय दिशा निर्देशों के बाद सीपीटी आवेदनों या मंजूरियों को अस्थायी रूप से रोकने की जानकारी दी है.

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, डेविस ने 19 अगस्त को बताया कि उसने कुछ पाठ्यक्रम आधारित सीपीटी आवेदनों को आगे की जानकारी मिलने तक अस्थायी रूप से रोक दिया है. हालांकि डिग्री की अनिवार्य जरूरत से जुड़े सीपीटी को जारी रखा गया है.

कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, सैन डिएगो ने भी अपनी विदेशी छात्र मार्गदर्शिका में सीपीटी अनुरोधों की प्रक्रिया को अस्थायी रूप से रोकने की जानकारी दी.

इसका मतलब ये नहीं है कि अमेरिका में सीपीटी पूरी तरह खत्म हो गया है. मामला ज्यादा सीमित है. विश्वविद्यालय ये देख रहे हैं कि व्यावहारिक प्रशिक्षण वास्तव में स्थापित पाठ्यक्रम का जरूरी हिस्सा है या नहीं.

इसलिए जिस छात्र की आर्थिक योजना किसी इंटर्नशिप या सीपीटी व्यवस्था पर टिकी है, उसे दाखिला लेने से पहले अपने विश्वविद्यालय के विदेशी छात्र कार्यालय से मौजूदा लिखित दिशा निर्देश जरूर लेने चाहिए.

तीसरा हिसाब: अमेरिका में पढ़ाई वास्तव में कितनी महंगी है

अमेरिका जाने वाले छात्र को सिर्फ पढ़ाई की फीस नहीं देखनी चाहिए. इसके अलावा विश्वविद्यालय शुल्क, रहने की जगह, खाना, स्वास्थ्य बीमा, किताबें, आने जाने का खर्च और व्यक्तिगत खर्च भी जुड़ते हैं.

एजुकेशन यूएसए भी छात्रों को कुल सालाना खर्च निकालते समय पढ़ाई की फीस और रहने के खर्च दोनों को साथ देखने की सलाह देता है.

इसलिए किसी विश्वविद्यालय की पढ़ाई की फीस कम दिख रही है तो तुरंत उसे सस्ता विकल्प मान लेना ठीक नहीं. न्यूयॉर्क, कैलिफोर्निया जैसे महंगे इलाकों में रहने का खर्च किसी छोटे शहर या अपेक्षाकृत सस्ते क्षेत्र से काफी अलग हो सकता है.

परिवार को कम से कम चार साल का आर्थिक अनुमान बनाना चाहिए. इसमें फीस में संभावित बढ़ोतरी, डॉलर और रुपये की विनिमय दर, रहने का खर्च, स्वास्थ्य बीमा और आपातकालीन रकम को शामिल करना चाहिए.

चौथा हिसाब: स्कॉलरशिप बनाम एजुकेशन लोन

अगर किसी छात्र को अमेरिकी विश्वविद्यालय में दाखिला मिलता है तो सिर्फ उसकी रैंकिंग देखकर फैसला नहीं करना चाहिए. छात्रवृत्ति मिलने के बाद वास्तविक खर्च कितना बच रहा है, ये ज्यादा महत्वपूर्ण है.

मान लीजिए दो विश्वविद्यालयों में से एक की रैंकिंग बेहतर है, लेकिन दूसरा विश्वविद्यालय स्कॉलरशिप देने के बाद परिवार का कुल खर्च काफी कम कर देता है. ऐसी स्थिति में दूसरा विश्वविद्यालय आर्थिक रूप से ज्यादा समझदारी वाला विकल्प हो सकता है.

ऋण लेने वाले परिवारों को भुगतान की योजना भी पहले बनानी चाहिए. डॉलर में लिया गया शिक्षा ऋण और भारत में रुपये में होने वाली आय का मेल करेंसी एक्सचेंज के जोखिम को बढ़ाता है. इसलिए भविष्य की बहुत अच्छी तनख्वाह मानकर पूरा आर्थिक फैसला करना जोखिम भरा हो सकता है.

पांचवां हिसाब: विज्ञान और तकनीकी विषय वाले छात्रों को क्या फायदा

साइंड एंड टेक्नॉलजी, इंजीनियरिंग और गणित से जुड़े योग्य पाठ्यक्रमों में पढ़ने वाले एफ-1 छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद मिलने वाले सामान्य व्यावहारिक प्रशिक्षण के बाद 24 महीने का अतिरिक्त विस्तार मिल सकता है.

इससे योग्य छात्रों के लिए व्यावहारिक प्रशिक्षण की संभावित अवधि सामान्य व्यवस्था से ज्यादा हो सकती है. लेकिन विज्ञान और तकनीकी विषय की डिग्री होना नौकरी की गारंटी नहीं है.

डिग्री, विश्वविद्यालय, छात्र की योग्यता, नियोक्ता की पात्रता और उस समय लागू आव्रजन नियम सभी महत्वपूर्ण हैं. इसलिए किसी सलाहकार के सिर्फ इस दावे पर भरोसा करना सही नहीं है कि विज्ञान और तकनीकी विषय की डिग्री का मतलब अमेरिका में निश्चित नौकरी या स्थायी बसने का रास्ता है.

छठा हिसाब: सीपीटी और ओपीटी को एक ही चीज न समझें

सीपीटी और ओपीटी को लेकर सबसे ज्यादा भ्रम यहीं पैदा होता है. सीपीटी मुख्य रूप से पढ़ाई के दौरान पाठ्यक्रम से जुड़ी व्यावहारिक प्रशिक्षण व्यवस्था है, जबकि ओपीटी व्यावहारिक प्रशिक्षण की अलग व्यवस्था है जो पढ़ाई के दौरान और पढ़ाई पूरी होने के बाद दोनों रूपों में हो सकती है.

