16 सितंबर की आधी रात जब भारत में ज्यादातर लोग सो रहे थे, अमेरिका में एक बड़ा फैसला हो गया. सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरें 25 बेसिस पॉइंट बढ़ा दीं. साल 2023 के बाद ये पहला मौका है जब वहां ब्याज दरें बढ़ी हैं. आप सोच रहे होंगे कि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का भारत से क्या लेना देना? जबाव है कि लेना-देना है. फेडरल रिजर्व की रेट हाइक का भारत के शेयर बाजार, सोना-चांदी, रुपये और आपके होम लोन और कार लोन की किस्त पर भी दिख सकता है.
अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का आपकी EMI, प्रॉपर्टी और सोना-चांदी पर भी असर होगां?
आप सोच रहे होंगे कि अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ने का भारत से क्या लेना देना? जबाव है कि लेना-देना है. फेडरल रिजर्व की रेट हाइक का भारत के शेयर बाजार, सोना-चांदी, रुपये और आपके होम लोन और कार लोन की किस्त पर भी दिख सकता है.

आमतौर पर अमेरिका में कर्ज महंगा या सस्ता होने का असर दुनियाभर में देखने को मिलता ही है. भारत समेत अन्य देश भी अपने यहां कर्ज महंगा या सस्ता करते समय अमेरिका के केन्द्रीय बैंक और घरेलू-विदेशी परिस्थितियों को ध्यान रखते हैं. हालांकि, ऐसा भी नहीं कि RBI, फेडरल रिजर्व के फैसले को देखकर रेपो रेट में कटौती करता है.
ब्याज दरों में कटौती के कई और पैरामीटरों को ध्यान में रखकर RBI ब्याज दरें कम या ज्यादा करने पर फैसला करता है. जैसे देश में महंगाई, जीडीपी ग्रोथ और रुपये की हालत वगैरा क्या है. एसबीआई रिसर्च ने RBI की आगामी बैठक में रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की संभावना जताई है. अब नजर भारतीय रिजर्व बैंक की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी (MPC) की बैठक पर है. RBI की अगली बैठक 5 से 7 अक्टूबर के बीच होगी. ऐसे में अगर रेपो रेट बढ़ती है तो होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की किस्त बढ़नी तय है.
रियल एस्टेट डेवलपर बूट्स रियलिटी के मैनेजिंग डायरेक्टर दीपक राय ने लल्लनटॉप से बातचीत में कहा कि अगर अमेरिका के सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व के नक्शेकदम पर भारतीय रिजर्व बैंक भी अपनी आगामी मौद्रिक नीति में बदलाव करता है और रेपो रेट बढ़ाता है तो लोग कर्ज महंगा होने से घर खरीदना टाल सकते हैं. इससे प्रॉपर्टी की मांग में कमी आ सकती है. खासतौर से किफायती घरों (अफॉर्डेबल हाउस) की मांग पर असर पड़ सकता है. उनका कहना है कि लग्जरी सेगमेंट (महंगे घरों) की मांग में बहुत ज्यादा फर्क देखने को नहीं मिलेगा.
दीपक के मुताबिक रियल एस्टेट सेक्टर ईरान युद्ध के चलते रॉ-मैटेरियल की बढ़ती लागत से पहले से ही जूझ रहा है. अगर भारत में कर्ज महंगा होता है तो रियल एस्टेट सेक्टर और दबाव महसूस कर सकता है.
दीपक राय आगे बताते हैं कि कर्ज महंगा होने से रियल एस्टेट डेवलपर्स की फाइनेंसिंग कॉस्ट बढ़ती है. आमतौर पर रियल एस्टेट सेक्टर बैंकों, नॉन बैकिंग फाइनेंस कंपनियों (NBFC) और बॉन्ड के जरिये पैसा जुटाते हैं. ऐसे में अगर RBI भी घरेलू ब्याज दरों में बदलाव करता है तो डेवलपर्स के लिए फंडिंग कॉस्ट बढ़ सकती है.
हालांकि, उन्हें उम्मीद है आगामी नवरात्रि से शुरू होने वाले फेस्टिव सीजन में रियल एस्टेट सेक्टर में रौनक देखने को मिल सकती है. नवरात्रि, दशहरा और दिवाली को लोग नई प्रॉपर्टी खरीदने के लिए शुभ समय मानते हैं. रियल एस्टेट डेवलपर्स त्योहारी सीजन में डिस्काउंट, आसान पेमेंट प्लान, जैसे कई ऑफर देते हैं.
