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कांग्रेस को मिला बाहुबली की बेटी का साथ, छूटा आम आदमी का हाथ

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लखनऊ से 14209 इंटरसिटी एक्सप्रेस में इलाहाबाद के लिए बैठो तो ठीक बीच में एक स्टेशन पड़ता है. रायबरेली. सोनिया गांधी का ‘संसदीय इलाका’. यहां बोलने का लहजा अवधी है लेकिन मिजाज पर कतई लखनऊ का असर नहीं है. अकड़ से भरा हुआ, भदेसपन से लबरेज जिला. अपने कस्बाईपन से बाहर आने की कोशिश करता हुआ जिला.

यूपी के नक़्शे में रायबरेली पर नज़र इसलिए ठहरती है क्योंकि इसका नाम कांग्रेस परिवार की ‘खानदानी लोकसभा सीट’ से मशहूर रहा है. 1951 में फिरोज गांधी यहां से जीते. कांग्रेस के ही राजेन्द्र प्रताप सिंह और बैज नाथ कुरील के बाद 1967 से इंदिरा गांधी की सीट हुई.

1977 में इमरजेंसी के विरोध में रायबरेली वालों ने इंदिरा की जगह जनता पार्टी के राजनारायण को चुना था. ये बड़ी बात थी. लेकिन 1980 में इंदिरा फिर लौट आईं. कांग्रेस की तरफ से अरुण नेहरु, शीला कौल के बाद 1996 से 98 के बीच बीजेपी का यहां कब्जा रहा. अशोक सिंह बीजेपी की तरफ से सांसद थे. लेकिन उसके बाद फिर से ये जिला कांग्रेस का गढ़ बन गया. 1999 में कांग्रेस के सतीश शर्मा सांसद चुने गए. 2004 से सोनिया गांधी यहां से लगातार सांसद हैं.

रायबरेली सदर विधानसभा सीट का हाल

रायबरेली में बछरावां, हरचंदपुर, रायबरेली सदर, सरेनी, ऊंचाहार और सलोन विधानसभा सीटें हैं. लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा में रायबरेली सदर की सीट रहती है.

कांग्रेस का गढ़ होने के बावजूद रायबरेली सदर की सीट कांग्रेस के ‘हाथ’ में लम्बे समय से नहीं रही. इसकी वजह रहे इलाके में ‘बिधायक जी’ के नाम से मशहूर अखिलेश सिंह. बाहुबली अखिलेश सिंह. क्रिमिनल बैकग्राउंड होने के बावजूद यहां की जमीन पर पकड़ रखते हैं. लखनऊ में कम रायबरेली में ज्यादा दिखाई देते हैं. इलाके के लोगों से इस बारे में बात करो तो बोलते हैं ”कुछु कहि ल्यो, बिधायक जी मा दम तो है.” दागी नेताओं के लिए लोगों की अपनी अलग सायकोलॉजी होती है. इसका अच्छे से अध्ययन किया जाना चाहिए. किताबों से नहीं, जमीन से.

अखिलेश सिंह
अखिलेश सिंह

लेकिन इस बार समीकरण कांग्रेस के पक्ष में दिख रहे हैं और इसकी वजह भी अखिलेश सिंह हैं. इस बार अखिलेश सिंह की बेटी अदिति सिंह कांग्रेस के टिकट पर यहां से चुनाव लड़ रही हैं. अदिति ने प्रियंका गांधी से मिलने के बाद कांग्रेस जॉइन की थी. इलाके में चर्चा है कि ‘बिधायक जी’ अब बीमार चल रहे हैं और बूढ़े हो चले हैं इसलिए अपनी बिटिया के सहारे चुनावी मैदान में उतरे हैं.

अदिति सिंह
अदिति सिंह

पैराशूट से उतरी हैं अदिति सिंह 

अदिति सिंह अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी से मैनेजमेंट की पढ़ाई करके लौटी हैं. 28 साल की हैं. टोयोटा फॉर्चुनर से इलाके में घूम रही हैं. लोगों से मिलकर उनसे वोट मांग रही हैं. राजनीति की भाषा में ऐसे नेताओं को ‘पैराशूट नेता’ कहा जाता है. इन्हें वोट अपने परिवार के बड़े नेता के नाम पर ही मिलता है.

चुनाव प्रचार के दौरान अदिति सिंह
चुनाव प्रचार के दौरान अदिति सिंह

अदिति का शुरू से रायबरेली से कोई जुड़ाव नहीं रहा है. बोर्डिंग स्कूल में पढ़ी हैं. बारहवीं की पढ़ाई दिल्ली से की है. इसके बाद अमेरिका निकल गईं. तीन साल पहले रायबरेली लौटी हैं. कहा जा रहा है कि इन्हें वोट अखिलेश सिंह के नाम पर ही मिलेंगे. इन्हें कोई नहीं जानता. चुनाव प्रचार के लिए अदिति सोशल मीडिया पर भी काफी एक्टिव हैं. बताती हैं कि वो प्रियंका गांधी से काफी प्रभावित हैं.

