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ग्राउंड रिपोर्ट अयोध्या : इस बार किन्नर एंगल न होने से बीजेपी राहत में है

राम वनवास के लिए जा रहे थे. जब तमसा नदी के तट पर रात्रि विश्राम हेतु रुके तो अयोध्या से साथ आ रहे नर नारियों से निवेदन किया. वापस लौट जाने का. सब सुमंत जी संग चले गए. राम आगे बढ़ गए. जब लंका विजय कर लौटे, तो पुष्पक विमान को श्रंगवेरपुर में रोका. जहां जाते समय उन्हें निषादराज गुह मिले थे. यहां से राम अयोध्या चले गए. दीवाली मनी फिर दरबार सजा. और तब वहां दुहाई की पुकार लगाते हुए पहुंचे किन्नर. जो 14 साल से तमसा नदी के तट पर राम का इंतजार कर रहे थे. दरअसल राम ने नर नारियों को लौट जाने के लिए कहा था. किन्नर इन दोनों श्रेणियों में नहीं थे. तो वह क्या करते. वहीं रुके रहे, जब उन्हें राम की वापसी का पता चला तो यहां आए. बोले, प्रभु हम तो आपका वहां कबसे इंतजार कर रहे थे. इस पर राम ने कहा. भक्ति आपकी हमें सुहाई. कलिकाल में आपकी भी मान्यता होगी. कुछ लोगों ने इसे यूं व्याख्यायित किया कि कलिकाल में किन्नरों का राज होगा. किन्नर जब मांगने आते हैं तो ये टेक दोहराते भी हैं. कि हम राजा हैं. हमका देओ
– मानस कथा मर्मज्ञ संत प्रेम भूषण के अनुसार

 

ये पॉलिटिकल ग्राउंड रिपोर्ट में मानस कथा का जिक्र क्यों. क्योंकि रपट अयोध्या की है. राम की नगरी. तुलसी के भगवान की नगरी. जिनकी लीला को उन्होंने अवधी में लिख घर घर पहुंचा दिया. अयोध्या. जिला फैजाबाद. सीट एक. राजनीतिक महत्व अनेक. इसीलिए जब 2012 में यहां से बीजेपी के लल्लू सिंह हारे तो बड़ी खबर बनी. उन्हें हराया तेज नारायण पांडे उर्फ पवन पांडे ने. रसूलाबाद गांव का लड़का. जिसने लखनऊ यूनिवर्सिटी की राजनीति की. यहीं से वो मुलायम सिंह यादव के परिवार के करीब आया और फिर टिकट ले आया. इससे पहले अयोध्या में साल 1989 में उनके मामा जीते थे. जयशंकर पांडे. जनता दल के टिकट पर. मगर ये रामलहर से पहले की बात थी. और साल 2012 में पवन पांडे की जीत और लल्लू की हार की वजह, ये दोनों नहीं कोई तीसरा था.

तीसरा, न नर न नारी. तीसरा. किन्नर. नाम गुलशन बिंदू. फरीदाबाद के पास जिसका डेरा. मगर चुनाव लड़ने यहां आईं. भाजपाइयों की मानें तो ये सोनिया गांधी और दिग्विजय सिंह की साजिश थी. दिग्गी तब राहुल गांधी के राजनीतिक गुरु और यूपी के प्रभारी हुआ करते थे. गुलशन यहांआईं तो देश भर के मशहूर किन्नर उनके समर्थन में आए. गोरखपुर की मेयर रही आशा देवी, जबलपुर की विधायक रहीं शबनम मौसी, बिग बॉस से मशहूर हुईं लक्ष्मी जैसे नाम हफ्तों डेरा डाले रहे. और जब ये किन्नर समूह डेरों से निकल गलियों में जाता तो क्या करता. नाचता-गाता और बदले में शगुन के रुपये नहीं वोट मांगता. लाल कपड़े में चावल रख देता और बदले में कसम लेता. कसम कि अयोध्या के लोग सबसे बड़े रामभक्तों का साथ देंगे. गुलशन का ये तरीका खूब काम किया. उन्हें 22 हजार से ज्यादा वोट मिले.

