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ईरान युद्ध से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार क्यों लुढ़का? अब कितना बचा है?

विदेशी मुद्रा भंडार में कमी दिखाती है कि सरकारें अपनी मुद्रा को संभालने के लिए बाजार में डॉलर बेच रही हैं. साथ ही दूसरी विदेशी संपत्तियों की वैल्यू घटने से भी नुकसान हुआ है.

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भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 5.2% घटा है (फोटो क्रेडिट: Business today)

ईरान युद्ध और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से इंटरनेशनल मार्केट में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गया है. इस संकट से बचने के लिए दुनियाभर के देशों के सेंट्रल बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार से पैसे का इस्तेमाल कर रहे हैं. नतीजा, एशिया में विदेशी मुद्रा भंडार सिकुड़ रहा है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. फिलीपींस और भारत एशिया के दो ऐसे देश हैं जिनके विदेशी मुद्रा भंडार में पर्सेंट के हिसाब से सबसे ज्यादा गिरावट आई है. 

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टाइम्स ऑफ इंडिया ने ब्लूमबर्ग के हवाले से बताया है कि विदेशी मुद्रा भंडार में कमी दिखाती है कि सरकारें अपनी मुद्रा को संभालने के लिए बाजार में डॉलर बेच रही हैं. साथ ही दूसरी विदेशी संपत्तियों की वैल्यू घटने से भी नुकसान हुआ है.

इसका एक बड़ा असर देश की आयात क्षमता पर पड़ता है. यानी कोई देश अपने रिजर्व के दम पर कितने महीनों तक जरूरी सामान (जैसे तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक्स) आयात कर सकता है. जब विदेशी मुद्रा भंडार घटता है, तो यह आयात करना भारी पड़ता है. ऐसी स्थिति में सेंट्रल बैंक महंगाई और करेंसी पर दबाव रोकने के लिए लंबे समय तक ब्याज दरें ऊंची (ज्यादा) रख सकते हैं .

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भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर सबसे ज्यादा असर

जिन देशों के विदेशी मुद्रा भंडार में सबसे ज्यादा गिरावट देखी गई है उनमें फिलीपींस, भारत और इंडोनेशिया शामिल हैं. युद्ध शुरू होने के बाद से फिलीपींस का विदेशी मुद्रा भंडार 8.1% घटकर 104 अरब डॉलर (करीब 9 लाख 95 हजार 680 करोड़ रुपये) रह गया है. वहीं, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 5.2% घटकर 691 अरब डॉलर (करीब 66 लाख 15 हजार 550 करोड़) हो गया है. इंडोनेशिया के विदेशी मुद्रा भंडार में 3.8% की गिरावट आई है और यह करीब 14 लाख करोड़ रुपये रह गया है. 

इन देशों के केंद्रीय बैंकों के बार-बार हस्तक्षेप के बावजूद इनकी मुद्रा में भारी गिरावट जारी है. फरवरी के अंत से, फिलीपीन पेसो में 6.1%, भारतीय रुपये में 5% और इंडोनेशियाई रुपिया में 4% की गिरावट आई है.

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क्यों खाली हो रहा 'खजाना' ?

पहली वजह ये है कि ये देश तेल और गैस के लिए विदेशों पर बहुत अधिक निर्भर हैं. फिर भी, कई विश्लेषकों का मानना ​​है कि एशियाई अर्थव्यवस्थाएं 1990 के दशक के उत्तरार्ध के एशियाई वित्तीय संकट की तुलना में कहीं अधिक मजबूत स्थिति में हैं.

भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर डी. सुब्बाराव का कहना है, "भारत सहित एशियाई देशों ने पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार जमा कर लिया है. इन देशों के मैक्रो फंडामेंटल्स भी अभी मजबूत हैं, लेकिन वे आम तौर पर बड़े तेल आयातक भी हैं. साथ ही, एशियाई अर्थव्यवस्थाओं के विकास के मुख्य कारक, जैसे निर्यात वगैरा, पर भी असर पड़ने वाला है.”

सोना-चांदी पर इंपोर्ट ड्यूटी से कितना फायदा?

भारत ने 12 मई को सोना और चांदी पर आयात शुल्क बढ़ाकर 15 पर्सेंट कर दिया. यह कदम सोने के आयात को कम करने और मिडिल ईस्ट में जारी लड़ाई की वजह से रुपये को सहारा देने के उद्देश्य से उठाया गया है. इस पूरे मामले पर नजर रखने वाले सूत्रों का कहना है कि सरकार विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत करने के लिए कई तरह के इमरजेंसी उपायों पर भी विचार कर रही है. इसमें पेट्रोल और डीजल की कीमतों में संभावित वृद्धि भी शामिल है.

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