आज की तारीख में कार की बात होगी तो EV का जिक्र जरूर होगा. कुछ सालों के अंदर ही EVs ने भारत की सड़कों पर रफ्तार पकड़ ली है, स्पेशली शहरों में. MG और Hyundai जैसे विदेशी ब्रैंड से लेकर देसी TATA तक लगातार इलेक्ट्रिक व्हीकल लॉन्च कर रहे हैं. मारुति सुजुकी ने भी समय रहते Maruti Suzuki e-Vitara को लॉन्च कर दिया है. यानी इंडिया में EV को लेकर कार कंपनियों के सपने फुल चार्ज लग रहे हैं. लेकिन ग्लोबल लेवल पर इसक उल्टा हो रहा है. EV की बैटरी चार्ज होने से पहले ही 'डिस्चार्ज' होती नजर आ रही है (EV global production to reset).
कार कंपनियों को रास नहीं आ रहे EV, अरबों के प्रोजेक्ट बंद, आखिर दिक्कत कहां है?
Honda, Ford, GM, Stellantis और Volkswagen ने अपने कुल साढ़े 6 लाख करोड़ रुपये के EV प्लान को राइट डाउन कर (global EV production is hitting a reset) दिया है. सीधा-सीधा कहें तो EV प्रोडक्शन का प्लग निकाल दिया है. ये सारी कंपनियां वापस से हाइब्रिड और पेट्रोल इंजन पर फोकस कर रही हैं.
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Honda, Ford, GM, Stellantis और Volkswagen ने अपने कुल साढ़े 6 लाख करोड़ रुपये के EV प्लान को राइट डाउन कर दिया है. सीधा-सीधा कहें तो EV प्रोडक्शन का प्लग निकाल दिया है. आखिर हुआ क्या है और प्लान क्या है, समझते हैं.
EV पर ब्रेक लगेगा क्या?सबसे पहले बात होंडा की करते हैं जिसने 16 मार्च को इंडिया में अपनी ईवी का प्रोडक्शन स्टार्ट किया है. कंपनी अपने 'O Alpha' ईवी को राजस्थान में बनाने वाली है. लेकिन ग्लोबल लेवल पर उसने अपने कई ईवी मॉडल कैंसिल कर दिए हैं. माना जा रहा है कि कंपनी को अपनी रणनीति बदलने के लिए 15.7 बिलियन डॉलर, यानी तकरीबन डेढ़ लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ेगा. वैसे भी कंपनी की हालत अच्छी है नहीं. 70 साल में पहली बार ऐसा होगा जब उसको प्रॉफ़िट नहीं होने वाला. कंपनी को अगले कुछ सालों में 2.5 ट्रिलियन येन का घाटा हो सकता है.
होंडा के बाद फोर्ड की तरफ गियर लगा लेते हैं. कंपनी ने तकरीबन पौने दो लाख करोड़ के ईवी प्रोजेक्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया है. जनरल मोटर्स ने 50 हजार करोड़ रुपये के प्रोजेक्ट से हाथ खींच लिए हैं तो Stellantis ने 70 हजार करोड़ के ईवी प्लान का फ्यूज़ निकाल दिया है. Volkswagen को Porsche को ईवी में बदलने के चक्कर में 5.1 बिलियन यूरो का झटका लगने वाला है. ये सारी कंपनियां वापस से हाइब्रिड और पेट्रोल इंजन पर फोकस कर रही हैं.
ये हम नहीं कह रहे, ये लाइन दुनिया की सबसे बड़ी ऑटो कंपनी Toyota से उधार ली गई है. जब देश-दुनिया की हर कार कंपनी Electric Car में अपने फ्यूचर की स्पीड तलाश रही, तब दुनिया की सबसे बड़ी कंपनी Toyota को शायद (Toyota electric car) इसमें कोई खास स्पार्क नजर नहीं आता.