और लल्लू सिंह जो 1991 से लगातार चुनाव जीत रहे थे, हार गए. बीजेपी राहत में है. क्योंकि इस बार गुलशन मैदान में नहीं है. अस्पताल में हैं. लखनऊ के. अभी दो रोज पहले उनका ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन हुआ है. लल्लू सिंह की हार की एक वजह बसपा के नेता वेद गुप्ता भी थे. वेद तीसरे नंबर पर रहे और उन्हें 33 हजार वोट मिले. पांच साल बीत गए हैं. विधानसभा चुनाव के दो बरस बाद लोकसभा चुनाव हुए. बीजेपी के लल्लू सिंह पूर्व विधायक से मौजूदा सांसद हो गए. और उसके दो बरस बाद अब फिर विधानसभा चुनाव. लल्लू चाहते थे कि उनके बेटे विकास को टिकट मिले. विकास कुछ ही महीने पहले एक्टिव हुए. सांसद जी की नहीं सुनी गई. टिकट दे दिया गया वेद गुप्ता को. जी, अभी आपने उनके बारे में ऊपर एक वाक्य में पढ़ा था. बसपा नेता वेद गुप्ता. उससे पहले वेद गुप्ता सपा नेता थे. तब भी विधायकी लड़े थे और हारे थे. विरोधी कहते हैं कि गुप्ता जी हार की हैट्रिक बनाएंगे. हर बार नए दल से. वेद गुप्ता कहते हैं कि मेरे हाथों से रामलला के शहर में विकास होना है, इसलिए प्रभु ने ये मौका दिया. और बीजेपी की वैन संग घूम रहे युवा समर्थक कानों में कहते हैं, वेद तो मजबूरी हैं. मोदी जी का जीतना जरूरी है.

तो वेद गुप्ता को टिकट कैसे मिल गया. न तो वह सिटिंग विधायक थे, न ही दूसरे नंबर पर रहे मजबूत नेता. और अयोध्या में तो भाजपा के पास नेताओं की कमी नहीं थी. इलाके में घूमे तो सबने नाम न लिखने की शर्त पर कहानी सुनाई. एक ही कहानी. कि वेद गुप्ता रहने वाले तो यहां के हैं, मगर कारोबार राजस्थान में जमाया है. कोटा के पास. और वहीं के हैं ओम माथुर. भाजपा महासचिव. यूपी प्रभारी. तो वेद गुप्ता का ओम ने कल्याण किया. चाहे पार्टी कार्यालय हो या प्रचार में घूम रही टोली. सबने कहा. बताइए. जो जमीन पर बरसों से घिस रहे हैं, उन्हें अब वेद गुप्ता को ढोना पड़ रहा है. पार्टी जो न कराए. सो कम है. ऐसा नहीं कि ये करुण क्रंदन सिर्फ सदर सीट पर है. फैजाबाद जिले की पांच में से चार सीटों पर भाजपा ने दूसरी पार्टी से आए नेताओं को टिकट दिया. कहीं बसपा से आए खब्बू तिवारी मैदान में हैं, तो कहीं रालोद के मुन्ना सिंह चौहान की पत्नी. सिर्फ एक सीट पर सिटिंग विधायक भाजपा के थे तो टिकट रिपीट हो गया. उधर पवन हैं जो जीत रिपीट करना चाहते हैं. पवन के साथियों का दावा. मंत्री जी ने पांच साल में इतने काम करवाए, जितने 22 साल में नहीं हुए.

एक मशहूर अखाड़े के प्रमुख भी ये बात मानते हैं. मगर ये भी कहते हैं कि विकास जितना अयोध्या का हुआ, उससे कहीं ज्यादा पवन के साथियों का हुआ. ये साथी हमें भी मिले. बड़ी तादाद में सपा के जिला कार्यालय में. ये कार्यालय वक्फ बोर्ड की जमीन पर बनी बिल्डिंग में चलता है. यहां जो भी युवा मिला, सब ठेकेदार हैं. या ठेकेदारी करने की चाह रखते हैं. निर्माण होगा तो विकास होगा. किसका, ये अपने पाले से तय कर लें.

