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इस वजह से गे पुरुष औरतों को बेहतर दोस्त पाते हैं

पॉप स्टार लेडी गागा ने कहा है कि उनको उनकी पहचान दिलाने में सबसे ज़्यादा मदद उनके गे दोस्तों ने की है. उन्होंने गे कम्युनिटी का शुक्रिया अदा किया कि वो हमेशा से उनका प्रेरणास्त्रोत बनी रही. लेडी गागा हमेशा से LGBTQ राइट्स की मुखर सपोर्टर रही है. गे राइट्स पर बोलती रही हैं.

उन्होंने कहा, “मैं हमेशा से असाधारण, प्रतिभाशाली गे मर्दों से घिरी रही जिनकी वजह से मेरी ज़िंदगी में बहुत से बदलाव आए. फेमस होना बेहद अजीब था और इन लोगों ने मेरी बहुत मदद की.” उनकी इस बात के बहुत गहरे निहितार्थ हैं. ये एक सरसरा बयान नहीं बल्कि दो सदा से तिरस्कृत तबकों की आपसी हमदर्दी और दोस्ती का प्रमाणपत्र है.

मेरी एक दोस्त है जो मज़ाक में एक बात कहा करती है. ‘औरतें तो दलित होती हैं.’ उसके कहने का मतलब है कि भले ही समाज में वर्णव्यवस्था के हिसाब से सवर्ण/दलित का विभाजन हो, औरतों का शुमार बाई डिफ़ॉल्ट दलितों में होता है. यानी उन्हें समग्रता में निचले पायदान पर मौजूद इकाई मान लिया गया है. समाज चाहे जैसा हो, दकियानूसी सोच वाला या प्रगतीशील. देसी हो या विदेसी. औरतों को हमेशा से, हर जगह दोयम दर्जा ही मिलता आया है. और इससे बुरा हाल है गे कम्युनिटी का. उन्हें तो कई दफा इंसान मानने से ही इंकार किया जाता है. एक अजीब सी घृणा का दंश झेलती ये बिरादरी औरतों को ज़हनी तौर पर अपने करीब पाती है, तो इसमें कोई हैरानी नहीं है.

कुछ ऐसा ही मामला दूसरी तरफ है. जो सुरक्षा का भाव गे कम्युनिटी औरतों के मन में जगा पाती है वो मर्द बिरादरी ना कभी कर पाई है, ना कर पाएगी. एक तरह की सहजता मयस्सर होती है औरतों को, जो कि दुर्लभ चीज़ है. पहली बात तो ये कि महिलाओं को हैरेसमेंट का कोई ख़तरा नहीं महसूस होता. ये इत्मीनान रहता है कि रात-बिरात अकेले साथ होने पर भी भंभोड़ नहीं लिया जाएगा. ये इत्मीनान ही उस आपसी लगाव का बेस बनता है, जो इन दो तबकों में एक-दूसरे के प्रति पाया जाता है.

हमेशा से तिरस्कार का दंश झेलती, उपहास का पात्र बनती गे कम्युनिटी से जितना मानवीय व्यवहार औरतें करती हैं, उतना पुरुष बिरादरी कभी नहीं कर पाती. दुनिया भर का तो मालूम नहीं, पर कम से कम अपने दोस्तों में मैंने ऐसा जरूर पाया है. ये एक प्रमुख वजह है कि एक महिला और एक होमोसेक्शुअल ज़्यादा करीबी दोस्त हो सकते हैं, बनिस्पत एक पुरुष और गे व्यक्ति के. पुरुष बिरादरी का रवैया विद्वेष भरा और कई बार तो क्रूरता की हद तक घृणित रहा है गे कम्युनिटी के लिए. ऐसे में उनका महिलाओं की तरफ झुकाव होना लाज़मी है.

मगर इस प्रेम का कारण बस इतना ही नहीं है. हमारे समाज ने औरतों और पुरुषों को हमेशा एक दूसरे के दूर किया है. यहां अर्थ स्ट्रेट औरतों और स्ट्रेट पुरुषों से है. उनके कपड़े, उनकी चॉइस, उन्हें बड़ा करने का ढंग, सब अलग अलग. उन्हें खिलौने भी अलग मिले. ऐसे में गे पपुरुषों का औरतों के करीब होना स्वाभाविक हो जाता है क्योंकि गे पुरुष समाज के बनाए हुए ‘पौरुष’ की परिभाषा को नहीं मानता. और चूंकि वो इस परिभाषा को नहीं मानता, वो स्ट्रेट पुरुषों के मुकाबले ज्यादा संवेदनशील और नर्म होता है. ठीक औरतों की तरह.

कहने को हम ये भी कह सकते हैं कि ये गे पुरुषों को स्टीरियोटाइप करना है. जैसे औरतों के बारे में ये कहना कि वो जलनखोर हैं. मगर जिस बात को मैं यहां कहना चाह रहा हूं वो ये है कि समाज ने औरतों और पुरुषों को एक दूसरे से इतना भिन्न होना सिखा दिया है, कि उनमें महज स्वस्थ दोस्ती होगी, ये लोग खुद ही नहीं मान पाते. लड़की किसी स्ट्रेट पुरुष को गले लगाती है तो साइड से. क्योंकि उसे लगता है लड़का ‘हिंट’ ले लेगा. मगर किसी गे पुरुष के साथ उसे इस तरह की किसी असुरक्षा का भाव नहीं आता.

हम ये नहीं कह रहें कि तमाम गे लोग भले ही होंगे. उनमें भी वो बुराइयां होने की पूरी-पूरी संभावना है, जो एक सामान्य मनुष्य में होती है. कई केसेस ऐसे भी देखे गए हैं जहां गे पुरुषों ने शादी की और पत्नी से बहुत बुरा बर्ताव किया. अपनी महरूमी का तमाम फ्रस्ट्रेशन उसपे उतारा. लेकिन ये व्यक्तिगत खामियां हैं जो किसी में भी हो सकती हैं.

महिलाओं और गे कम्युनिटी में करीबियत की वजह चाहे जो हो, ये यकीनन इस बात का सबूत है कि दो दमित तबकों में आपसी जुड़ाव होने की संभावना बहुत ज़्यादा होती है.


दिल्ली में हुई LGBTQ परेड़ का वीडियो:


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