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भारत में कमाया पैसा यहीं निवेश करने से क्यों बच रही हैं कंपनियां?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अक्सर कई बार सार्वजनिक तौर पर हैरानी जता चुकी हैं कि प्राइवेट कंपनियां निवेश करने के लिए इतनी अनिच्छुक क्यों दिखती हैं.

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भारतीय कंपनियां निवेश से क्यों बच रही हैं? (फोटो क्रेडिट: Business Today)

पिछले हफ्ते मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंथा नागेश्वरन ने कहा था कि कोविड महामारी के बाद देश की 500 बड़ी लिस्टेड कंपनियों का मुनाफा हर साल 30% से ज्यादा बढ़ा है. इसके बावजूद प्राइवेट सेक्टर में नई फैक्ट्री, मशीनों और बिजनेस विस्तार में निवेश की रफ्तार उम्मीद से कमजोर रही है. न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग के एक लेख में बताया गया है कि मुख्य आर्थिक सलाहकार इस तरह की शिकायत करने वाले अकेले शख्स नहीं हैं.  

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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अक्सर कई बार सार्वजनिक तौर पर हैरानी जता चुकी हैं कि प्राइवेट कंपनियां निवेश करने के लिए इतनी अनिच्छुक क्यों दिखती हैं. उन्होंने बार-बार बताया है कि सरकार ने टैक्स कम किए हैं. बैंकों की बैलेंस शीट साफ की गई. खपत बढ़ाने (उपभोक्ता मांग) को समर्थन देने की कोशिश की है. बुनियादी ढांचे को बेहतर करने के लिए सरकारी पैसा खर्च किया है. फिर भी उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि कंपनियां निवेश क्यों नहीं कर रही हैं. 

निवेश नहीं तो विकास कैसे होगा?

ब्लूमबर्म के लेख में बताया गया है कि सरकार की चिंता जायज है. अगर कंपनियां निवेश नहीं करेंगी तो देश की इकोनॉमी का विस्तार नहीं होगा. तेज आर्थिक विकास दर की सबसे बड़ी रुकावट कम निवेश है. एक दशक पहले अच्छे दौर में कंपनियां और प्राइवेट सेक्टर देश की जीडीपी के 40% से ज्यादा हिस्से के बराबर निवेश कर रहे थे, लेकिन अब यह औसतन करीब 10% घट चुका है. मुनाफा बढ़ने के बावजूद नया निवेश पहले जितना नहीं हो रहा. इसमें सरकार का लगातार बढ़ता निवेश भी शामिल है . 

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निजी कंपनियों के विस्तार की धीमी रफ्तार को देखते हुए सरकार को खुद ज्यादा खर्च करना पड़ा. इसके बावजूद वित्त वर्ष 2023-24 तक देश में फैक्ट्री, मशीनें, इंफ्रास्ट्रक्चर वगैरा में कुल निवेश घटकर एक दशक के सबसे निचले स्तर ( जीडीपी के करीब एक-तिहाई) पर आ गया.

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हाल के महीनों में भारत की आर्थिक वृद्धि करीब 8% दर्ज की गई. यह काफी अच्छी ग्रोथ है. इसमें बड़ा योगदान टैक्स (GST) घटने से खपत बढ़ना और महंगाई का नियंत्रण में रहना है. अब इन दोनों का असर कमजोर पड़ने लगा है, लेकिन सरकार अभी भी यह पता नहीं लगा पाई है कि प्राइवेट सेक्टर पूंजीगत खर्च बढ़ाने के उसके निर्देशों का पालन क्यों नहीं कर रहा है. पूंजीगत व्यय (Capital Expenditure) वह पैसा है जो सरकार या कंपनियां लंबे समय के लिए संपत्ति बनाने या कारोबार बढ़ाने पर खर्च करती हैं. जैसे नई फैक्ट्री बनाना, मशीनें खरीदना, सड़क-रेलवे बनाना, टेक्नोलॉजी अपग्रेड करना या नया प्लांट लगाना वगैरा.