कार्यालय के बाहर हमें एक मनिहारन (चूड़ी) का काम करने वाले सज्जन मिले. लुंगी, बनियान, एक हाथ में चाय, दूसरे में सिगरेट. बोले, ऐ मीडिया वाले, इनकी क्या सुनते हो, हमारी सुनो. सुनने लगे. बोले लिखो हमारा नाम और बात. साजिद नाम लिखा. बात लिखी ये कि यहां कोई काम नहीं हुआ. सब बदमास हैं. एक तरफ से. फिर साजिद उत्तेजित हो गए. झटके से चाय फेंक हमारी तरफ बढ़े. सपा समर्थकों ने पीछे खींचा और बताया कि साजिद का दिमाग खराब है.

वहां से हटे तो गुलाब बाड़ी गए. फैजाबाद की शान. और वहां से लौटे तो यही सोचते रहे साजिद का दिमाग ज्यादा खराब है या सपा दफ्तर के सामने बनी इस ऐतिहासिक इमारत की शक्ल. गुलाब बाड़ी. अवध के नवाब की ऐशगाह. जहां शुजाउद्दौला और उनकी मां की कब्र है. चार बाग स्टाइल में चारों तरफ बगीचे. एएसआई का बोर्ड. और खूब सारे फूल. फूल वाले फूल और प्यार वाले फूल. साथ चल रहे लकी ने बताया. ये हमारे यहां का लोहिया पार्क है. लोहिया पार्क लखनऊ में है और सैंटों के मुताबिक आशिकों से आबाद रहता है. गुलाब बाड़ी में खूब कपल्स दिखे. अच्छा लगा. प्रेम की जहां जगह हो अच्छा है. मगर कुछ अच्छा नहीं खराब, बल्कि बेहद खराब लगा. बाड़ी की हालत. चारों तरफ की दीवार में छेद हैं. कितने बड़े. इतने कि भैंस अंदर आकर घास चर लें. पानी भी पी सकती हैं. जो फव्वारों वाली गलियों में भरा है. कहीं मैला, कहीं मछलियों से लबालब. कहीं काई, कहीं प्लास्टिक रैपर वाली गंदगी. कुल मिलाकर दयनीय हालत. वक्त के सितम बताती. एक घड़ी भी थी यहां. वक्त बताती. जो दान में दी गई थी इस जगह को. एक कारोबारी के द्वारा. जिनका नाम है बज्मी सिद्दीकी. साइकल का बिजनेस है. और साइकल सिंबल वाले को हराने की तमन्ना रखते हैं.

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बज्मी बीएसपी से अयोध्या सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं. पवन पांडे को उनसे खतरा है. उनके समर्थक कहते हैं कि बज्मी को हजार वोट भी नहीं मिलेगा मुसलमानों का. एक जगह बताया गया कि क्या करें जात भाई हैं अपने. आ जाते हैं तो खातिर दुआ सलाम और वादा करना पड़ता है. मगर आखिर में सब वोट साइकल पर जाएगा. लेकिन इसके उलट भी एक थ्योरी है. जिसके मुताबिक बज्मी बढ़िया चुनाव लड़ रहे हैं. उन्हें कुंजड़ा-मनिहारिन मुस्लिमों का खूब समर्थन मिल रहा है. भाजपा वाले चाहते हैं कि बज्मी अच्छा चुनाव लड़ें. वो जितना अच्छा लडे़ंगे, सपा को उतना ही नुकसान होगा. एक ने तो यहां तक कह दिया कि बीजेपी की फाइट ही बज्मी से है, पवन तीसरे पर हैं.

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पवन पांडे की तीसरी मुसीबत. बंसीलाल यादव. बहुजन मुक्ति पार्टी से लड़ रहे हैं .इस पार्टी को बीएसपी से अलग हुए बामसेफ वालों ने बनाया. मगर बंसीलाल को कांशीराम वाली दलित चेतना से लैस नेता न मानें. वह तो शिवपाल चेतना से लैस थे. उन्हीं के करीबी. उनकी लिस्ट में अयोध्या से टिकट पाए. मगर अखिलेश लौटे तो पवन भी लौटे. लिस्ट में. और अब बंसी कह रहे हैं कि इलाकाई यादवों का अपमान हुआ है. और इसी के नारे के साथ वह मैदान में हैं.