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शेयर बाजार पर क्या असर होगा?सेबी रजिस्टर्ड फर्म इंटेलीसिस वेंचर्स के फाउंडर अमित सुरेश जैन का कहना है कि भारतीय शेयर बाजार इस समय एक बड़ी दुविधा में खड़ा है. जब तक निफ्टी 24,100 के ऊपर नहीं जाता, तब तक इसका टेक्निकल स्ट्रक्चर पॉजिटिव नहीं होगा. ऐसी स्थिति में संभावना है कि बाजार यहां से एक बार 7–8% तक करेक्टिव मूव (गिरना) दिखा सकता है. लेकिन अगर निफ्टी 24,100 का स्तर पार कर जाता है, तो टेक्निकल सेटअप पॉजिटिव हो जाएंगे. तब बाजार में गिरावट की धारणा खत्म हो सकती है. फेड के इंटरेस्ट रेट हाइक के बाद यह संभावना और भी मजबूत हुई है. हो सकता है कि बाजार में इतनी बड़ी गिरावट दिसंबर 2026 से पहले देखने को मिले.
वीके वेल्थवाइज के रिसर्च एनालिस्ट सीए वत्सल खेमका ने लल्लनटॉप से बताते हैं कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों में बढ़ोतरी के बाद भारतीय शेयर बाजार पर दबाव बढ़ा है. हालांकि, मौजूदा गिरावट को सिर्फ फेडरल रिजर्व के फैसले से जोड़कर देखना सही नहीं होगा. महंगा क्रूड ऑयल, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी, रुपये की कमजोरी और ग्लोबल स्तर पर ब्याज दरों को लेकर चिंता जैसे कई कारण एक साथ भारतीय शेयर बाजार के सेंटीमेंट को प्रभावित कर रहे हैं.
वत्सल खेमका समझाते हैं कि फेड की दरें बढ़ने का सीधा असर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड पर पड़ता है. जब अमेरिका में बॉन्ड की यील्ड बढ़ती है तो विदेशी निवेशकों के लिए कम जोखिम वाले अमेरिकी बॉन्ड्स में निवेश करना फायदेमंद हो जाता है. ऐसे में भारत जैसे उभरते शेयर बाजारों से विदेशी निवेशक दूरी बनाने लगते हैं. इसका असर विदेशी निवेश, रुपये और भारतीय शेयर बाजार में गिरावट के रूप में दिख सकता है.
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि फेड की दरें बढ़ते ही भारतीय बाजार में बड़ी गिरावट आना तय है. बाजार पर असर इस बात पर भी निर्भर करता है कि फेड आगे ब्याज दरों को लेकर क्या संकेत देता है. वत्सल खेमका का मानना है कि हाल-फिलहाल भारतीय शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है.
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सोने-चांदी में आगे तेजी या मंदी?फाइनेंशियल सर्विस प्रोवाइडर RMoney की सीनियर कमोडिटी एनालिस्ट एंड रिसर्च मैनेजर मौमिता सामंता ने लल्लनटॉप को बताया कि फेडरल रिजर्व के चेयरमैन केविन वॉर्श ने इस बात पर जोर दिया है कि महंगाई अभी भी 2% की सीमा से ऊपर है. इसलिए साल के आखिर में ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी की संभावना हो सकती है. बाजार को पहले से ही इस दर बढ़ोतरी का अंदाजा था. इसका संकेत पहले भी फेड चेयरमैन ने दिया था.
इस वजह से सोना और चांदी के दाम काफी गिर चुके हैं. सोना अपने हालिया उच्चतम स्तर 1 लाख 64 हजार 773 रुपये प्रति दस ग्राम से गिरकर 1 लाख 49 हजार 665 रुपये के आसपास आ गया. वहीं चांदी 2 लाख 48 हजार 800 रुपये प्रति किलोग्राम से गिरकर 2 लाख 29 हजार 751 रुपये पर आ गई है.
मौमिता सामंता आगे बताती हैं कि ये बात सही है कि फेड के फैसले के तुरंत बाद भी सोने-चांदी में तेज गिरावट आई, लेकिन दोनों ने अपने हालिया निचले स्तर को नहीं तोड़ा और वापस संभल गए. इसके अलावा, तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक कम होने से सोने और चांदी की कीमतों को सहारा मिला. हालांकि, डॉलर इंडेक्स 100.354 के उच्च स्तर तक पहुंचने के बावजूद ऊंचे स्तरों पर टिक नहीं पाया.
मौमिता ने कहा कि अगर सोने की कीमतें 1 लाख 51 हजार 500 रुपये प्रति दस ग्राम के अहम सपोर्ट लेवल से ऊपर बनी रहती हैं और 1 लाख 53 हजार 500 रुपये के रेजिस्टेंस लेवल को पार कर लेती हैं, तो सोने की कीमतें 1 लाख 55 हजार 500 रुपये और फिर शॉर्ट टर्म में 1 लाख 57 हजार रुपये प्रति दस ग्राम तक जा सकती हैं.
इसी तरह चांदी की कीमतों में भी तेजी आई है और इसने 2 लाख 35 हजार के अहम रेजिस्टेंस लेवल से ऊपर कारोबार करना शुरू कर दिया है. अगर कीमतें इस लेवल पर बनी रहती हैं तो शॉर्ट टर्म में चांदी के लिए अगला लक्ष्य 2 लाख 45 हजार रुपये हो सकता है.
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