Forbes की रपट के मुताबिक, कंपनी के पूर्व CEO Akio Toyoda ने साल 2021 में ही साफ कर दिया था कि इलेक्ट्रिक कारें उनकी कंपनी के फ्यूचर प्लान का असल हिस्सा नहीं हैं. उन्होंने बैटरी की लागत के साथ इसके बनते समय होने वाले कार्बन उत्सर्जन को लेकर भी चिंता जताई थी. कंपनी अपनी बात पर आज भी कायम है.
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Toyota वो पहले से कर रही जो बाकी कार कंपनियां अभी सोच रही हैं. कंपनी हाइब्रिड कारों पर ध्यान दे रही है. हाइब्रिड मतलब Hybrid Electric Vehicle. इसमें कार के अंदर एक छोटी बैटरी लगी होती है. साथ में पेट्रोल और डीजल का भी प्रबंध होता है. बैटरी कार के चलने से चार्ज होती रहती है. जितनी देर बैटरी में दम होता है वो चलती है. फिर खुद से पेट्रोल पर शिफ्ट हो जाती है.
बैटरी चार्ज होने के लिए इस्तेमाल होती है रीजनरेटिव ब्रेकिंग तकनीक. जैसे ही आपने ब्रेक पर पैर रखा इलेक्ट्रिक मोटर उल्टा चलने लगती है और बैटरी को चार्ज कर देती है. कंपनी इसी को फ्यूचर मानती है और उसका फोकस हाइब्रिड कारों को किफायती बनाना है. बाकी कंपनियों के नुकसान को देखकर लगता है जैसे कि जापानियों को सब पहले से पता था.
आखिर ईवी में दिक्कत क्या है?दिक्कत ईवी में नहीं बल्कि इसमें लगने वाली लीथियम आयन बैटरी की लागत में है. गाड़ी की कीमत का कम से कम 60 फीसदी पकड़ लीजिए. माने 10 लाख रुपये की कार में 6 लाख बैटरी का. लीथियम आयन बैटरी के सेल बहुत महंगे होते हैं. दुनिया में केवल 4 या 5 कंपनियां इन्हें बनाती हैं. भारत में तो ये बनते ही नहीं हैं. मेड इन इंडिया इलेक्ट्रिक कारों और स्कूटर्स के लिए इन्हें इम्पोर्ट करना होता है. इसकी कीमत और भी ज्यादा है.
एक दर्द और है. Li-ion बैटरी के लिए पूरी दुनिया चीन पर निर्भर है. इसी निर्भरता के चक्कर में जापान मात खा गया वर्ना उसने तो काफी पहले ही इलेक्ट्रिक गाड़ियां बना ली थीं. वैसे भी ये कोई रहस्य नहीं रहा कि इलेक्ट्रिक व्हीकल में सबसे महंगा पार्ट बैटरी ही होती है. कुल कीमत का 60-70 फीसदी. माने अगर कार 10 लाख की तो बैटरी 6 लाख के अल्ले-पल्ले.
ईवी के लिए मुफीद इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं होना भी एक दिक्कत है. भारत जैसे बड़े देश में इनके चार्जिंग स्टेशन बनने में सालों लगने वाले हैं. सर्विस सेंटर पर अभी इनको ठीक करने वाले भी नहीं. ये सब तो दूर की बात. यूजर्स से लेकर कंपनियों को अभी ये भी नहीं पता कि इनको साफ कैसे किया जाता है. बैटरी बनाने से होने वाले प्रदूषण को तो अभी हमने टच भी नहीं किया है.
ऐसे में ईवी का ‘एक्सेलेरेटर’ दबना मुश्किल लग रहा है. हालांकि BYD जैसी कंपनियां सस्ती और जल्दी चार्ज होने ववाली बैटरी पर काम तो कर रही हैं, मगर इस तरह से बड़ी कंपनियों की रेंज खत्म हो जाना खतरे की घंटी तो है.
पता है-पता है, आप कहोगे कि इंडिया में सब चंगा सी. हम कहेंगे इंडिया अतीत में कई किस्म की तकनीकों का डम्पिंग यार्ड रहा है. आगे आप समझदार हैं.
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