अयोध्या में मठ खूब हैं. और ब्राह्मण वोटर भी. इसी जाति समूह के कई नेता दावेदारी कर रहे थे टिकट के लिए. नहीं मिला तो अब शांत हैं. मगर बगावती नहीं दिख रहे. कहते हैं कि आखिर में छाती पर पत्थर रख कमल का बटन दबाएंगे. मोदी राज चाहते हैं. राज यहां रामलला का रहा. मगर अब जब मनुजों का राज आया तो सब जगह बुरा हाल है. घाटों पर निर्माण खूब है, मगर सफाई कतई नहीं. राम की पैड़ी विकट मैली है. सरयू नदी का पाट सिकुड़ता जा रहा है. कई लोगों ने इसकी वजह अवैध खनन भी बताया. इसी खनन के चक्कर में पवन पांडे एक ट्रेनी आईपीएस से भिड़ गए थे. आजमगढ़ के मूल निवासी और यहां पोस्टिंग पाए गोपेंद्र यादव से. शिकायत लखनऊ तक गई. पवन की लाल बत्ती चली गई. फिर कुछ टाइम बाद बहाल हुई.

अयोध्या में अमन शांति खूब बहाल है. यहां की गलियों में घूम लगता ही नहीं. कि कभी यहां लाखों लोग राम नाम के उन्माद में जुटे थे. और बाबरी मस्जिद ढहा चले गए थे. उस आंदोलन में लोकल फैक्टर बहुत कम था. ये बात इस मामले में एक वादी रहे और अब अल्लाह को प्यारे हो चुके हाजी हाशिम अंसारी के बेटे इकबाल ने भी कही.

हम इकबाल के घर गए. घर के बाहर सड़क पर एक मेकशिफ्ट टैंट. जहां उनके पिता की फोटो लगी है और कुछ कुर्सियों डली है. इकबाल ने गुटखा थूका और हमें प्रेम से भीतर ले गए. बताने लगे, हमने कोर्ट में अर्जी दी है. अब्बा की जगह बाबरी मस्जिद मामले पर वादकारी बनने की. अभी कुछ हुआ नहीं. सुन्नी वक्फ बोर्ड हाजी साहब को हजार रुपया महीने देता था. हमें नहीं देता है. तब तक अंसारी का बेटा आ गया. जो ग्रेजुएशन कर चुका है और नौकरी की तलाश में है. बोला, मुलायम सिंह यादव ने प्रॉमिस किया था हाजी साहब से. कि मुझे नौकरी देंगे. मगर आज तक नहीं मिली. मिले हमें वो दो सिपाही भी नहीं जो इनकी सुरक्षा में तैनात किए गए हैं. सरकार की तरफ से. 1991 से ही. पूछने पर अंसारी बोले, शाम का टाइम है. फ्रेश होने चले गए होंगे. दिन भर का करें बैठे बैठे. यहीं पीछे ही तो रहते हैं.

समझ लीजिए. इतना अमन है अयोध्या में. मगर तभी तक, जब तक बाहर के लोग और उनकी पीठ पर लद सियासत नहीं आती. अयोध्या राजपरिवार से जुड़े कवि यतींद्र मिश्र ने कहा. अयोध्या को टीवी पर देख मत समझिए. आक्रोश से भरे चुनावी नारों के हिसाब से इसकी छवि मन बनाइए. अयोध्या से मिलना है तो अयोध्या आइए. बिना किसी पूर्वाग्रह के. रामनवमी के दिन आइए. जब हर गली रामलला का घर बन जाती है. हर दूसरे घर में ढोलक पीट सोहर गाया जाता है. मुस्लिम बस्तियों में भी रामलीला खेली जाती है. यहां के राम सबके राम हैं. बाकी जो राम हैं. अपने अपने राम हैं. जिसके जैसे काम हैं. वैसे ही नाम हैं. लेने के तरीके अलग. नीयत अलग.

