अमेरिका के केन्द्रीय बैंक यानी फेडरल रिजर्व (Federal Reserve) ने दुनिया को चौंकाते हुए ब्याज दरों में 0.75 फीसदी की बढ़ोतरी का ऐलान किया है. 1994 के बाद यह पहला मौका है कि अमेरिका में ब्याज दरों में इतना बढ़ा इजाफा देखने को मिला है. 15 जून को फेडरल ओपेन मार्केट कमेटी यानी FOMC ने सर्वसम्मत से फैसला लिया कि महंगाई को काबू में करने के लिए कर्ज महंगा करना ही अंतिम हथियार है और 75 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी कर दी .आपको बताते हैं कि फेडरल रिजर्व है क्या है. जिस तरह भारत में आरबीआई का ओहदा है वैसे ही अमेरिका में फेडरल रिजर्व है यानी वहां का सेंट्रल बैंक. जैसे भारत में मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) मौद्रिक नीति की समीक्षा करती है वही काम फेड भी करता है.
अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का भारत पर क्या असर होगा ?
1994 के बाद यह पहला मौका है कि अमेरिका में ब्याज दरों में इतना बढ़ा इजाफा देखने को मिला है


अब लौटते हैं मुद्दे पर, दरअसल अमेरिका में महंगाई ने आम लोगों का जीना दूभर कर रखा है. अमेरिका में महंगाई 40 साल में सबसे ज्यादा है. मई के महीने में महंगाई दर 8.6 फीसदी पर पहुंच गई है. ऐसे में महंगाई पर काबू पाने के लिए फेड रिजर्व प्रमुख ब्याज दरों में बढ़ोतरी का फैसला ले रहा है. ब्याज दर बढ़ने से लोन महंगे हो जाते हैं. इससे लोगों कम खर्च करने लगते हैं. ऐसे में मांग घटती है और चीजों की कीमतें गिरनी शुरू हो जाती हैं. यह पहला मौका नहीं है इस साल मार्च से लेकर फेड की तरफ से तीसरी बार दरें बढ़ाई गई हैं.
भारत पर क्या असर पड़ने वाला है?
अगर आप सोच रहे होंगे कि अमेरिका में ब्याज दरे बढ़ने का भारत से क्या लेना देना है तो हम आपको बताते है. कारोबार की दुनिया में कहावत है कि अमेरिका को छींक भी आती है, तो दुनिया को जुकाम हो जाता है. मतलब यह है कि अगर वहां कुछ भी हलचल होती है तो भारत समेत दुनिया भर के बाजारों में खलबली मच जाती है. अमेरिकी शेयर मार्केट में गिरावट से न सिर्फ दूसरे देशों के शेयर मार्केट में सुनामी आ जाती है बल्कि सोने से लेकर क्रूड तक में बुलबुला फूटने लगता है. आपको आसान भाषा में समझाते हैं अमेरिका में ब्याज दरें कम रहती हैं, तो विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) उभरते बाजारों में खूब पैसा लगाते हैं क्योंकि वहां उनको कम रिटर्न मिलता है लेकिन इससे हमारा शेयर मार्केट बमबमाने लगता है. आप पिछले कुछ महीनों के आंकड़ें देखे तो पाएंगे कि जब से अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ी हैं विदेशी निवेशकों ने बंपर बिकवाली शुरू कर रखी है. इस साल जनवरी से अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक करीब 1.81 लाख करोड़ रुपये भारतीय बाजारों से निकाल चुके हैं.
इसके अलावा अमेरिका में प्रमुख ब्याज दर बढ़ने पर दुनिया भर के देश अपने यहां भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने लगते हैं. भारत में भी आरबीआई (RBI) ने फेड से कदमताल करते हुए ही रेपो रेट (Repo Rate) को बढ़ाना शुरू किया था जोकि अब तक जारी है. मई की शुरुआत से लेकर 8 जून के बीच आरबीआई ने रेपो रेट में 90 बेसिस प्वाइंट का इजाफा किया है. बहरहाल, होता यह है कि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने के साथ-साथ ही अमेरिका और भारत सरकार के बांड के बीच के यील्ड (रिटर्न) का अंतर कम होता जाता है. इस अंतर के चलते वैश्विक निवेशक भारतीय बाजारों से पैसा निकालने लगते हैं. रुपये-डॉलर की विनिमय दर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, जिससे रुपया और कमजोर होगा. इससे क्रूड इंपोर्ट बिल से लेकर विदेश में बच्चों को पढ़ाना महंगा पड़ेगा. कच्चे तेल , सोना और मोबाइल समेत दूसरे इलेक्ट्रानिक आइटम आयात करने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे भारत में महंगाई और भड़केगी.
होम लोन की EMI का बोझ बढ़ेगा ?
इतना ही नहीं अमेरिकी के केन्द्रीय बैंक ने आगे भी ब्याज दरें बढ़ाने का का संकेत दिया है. फेडरल रिजर्व के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने संकेत दिया कि जुलाई में भी ब्याज दरों में करीब-करीब इतनी ही यानी 0.75 फीसदी की बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है. फेड के अधिकारियों ने संकेत दिया है कि इस साल के आखिर तक अमेरिका में ब्याज दरें बढ़कर 3 फीसदी से ऊपर जा सकती हैं. आपको बता दें कि सालभर भी नहीं बीता है अमेरिका में ब्याज दरें शून्य के आसपास थी. ऐसे में अगर कर्ज की दरें 3 या 3.5 फीसदी तक पहुंची तो यह बढ़ोतरी काफी मायने रखती है. इसका असर भारत ही नहीं पूरी दुनिया को झेलना पड़ सकता है. भारत में महंगाई की पहले से मार झेल रहे मिडिल क्लास की मुश्किले और बढ़ सकती हैं क्योंकि खाने-पीने के चीजों के दाम समेत होम लोन, कार लोन और सभी तरह के लोन की ईएमआई का बोझ और बढ़ सकता है.
वीडियो: फेडरल रिजर्व ने कर्ज महंगा किया, भारत पर क्या असर होगा ?




















