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घर खरीदारों को बड़ा झटका, RERA को प्रोजेक्ट्स की डेडलाइन 4 महीने बढ़ाने का निर्देश

केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) ने देशभर की रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटीज (RERA) को एडवाइजरी जारी कर कहा है कि पात्र प्रोजेक्ट्स को 4 महीने का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है.

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पश्चिम एशिया में जारी लड़ाई से घर बनाने में इस्तेमाल होने वाले सामान मिलने में मुश्किल आई हैं (Business Today)

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  • केंद्र सरकार ने RERA के तहत रजिस्टर्ड कई रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स की समयसीमा को 4 महीने तक बढ़ाने की सलाह जारी की है ताकि प्रोजेक्ट्स को पूरा करने में राहत मिल सके।
  • पश्चिम एशिया में जारी तनाव और सप्लाई चेन बाधाओं के चलते निर्माण सामग्री की कमी और परिवहन लागत बढ़ने से रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स की डिलीवरी में देरी हो रही है।
  • इस फैसले से डेवलपर्स को प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय मिलेगा जबकि इससे लाखों होमबायर्स को घर की चाबी मिलने में अधिक समय लग सकता है।

अगर आप घर या फ्लैट के पजेशन का इंतजार कर रहे हैं तो आपका इंतजार लंबा खिंच सकता है. केंद्र सरकार ने RERA के तहत रजिस्टर्ड कई रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स को बड़ी राहत देते हुए उनकी समयसीमा 4 महीने तक बढ़ाने की सलाह दी है. इसका सीधा असर उन लाखों होमबायर्स पर पड़ सकता है, जो तय समय पर अपने घर की चाबी मिलने की उम्मीद कर रहे थे. 

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केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय (MoHUA) ने देशभर की रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटीज (RERA) को एडवाइजरी जारी कर कहा है कि पात्र प्रोजेक्ट्स को 4 महीने का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है.

घरों के पजेशन में क्यों हो सकती है देरी?

आजतक के पत्रकार आदित्य राणा के इनपुट के मुताबिक मंत्रालय का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी लड़ाई का असर दुनियाभर में सप्लाई चेन पर पड़ा है. घर बनाने में इस्तेमाल होने वाले कई जरूरी कच्चे माल और दूसरे सामान मिलने में दिक्कतों का सामना करना पड़ा है. इसके साथ ही सामान की आवाजाही और शिपिंग से जुड़ी चुनौतियां भी बढ़ी हैं. 

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इस वजह से वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने एक ऑफिस मेमोरेंडम जारी कर पश्चिम एशिया के हालात को 'फोर्स मेज्योर' (Force Majeure) की श्रेणी में माना है. रेरा कानून की धारा 6 के तहत युद्ध, प्राकृतिक आपदा या किसी दूसरी असाधारण परिस्थितियों में प्रोजेक्ट की समयसीमा बढ़ाने का प्रावधान है.

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किन प्रोजेक्ट्स को मिलेगा फायदा?

केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय की एडवाइजरी के अनुसार उन रजिस्टर्ड रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स को इस राहत का फायदा मिल सकता है जिनकी मूल कंप्लीशन डेट 28 फरवरी 2026 या उसके बाद खत्म हो रही है. संशोधित कंप्लीशन डेट 28 फरवरी 2026 या उसके बाद है या पहले से बढ़ाई गई समयसीमा 28 फरवरी 2026 या उसके बाद खत्म हो रही है. ऐसे प्रोजेक्ट्स को एकमुश्त 4 महीने का अतिरिक्त समय दिया जा सकता है.

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बिल्डरों को अलग से आवेदन नहीं करना होगा

आमतौर पर किसी प्रोजेक्ट की डेडलाइन बढ़वाने के लिए डेवलपर को संबंधित रेरा प्राधिकरण के पास आवेदन करना पड़ता है. लेकिन इस बार केंद्र सरकार ने राज्यों की रेरा अथॉरिटीज को सलाह दी है कि वे एक "कॉमन ऑर्डर" जारी करें ताकि पात्र प्रोजेक्ट्स को बिना अतिरिक्त कागजी कार्रवाई के राहत मिल सके. इसका उद्देश्य प्रशासनिक देरी कम करना और प्रभावित प्रोजेक्ट्स को तेजी से राहत देना है.

घर खरीदारों के लिए क्यों मायने रखता है?

इस फैसले से डेवलपर्स को प्रोजेक्ट पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय मिल जाएगा, लेकिन दूसरी तरफ कई खरीदारों का इंतजार बढ़ सकता है. जिन लोगों ने गृहप्रवेश, किराए से छुटकारा या निवेश से जुड़ी योजनाएं तय समयसीमा को ध्यान में रखकर बनाई थीं, हो सकता है कि उन्हें अब कुछ और महीने इंतजार करना पड़ सकता है. हालांकि सरकार का तर्क है कि यदि सप्लाई चेन की बाधाओं के कारण प्रोजेक्ट अधूरा रह जाता है तो इससे खरीदारों को और ज्यादा नुकसान हो सकता है. ऐसे में सीमित अवधि का विस्तार प्रोजेक्ट्स को पूरा कराने में मदद करेगा.

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54 लाख घरों की समय पर डिलीवरी मुश्किल!

दरअसल, पश्चिम एशिया संकट का असर केवल कागजों तक सीमित नहीं है. जून 2026 में प्रॉपर्टी कंसल्टेंसी फर्म Anarock की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और सप्लाई चेन बाधाओं की वजह से देशभर में करीब 54 लाख घरों की डिलीवरी प्रभावित हो सकती है. 

रिपोर्ट के मुताबिक अगर संघर्ष लंबा खिंचा तो निर्माण लागत बढ़ सकती है और सीमेंट, स्टील, एल्यूमीनियम, कॉपर तथा बाकी निर्माण सामग्री की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है. इससे प्रोजेक्ट्स की लागत और समयसीमा दोनों प्रभावित होने का जोखिम बढ़ जाता है.

पेट्रोल से लेकर गृहप्रवेश तक असर

पश्चिम एशिया में तनाव का असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल या रसोई गैस तक सीमित नहीं है. इसका असर अब रियल एस्टेट सेक्टर पर भी दिखाई देने लगा है. तेल कीमतों में बढ़ोतरी से परिवहन लागत बढ़ती है, जिसका सीधा असर निर्माण सामग्री की कीमतों पर पड़ता है. वहीं सप्लाई चेन में रुकावट आने से प्रोजेक्ट्स की रफ्तार धीमी पड़ सकती है. यानी मध्य पूर्व की आंच अब महंगाई तक सीमित नहीं है, ये लाखों परिवारों के गृहप्रवेश के सपनों पर भी असर डाल सकती है.

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बिल्डरों को राहत, खरीदारों का इंतजार बढ़ा

कुल मिलाकर केंद्र सरकार का ये कदम डेवलपर्स को मौजूदा चुनौतियों से निपटने के लिए अतिरिक्त समय देने की कोशिश है. लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि हजारों-लाखों होमबायर्स को अपने घर का पजेशन मिलने में देरी का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में जिन खरीदारों के प्रोजेक्ट इस दायरे में आते हैं, उन्हें अपने बिल्डर और संबंधित रेरा प्राधिकरण से नई समयसीमा की जानकारी जरूर लेनी चाहिए.

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