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डॉलर के आगे रुपया 100 हो जाए तो भी 'चिंता नहीं', एक्सपर्ट ने असली संकट बताया

कई अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि डॉलर के मुकाबले रुपये का 100 तक पहुंचना अब दूर की कौड़ी नहीं रह गया है. दिलचस्प बात ये है कि इन एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत के लिए असली खतरा डॉलर के 100 रुपये पर पहुंचना नहीं है.

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अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि डॉलर के मुकाबले रुपये का 100 तक पहुंचना अब दूर की कौड़ी नहीं रह गया है (फोटो क्रेडिट: Business Today)

डॉलर के मुकाबले रुपया 100 रुपये से चंद कदम दूर है. हिंदू बिजनेस लाइन की एक खबर के मुताबिक 22 मई को डॉलर के मुकाबले रुपया 63 पैसे गिरकर 95.73 रुपये पर आ गया. इसका मतलब ये हुआ कि एक डॉलर के लिए आज की तारख में आपको 95 रुपये 73 पैसे खर्च करने होंगे.

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रुपया गिरा तो क्या अर्थव्यवस्था भी डूबेगी?  

लेकिन ऐसा नहीं है कि रुपया आज पहली बार गिरा है. पश्चिम एशिया में तनाव के चलते तेल और गैस सप्लाई में दिक्कतें जारी रहने से रुपया हाल के महीनों में भारी उतार-चढ़ाव से गुजर रहा है. ईरान युद्ध के बाद से इसमें और तेज गिरावट देखने को मिली है. पश्चिम एशिया में लड़ाई लंबी खिंचने और कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं.

ऐसे में कई अर्थशास्त्रियों का मानना ​​है कि डॉलर के मुकाबले रुपये का 100 तक पहुंचना अब दूर की कौड़ी नहीं रह गया है. दिलचस्प बात ये है कि इन एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत के लिए असली खतरा डॉलर के 100 रुपये पर पहुंचना नहीं है. असली दिक्कत महंगाई बढ़ना, नौकरियों और देश की इकोनॉमिक पर पड़ने वाला असर है.

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इंटरनेशनल मॉनेटरी फंड (IMF) की पूर्व डिप्टी मैनेजिंग डायरेक्टर और हार्वर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर गीता गोपीनाथ ने हाल ही में इस सोच में आए बदलाव को इस प्रकार व्यक्त किया कि पॉलिसी बनाने वाले लोगों को रुपये की गिरती साख पर कम और समूची  अर्थव्यवस्था पर ध्यान देने की जरूरत ज्यादा है. 

गोपीनाथ ने हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा, "संबंधित संख्या (100) एक्सचेंज रेट का वास्तविक मूल्य नहीं है. रोजगार, महंगाई दर और प्रोडक्शन ही मायने रखते हैं."

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'कमजोर रुपया हमेशा बुरा नहीं'

वहीं, भारत जिस तरह से ऊर्जा संकट से जूझ रहा है उसे देखते हुए अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों के बीच इस नजरिये को तेजी से समर्थन मिल रहा है कि कमजोर रुपया हमेशा बुरा नहीं होता. आमतौर से रुपये की कमजोरी को लगभग पूरी तरह से आर्थिक तनाव के संकेत के रूप में देखा जाता रहा है. लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि किसी बड़े बाहरी झटके के दौरान करेंसी का गिरना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है.

इंडिया टुडे में छपी एक खबर में अर्थशास्त्री मानते हैं कि कभी-कभी कमजोर रुपया अर्थव्यवस्थाओं को एडजस्टमेंट में मदद कर सकता है. वे कहते हैं कि जब रुपये का मूल्य गिरता है, तो आयात महंगा हो जाता है. इससे खुद ब खुद विदेशी वस्तुओं की मांग कम हो जाती है. भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम होता है. ऐसे में भारतीय कंपनियां अपने उत्पादों को बाकी देशों के मुकाबले सस्ता बनाकर विदेशों में निर्यात करती हैं. ऐसे में भारत प्रतिस्पर्धी देशों को टक्कर दे सकता है.

जियोजित इन्वेस्टमेंट्स लिमिटेड के चीफ इन्वेस्टमेंट स्ट्रेटजिस्ट डॉक्टर वीके विजयकुमार ने कहा, “रुपये का गिरना आंशिक रूप से एक समस्या है और आंशिक रूप से समस्या का समाधान भी है. रुपये के गिरने से निर्यात को बढ़ावा मिलता है. साथ ही विदेशी मुद्रा खर्च में कमी आती है.”

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विदेशी मुद्रा भंडार में बचत का दावा

भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर तेल विदेशों से आयात करता है. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के आसपास तनाव से तेल और गैस वगैरा की सप्लाई में रुकावट आ रही है. इस वजह से तेल की ऊंची कीमतें पहले से ही भारत के आयात बिल और डॉलर की मांग पर दबाव बढ़ा रही हैं. ऐसे हालात में अर्थशास्त्री तर्क देते हैं कि रुपये को धीरे-धीरे कमजोर होने देना गिरावट के असर को कुछ हद तक संभाल सकता है. इससे भारतीय रिजर्व बैंक को रुपये की गिरावट को थामने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार को तेजी से खर्च नहीं करना पड़ेगा.

रुपये की गिरावट को रोकने के लिए आरबीआई को ताबड़तोड़ कदम उठाने की जरूरत नहीं है. इस तर्क को नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और 16वें वित्त आयोग के चेयरमैन अरविंद पनगढ़िया का भी समर्थन मिला है. एक्स पर हाल ही में एक पोस्ट में पनगढिया ने आरबीआई से सीधे तौर पर आग्रह किया कि अगर डॉलर 100 रुपये के मनोवैज्ञानिक स्तर के पार चला जाए तो भी नीतिगत फैसलों पर असर डालने वाले कदम न उठाए जाएं. उन्होंने लिखा, "100 सिर्फ एक संख्या है, जैसे 99 और 101."

अरविंद पनगढ़िया का तो ये भी कहना है कि तेल संकट के दौरान रुपये को गिरने देना ज्यादा टिकाऊ रणनीति हो सकती है. खासकर अगर तेल और गैस के दाम लंबे समय तक ऊंचे बने रहते हैं. उन्होंने तर्क दिया, “यदि तेल की कमी लंबे समय तक बनी रहती है, तो रुपये को गिरने से बचाने के लिए किसी भी दूसरे तरीके को आजमाना घाटे का सौदा होगा.” वे आगे चेताते है कि रुपये का आक्रामक रूप से बचाव करने से अंततः भारत के विदेशी मुद्रा भंडार में कमी आ सकती है.

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वहीं, ब्रोकरेज फर्म चॉइस ब्रोकिंग की कमोडिटी एनालिस्ट कावेरी मोरे ने इंडिया टुडे से कहा कि सरकार और आरबीआई रुपये में तेज गिरावट के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील बने हुए हैं, क्योंकि इससे भारत का चालू खाता घाटा बढ़ सकता है. साथ ही समूची मैक्रोइकॉनॉमिक अस्थिरता पैदा हो सकती है.

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