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ये पूछने पर कि वो एक बाहुबली की बेटी हैं, कैसा लगता है. इस पर अदिति का कहना है कि अब मुझे इसकी आदत हो गई है. उनका कहना है कि विधायक जी की छवि भले खतरनाक हो लेकिन घर पर वो एक आम पिता की ही तरह हैं. बच्चों से बहुत प्यार करते हैं और पढ़ाई लिखाई पर ध्यान देते हैं.

अदिति सिंह के फेसबुक पेज से
अदिति सिंह के फेसबुक पेज से

अखिलेश सिंह का बैकग्राउंड

अखिलेश सिंह यहां पांच बार से लगातार विधायक हैं. कई बार निर्दलीय चुने गए और 2012 के चुनावों से पहले पीस पार्टी जॉइन की. अखिलेश सिंह कांग्रेस से पहले भी जुड़े थे, लेकिन पिछले तेरह सालों से कांग्रेस से बाहर ही रहे हैं. पुलिस रिपोर्ट के मुताबिक अखिलेश सिंह क्रिमिनल बैकग्राउंड रखते हैं. हत्या, किडनैपिंग जैसे तमाम आरोप उन पर हैं.

1988 के मशहूर सैयद मोदी हत्याकांड में भी उनका नाम आया था. सैयद मोदी 8 बार के नेशनल बैडमिंटन चैंपियन थे. केडी सिंह बाबू स्टेडियम से प्रैक्टिस करके लौटते समय उनकी हत्या कर दी गई थी. हत्याकाण्ड में अखिलेश सिंह के अलावा अमेठी राजघराने के संजय सिंह और सैयद मोदी की पत्नी अमिता मोदी पर भी मुकदमा दर्ज हुआ था. 1990 में संजय सिंह, अमिता को बरी कर दिया गया और 1996 में अखिलेश सिंह भी बरी हो गए.

सैयद मोदी
सैयद मोदी

अखिलेश सिंह ने जेल में रहते हुए भी चुनाव जीता है. एक वक्त अखिलेश का खौफ ऐसा हुआ करता था कि लोग उनके डर से कांग्रेस की सभाओं में नहीं जाते थे. कांग्रेस के पोस्टर नहीं लग पाते थे. 2007 और 2012 के चुनावों में राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की सभाओं से ज्यादा भीड़ अखिलेश की सभाओं में होती थी. अखिलेश सिंह उसी दिन सभा करते थे जिस दिन राहुल या प्रियंका की सभा होती थी. ये सभा उनसे कुछ किलोमीटर दूर ही होती थी. कांग्रेस वालों ने अखिलेश सिंह पर कई सारे मुक़दमे भी दर्ज करवाए थे. अखिलेश कांग्रेस को पानी पी-पीकर गरियाते थे लेकिन आज उसके साथ हैं. यही पॉलिटिक्स है.

अखिलेश सिंह
अखिलेश सिंह

अखिलेश के कांग्रेस में आने की एक और वजह है

अखिलेश के कांग्रेस में लौटने की एक और वजह भी मानी जा रही है. उन्हें कांग्रेस के एमएलसी दिनेश प्रताप सिंह से चुनौती मिलने लगी थी. अब तक जिला पंचायत पर अखिलेश के लोगों का दबदबा रहता था लेकिन अब दिनेश प्रताप के भाई अवधेश प्रताप सिंह जिला पंचायत अध्यक्ष हैं. इससे पहले उनकी पत्नी सुमन सिंह इस पद थीं. माना जा रहा था सत्ता का केंद्र विधायक निवास से खिसककर एमएलसी निवास की तरफ जा रहा है. इसकी वजह से अखिलेश का एकछत्र राज कम होना शुरू हो गया था. आंकड़े भी कुछ ऐसा ही कहते हैं. 2002 में अखिलेश सिंह ने 95,837 वोटों से चुनाव जीता था. 2007 में ये अंतर कम होकर 46,711 हो गया और 2012 के चुनावों में घटकर 29,494 रह गया. इसलिए अखिलेश सिंह ने बेटी के बहाने कांग्रेस के साथ जाने में भलाई समझी. वो सत्ता का केंद्र अपने पास ही रखना चाहते हैं.

दिनेश प्रताप सिंह
दिनेश प्रताप सिंह

अदिति अपने पिता को ‘विधायक जी’ ही बोलती हैं. चुनाव प्रचार में पिता का जिक्र करती हैं. ये पूछने पर कि क्या जीतने पर वो अपने पिता की छवि सुधारने की कोशिश करेंगी. इस पर उनका कहना है कि विधायक जी ने हमेशा गरीबों के लिए काम किया है. मैं भी ऐसा ही करूंगी.

अदिति सिंह
अदिति सिंह गांव के दौरे में

कांग्रेस के साथ आने से अखिलेश का पर्सनल वोट बैंक कांग्रेस के नाम होगा. कांग्रेस अपने ‘किले’ की विधानसभा सीट में फिर से वापसी कर सकती है. अदिति का कहना है वो सिर्फ चुनावों पर ध्यान दे रही हैं. लोगों की समस्याएं सुन रही हैं. उनका दावा है कि वो इन समस्याओं को हल करेंगी. रायबरेली सदर से बीएसपी ने शहबाज खान और बीजेपी ने अनीता श्रीवास्तव को उतारा है.


ये स्टोरी निशांत ने की है.


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