हुइहै सोई जो राम रचि राखा

को करि तरक बढ़ावे चाखा

राम की नगरी में बाहरी तर्क काम नहीं करते. अयोध्या अपने तर्क खोज रही है. सीताराम की मधुर धुन में. मुझे भी याद आ रहा है. एक भजन.

राघव ललन तेरे कोमल चरण
कहीं कंकरिया गरि नहीं जाए

देखिए. राम के रास्ते से नफरत के पत्थर हराइए. राम राज में तो सब सुख से रहते हैं न. और इसी भाव के साथ हमने निर्मोही अखाड़ा के संत रामदास से सवाल किया. रामदास जो मंदिर मस्जिद प्रकरण के एक और वादकारी हैं. हमने पूछा, कोर्ट के बाहर सुलह नहीं हो सकती. रामदास ने कहा. हो सकती है. मगर सुन्नी वक्फ बोर्ड मानेगा नहीं. मुस्लिम भाइयों को चाहिए कि दबाव बनाएं. दबाव किस चीज के लिए. रामदास के मुताबिक मुस्लिम इस स्थान से दावा छोड़ दें. ये हमारे प्रभु का जन्मस्थान है. और कहीं मस्जिद बना लें. मगर उसका नाम बाबरी न रखें. बाबर आक्रांता था, उसका नाम क्यों स्थापित करना चाहते हैं वे लोग. ये नहीं हो पाएगा. तो फिर क्या नाम रखें. संत के मुताबिक नाम हो मैत्री भाव मस्जिद.

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मैंने संत रामदास को बताया कि लल्लनटॉप के हमारे साथी मुबारक भी यही कहते हैं. कि देश के मुस्लिम बड़ा दिल दिखाएं. राम मंदिर से आपत्ति हटा लें. कट्टरपंथियों का मुंह बंद हो जाएगा. ये सुन संत बोले, अरे तब तो मुबारक को नोबेल प्राइज मिलना चाहिए.  मगर इन मीठी बातों के बीच एक मसला और है. जिसकी पूंछ हनुमान जी सरीखी है. और ये है वो नारा. अयोध्या तो झांकी है. काशी मथुरा बाकी है. यहां के बाद वहां की बारी न शुरू हो जाए. इस पर संत रामदास ने कहा. देखिए. एक फर्क है यहां में और वहां में. वहां प्रभु की पूजा होती है. मंदिर बना है. अयोध्या में तो रामलला तिरपाल में ढंके बैठे हैं. इसलिए संसद को चाहिए कि सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर विधेयक बनाए और मंदिर बनवाए.

अयोध्या में एक हवा ऐसी भी है. कि 2018 तक कुछ होगा. मंदिर के सिलसिले में. क्योंकि 2019 में चुनाव हैं. एक कारोबारी ने बताया. कुछ तो प्लान है क्योंकि गुजरात के कई कारोबारी यहां जमीन तलाश करने लगे हैं. गुजरात के अमित शाह भी हैं. बीजेपी अध्यक्ष. जिनकी रैली होनी है जिले में. जिला फैजाबाद. अवध का केंद्र. जो नवाब की अपनी अम्मी से लड़ाई न होती तो वो लखनऊ न जाते. नवाब गए लखनऊ. फिर एक और औरत गई. फैजाबादी अख्तरी. दरबार में गाती थीं. फिर एक नवाब से बियाह हो गया. लखनऊ चली गईं. गाना छूट गया. दिल बैठने लगा. नवाब को समझ आया तो उनके स्वर को आजाद किया. स्वर गूंजे तो नाम सामने आया. बेगम अख्तर. उनकी आवाज में वो नज्म सुनी है आपने.

हमरी अटरिया पे आ जा रे संवरिया

देखा देखी तनिक हुई जाए

वोटर भी देख रहा है. हमने भी कुछ देर देखा. बाकी जो दिखेगा वो 11 मार्च को दिखेगा.



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