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नई पीढ़ी को किस बात का डर?

अनंत नागेश्वरन का मानना है कि प्राइवेट कंपनियों के भारत में निवेश न करने के लिए दूसरी-तीसरी पीढ़ी (Gen Z) के कारोबारी जिम्मेदार हैं. उनका कहना है कि नई पीढ़ी प्रॉफिट को नए कारोबार, फैक्ट्री या जमीन पर लगाने के बजाय उसे बचाकर फैमिली, ऑफिस या दूसरे निवेश विकल्पों में लगा रहे हैं. जेन जी, वह पीढ़ी जो साल 1997 से 2012 के बीच पैदा हुई है.

ब्लूमबर्ग के इस आर्टिकल में कहा गया है कि देश की कई बड़ी कंपनियों का एक फैमिली कंट्रोल्ड स्वरूप यह दर्शाता है कि वे नए प्रयोग के बजाय सुरक्षा को प्राथमिकता देती हैं. कारोबारी घरानों को डर रहता है कि तीसरी पीढ़ी तक मेहनत से खड़ा किया गया उनका बिजनेस कहीं कमजोर न पड़ जाए.

एक कथन है कि बुजुर्ग लोग मिडिल क्लास से उठकर जो बिजनेस खड़ा करते हैं उसे पोता-पोती वाली पीढ़ी पतन की ओर ले जा सकती है. लेकिन देश में फैमिली कंट्रोल्ड बिजनेस में युवा वारिसों पर कारोबार खोने का दबाव उतना नहीं होता. ऐसे में वे कई बार कंपनी को आक्रामक तरीके से और आगे ले जाने के बजाय रोजमर्रा का मैनेजमेंट पेशेवरों को सौंप देते हैं और खुद दुबई जैसी जगहों पर फैमिली ऑफिस बनाकर काम संभालते हैं. 

ब्लूमबर्ग लिखता है कि भारत के कॉरपोरेट जगत में परिवार, जाति और रिश्तेदारी के मजबूत नेटवर्क का असर गहरा है. इसे बदलना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं. लेकिन कम से कम सरकार को ऐसा माहौल नहीं बनाना चाहिए जिससे कंपनियां और ज्यादा असुरक्षित महसूस करें और जोखिम लेने से बचें. लेकिन वास्तव में हो यही रहा है.

रिपोर्ट के मुताबिक इसीलिए भारत के सबसे अमीर कारोबारी देश के भीतर निवेश करने से हिचक रहे हैं और अपनी कुछ पूंजी विदेश भी ले जा रहे हैं. उन्हें लगता है कि भारत में राजनीतिक जोखिम बहुत ज्यादा है. उन्हें डर रहता है कि कभी भी भारी-भरकम और अप्रत्याशित टैक्स का बोझ पड़ सकता है या फिर बदलते राजनीतिक मिजाज का नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसलिए भारत में कमाए गए पैसे को वे अलग-अलग देशों में लगाने की कोशिश करते हैं ताकि भारत सरकार नियंत्रण से जितना संभव हो सके, उतना दूर रह सकें.

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विदेशी कंपनियां भी विदेश भेज रहीं कमाई 

यह असुरक्षा सिर्फ भारतीय उद्योगपतियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि कई विदेशी कंपनियों पर भी इसका असर पड़ रहा है. जनवरी 2026 में भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) करीब 53 हजार 330 करोड़ रुपये रहा. लेकिन इसी जनवरी के महीने में 46 हजार 270 करोड़ रुपये का मुनाफा बाहर भेज दिया गया. वहीं भारतीय कंपनियों का विदेशी निवेश 20 हजार 125 करोड़ रुपये रहा. 

सवाल बनता है कि जब भारत में अमीर बने लोग ही यहां दोबारा निवेश करने को लेकर आश्वस्त नहीं हैं, तो बहुराष्ट्रीय कंपनियां क्यों होंगी? 

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