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इस बार अप्रेजल के बाद आपकी सैलरी कितनी कटेगी?

जानकारों का कहना है कि फिलहाल ज्यादातर कंपनियां नए लेबर कोड 2025 को लागू करने में ‘वेट एंड वॉच’ मोड में हैं. उन्होंने नए लेबर कोड और अपडेटेड इनकम टैक्स नियमों को लेकर प्लानिंग जरूर की है, लेकिन सैलरी स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव अभी पूरी तरह लागू नहीं किए गए हैं.

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नए नियमों के मुताबिक मूल वेतन कुल सैलरी का 50% रखना जरूरी (फोटो क्रेडिट: Business Today)

अप्रेजल सीजन शुरू हो चुका है. नौकरीपेशा लोगों के लिए इस साल परफॉर्मेंस और सैलरी रिव्यू को लेकर दो सवाल हैं. पहला ये कि नए लेबर कोड 2025 से उनके हाथ में आने वाली सैलरी (इन-हैंड) पर क्या असर पड़ेगा? दूसरा, क्या कंपनियां बच्चों की पढ़ाई और हॉस्टल फीस जैसे टैक्स में छूट वाले भत्तों को अब CTC (Cost to Company) में जोड़ेंगी?

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अभी स्थिति क्या है?

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट में स्टॉफिंग फर्म टीमलीज सर्विसेज के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट बालासुब्रमण्यम ए का कहना है, "अभी ज्यादातर कंपनियां नए लेबर कोड 2025 को लागू करने में ‘वेट एंड वॉच’ मोड में हैं. उन्होंने नए लेबर कोड और अपडेटेड इनकम टैक्स नियमों को लेकर प्लानिंग जरूर की है, लेकिन सैलरी स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव अभी पूरी तरह लागू नहीं किए गए हैं. इसकी बड़ी वजह यह है कि अंतिम नियम-कायदे, राज्यों के नोटिफिकेशन और ये नियम कब से लागू होंगे इसको लेकर अभी समय सीमा तय नहीं हो पाई है.”

इसके अलावा, हर राज्य को वेतन सीमा (wage ceiling), किसी तरह के विवाद निपटाने की समय-सीमा, इंस्पेक्टर के अधिकार (जो संस्था इन नियम कायदों का पालन करने के लिए मॉनिटियरिंग करेगी) और छोटे प्रतिष्ठानों को मिलने वाली छूट जैसे पहलुओं पर अपने-अपने नियम बनाने और लागू करने होंगे.

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चार्टर्ड अकाउंटेंट और हंसमुख शाह एंड कंपनी एलएलपी के सीनियर पार्टनर भावेश शाह का कहना है, “कई नियोक्ता बार-बार बदलाव से बचने के लिए फिलहाल सैलरी स्ट्रक्चर में औपचारिक बदलाव टाल रहे हैं.” नियमों के मुताबिक, नियोक्ताओं को सामाजिक सुरक्षा लाभों (रिटायरमेंट फंड, एनपीएस वगैरा) की गणना करते समय कर्मचारी के सीटीसी का 50% हिस्सा मूल वेतन के मद में रखना होगा. 

कर्मचारी भविष्य निधि (ईपीएफ), ग्रेच्युटी और कर्मचारी राज्य बीमा वगैरा इसी आंकड़े से जुड़े होंगे. वर्तमान में, नियोक्ता आमतौर पर मूल वेतन को कुल पारिश्रमिक के 30-40% तक सीमित रखते हैं. यदि पारिश्रमिक में वृद्धि नहीं की जाती है, तो अधिक ग्रेच्युटी और ईपीएफ योगदान से टेक-होम सैलरी कम हो सकती है. हालांकि नए नियमों से भले ही मासिक वेतन कम हो जाए, लेकिन इससे लंबी अवधि में बचत बढ़ सकती है. 

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क्लियरटैक्स के फाउंडर और सीईओ, आर्चित गुप्ता टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में कहते हैं, “जिन संगठनों में ईपीएफ की गणना वास्तविक मूल वेतन के प्रतिशत के रूप में की जाती है, वहां रिटायरमेंट बेनेफिट्स के लिए अधिक योगदान देना होगा. परिणामस्वरूप, भले ही कुल सीटीसी समान रहे. लेकिन रिटायरमेंट से जुड़े फायदों के लिए अधिक आवंटन से कर्मचारियों का टेक-होम वेतन कम हो सकता है.”

आप अपनी कंपनी की पॉलिसी के हिसाब से EPF (प्रॉविडेंट फंड) में योगदान को सीमित कर सकते हैं. नियम के मुताबिक, आप इसे अधिकतम वेतन सीमा 15,000 रुपये का 12% रख सकते हैं, यानी हर महीने सिर्फ 1,800 अंशदान कर सकते हैं. ऐसा करने से आपके EPF में कम पैसा जाएगा और आपकी हाथ में आने वाली सैलरी (take-home salary) थोड़ी ज्यादा बची रहेगी.

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