एक महत्वपूर्ण नियम ये भी है कि 12 महीने या उससे ज्यादा समय तक फुलटाइम सीपीटी इस्तेमाल करने पर छात्र पढ़ाई पूरी होने के बाद मिलने वाले ओपीटी के लिए पात्रता (एलिजिबिलिटी) खो सकता है.

इसलिए सीपीटी का इस्तेमाल सिर्फ इसलिए करना कि उससे जल्दी काम शुरू हो जाएगा, हमेशा समझदारी नहीं है. छात्र को अपने विश्वविद्यालय के विदेशी छात्र कार्यालय और जरूरत पड़ने पर योग्य इमिग्रेशन एक्सपर्ट से नियम समझने चाहिए.

सातवां हिसाब: विश्वविद्यालय की इंटर्नशिप नीति पहले पढ़ें

दाखिला लेने से पहले विश्वविद्यालय की फॉरेन स्टूडेंट वेबसाइट देखना अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है. खासकर ये देखना चाहिए कि इंटर्नशिप कोर्स का अनिवार्य हिस्सा है या वैकल्पिक, सीपीटी की मंजूरी कौन देता है और संघीय नीति में बदलाव होने की स्थिति में विश्वविद्यालय क्या करेगा.

अगस्त 2026 की घटनाओं ने दिखाया है कि एक ही देश के भीतर अलग-अलग विश्वविद्यालयों की नीतियां भी अलग हो सकती हैं. इसलिए किसी दूसरे छात्र का अनुभव अपने मामले पर सीधे लागू करना ठीक नहीं.

आठवां हिसाब: कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया को भी तुलना में रखें

अगर अमेरिका का विकल्प अनिश्चित लग रहा है तो कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया को सिर्फ दूसरा विकल्प नहीं मानना चाहिए. हर देश के वीजा नियम, पढ़ाई की फीस, रहने का खर्च, पढ़ाई के साथ काम करने के अधिकार, पढ़ाई के बाद मिलने वाले अवसर और रोजगार बाजार अलग हैं.

सही तुलना का तरीका ये है कि छात्र चारों देशों में समान पाठ्यक्रम और समान स्तर के विश्वविद्यालय के लिए कुल खर्च और पढ़ाई के बाद मिलने वाले अवसरों की तुलना करे.

सिर्फ वीजा आसानी से मिलने या विश्वविद्यालय की रैंकिंग देखकर फैसला करना आगे चलकर महंगा पड़ सकता है.

नौवां हिसाब: क्या अमेरिका अभी भी सबसे अच्छा विकल्प है

सीधा जवाब है, कई छात्रों के लिए हां, लेकिन हर छात्र के लिए नहीं. अमेरिका में दुनिया के टॉप विश्वविद्यालय, रिसर्च के मौके, तकनीकी क्षेत्र और बड़ा रोजगार बाजार अब भी मजबूत आकर्षण हैं. कॉमन ऐप के आंकड़े भी ये नहीं कहते कि भारतीय छात्रों ने अमेरिका को छोड़ दिया है. आंकड़े सिर्फ ये दिखाते हैं कि 2025-26 दाखिला चक्र में भारत से आवेदकों की संख्या में बड़ी गिरावट आई है.

टॉप विश्वविद्यालयों के लिए कॉम्पिटीशन भी कम नहीं हुई है. इसलिए 15 फीसदी गिरावट को दाखिला आसान होने का संकेत समझना भी गलती होगी.

दसवां और सबसे जरूरी हिसाब: दूसरा विकल्प पहले से तैयार रखें

आज अमेरिका जाने वाले भारतीय छात्र को सिर्फ दाखिले की योजना नहीं, बल्कि करियर की योजना भी बनानी चाहिए. विश्वविद्यालयों की सूची में कम से कम तीन तरह के विकल्प रखना समझदारी होगी. पहला महत्वाकांक्षी, दूसरा वास्तविक और तीसरा आर्थिक रूप से सुरक्षित.

इसके साथ वीजा जोखिम, कुल चार साल की लागत, छात्रवृत्ति, इंटर्नशिप नियम, सीपीटी नीति, ओपीटी पात्रता, विज्ञान और तकनीकी विषयों से जुड़े अतिरिक्त प्रशिक्षण की पात्रता और पढ़ाई के बाद रोजगार की संभावनाओं को एक साथ देखना चाहिए.

अमेरिकी शिक्षा का सपना खत्म नहीं हुआ है. लेकिन 2026 में इस सपने की कीमत सिर्फ डॉलर में नहीं लग रही. इसकी कीमत अनिश्चितता के रूप में भी सामने आ रही है.

भारतीय छात्रों के आवेदनों में 15 फीसदी की गिरावट शायद इसी बदलते हिसाब का सबसे साफ संकेत है. अब अमेरिका जाने का फैसला सिर्फ ये देखकर नहीं होना चाहिए कि विश्वविद्यालय कितना मशहूर है.

असली सवाल ये होना चाहिए कि चार साल बाद डिग्री, कर्ज, काम करने की कानूनी अनुमति और करियर को जोड़कर पूरा हिसाब छात्र के पक्ष में बैठता है या नहीं.

वीडियो: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो से मिले एस जयशंकर, क्या टैरिफ और H-1B वीजा पर हुई बातचीत?

Advertisement