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एक जीनियस आर्टिस्ट या बदबूदार फ्रॉड: 'मनी हाइस्ट मास्क' वाले सल्वादोर दाली की कहानी

लाल कपड़ों में कुछ लोग स्पेन की रॉयल मिंट लूटने के लिए घुस आए हैं. शहरों के नाम वाले लोग. बर्लिन, तोक्यो, डेनवेर, मॉस्को, हेलसिंकी, ओस्लो, रियो और नैरोबी. एक मास्टरप्लान के साथ, जिसके पीछे प्रफेसर का दिमाग है. ये वो लोग हैं, जिन्हें समाज में ‘लूज़र्स’ कहा जाता है, लेकिन उन्हें लगता है कि वो ‘रेजिस्ट’ कर रहे हैं. उस व्यवस्था के ख़िलाफ़, जहां ‘सांस्थानिक चोरी, चोरी ना भवति.’ वे अपनी नज़र में रॉबिनहुड हैं, बहुतों की नज़र में हीरो, मगर स्टेट की नज़र में अपराधी. उनके नाम अलग-अलग हैं मगर वे एक हैं. क्योंकि उन सबने एक जैसा मास्क पहन रखा है. किसका मास्क है ये. जिसमें भौंहें तरेरती एक शक्ल पर बड़ी-सी मूंछे हैं, जो आंखों की तरफ जाती दिखती हैं. ये सवाल उन्होंने भी पूछा. देखें.

चोरी के लिए जाते समय डेनवेर मास्क के बारे में पूछता है, ”ये मूंछ वाला आदमी कौन है?”

उसका बाप मॉस्को जवाब देता है, ”दाली. एक स्पेनिश पेंटर.”

डेनवेर कहता है, ”पेंटर? जो पेंट करता है?”

मॉस्को अपनी सीमित जानकारी में झेंपते हुए सिर हिलाता है और कहता है, ”हां.”

ये सीन है आजकल बहुच चर्चित हो रही सीरीज ‘मनी हाइस्ट’ का. इसमें ज़िक्र है दाली का. लेकिन वो सिर्फ पेंट नहीं करता था.

Money Heist का चौथा सीज़न अप्रैल की शुरुआत में नेटफ्लिक्स पर आया. स्पेनिश में इस शो का नाम La casa de papel है.
Money Heist का चौथा सीज़न अप्रैल की शुरुआत में नेटफ्लिक्स पर आया. स्पेनिश में इस शो का नाम La casa de papel है. फोटो: ट्विटर

– एक महान कवि उसके प्यार में पागल था. लेकिन दाली इस पुरुष प्रेमी में इच्छुक नहीं था. नतीजा, एक अमर अधूरी कविता. अचानक कत्ल से पहले.

– वो पेंटिंग बनाता था तो गैलरी वाले परेशान हो जाते थे. क्योंकि पेंटिंग इतनी बोल्ड और बेचैन करने वाली होती कि दर्शकों के लिए सही नहीं मानी जाती.

– पाब्लो पिकासो उसे जीनियस मानते थे. मगर फिर कुछ ऐसा हुआ कि उन्हें और कइयों को दाली के नाम से नफरत हो गई.

– वो इश्क़ करता था. औरतों से, मगर अपने ढंग से. क्योंकि दुनिया के ढंग से उसे घिन थी, बचपन में देखी एक किताब के चलते.

– और एक शादीशुदा औरत से हुए ऐसे ही एक इश्क ने उसके बाप को गुस्से से भर दिया. बाप ने घर से, जायदाद से निकाल दिया, पेंटिंग तक जब्त कर लीं.

– फिर वो मछुआरों की बस्ती में रहा. अमीर बना. जंग से बचा, दोस्त मरा तो शाबाश कहकर चीखा, लेकिन फिर पूरी ज़िंदगी उसे पेंटिंग में उकेरता रहा.

– और जो औरत सब कुछ थी, उसने हरकतों से तंग आकर एक किले में शरण ली, जिसे दाली ने उसके लिए खरीदा था. मगर जहां ख़ुद दाली नहीं जा सकता था.

-फिर वो मर गया. मरने से पहले वो मर गई. इन दोनों के बीच एक आख़िरी मास्टरपीस आया. और आए सवाल. कि कांपते हाथों से ये कैसे मुमकिन है.

-फिर जो वो मर गया. मगर फिर भी सुकून नहीं मिला. क्योंकि मौत के तीन दशक बाद भी उसकी कब्र पर फावड़े चलाए जा रहे थे, एक मुकदमे के चलते.

ये सल्वादोर दाली की कहानी है. सनकी, जीनियस, पागल जैसे शब्दों को अपनी अर्थवत्ता में बेहद कम महसूस करवाता दाली.

सल्वादोर दाली, जिन पर आत्ममुग्ध, बड़बोले और विरोधाभासी होने के आरोप लगे. फोटो: Artsy
सल्वादोर दाली, जिन पर आत्ममुग्ध, बड़बोले और विरोधाभासी होने के आरोप लगे. फोटो: Artsy

लेकिन इस कहानी को बांचना शुरू करें उसके पहले आप कुछ पारिभाषिक शब्द समझ लें.

1. डाडा

‘उड़ता पंजाब’ का वो गाना सुना है आपने.

डर डाडा डस्से

और मंज़िल हस्से.

इसमें ‘डाडा’ का मतलब है बहुत ज़्यादा इंटेंस. लेकिन यही शब्द जब फ्रेंच भाषा में जन्मता है तो एक नया अर्थ लेता है. फ्रेंच में डाडा मतलब हॉबी हॉर्स. लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा. इसी को कहते हैं डाडा. ये एक आंदोलन का नाम था. कला के क्षेत्र का. यूरोप में जन्मा. पहले वर्ल्ड वॉर के बाद. तब तक रूस में क्रांति हो चुकी थी. कलाकार कम्युनिज्म के मुरीद हो रहे थे. ऐसे में अवां गार्द कलाकारों ने सुंदरता के तय मानकों की धज्जियां उड़ानी शुरू कीं. उन्हें लगा कि पैसों को ही सब कुछ मानने वाली सोसायटी के तर्क बेदम हैं. ये सोसाइटी हर चीज़ में लॉजिक खोजती है. मगर इसके परे भी कुछ है. जिसे लोग नॉनसेंस कहें, इर्रेशनल कहें, मगर वो है. और वही है. और ये राष्ट्रवाद की उग्रता और हिंसा को ख़ारिज करता है.

1920 में इंटरनेशनल डाडा फेयर में लगी डाडा मूवमेंट की प्रदर्शनी. फोटो: विकीमीडिया
1920 में इंटरनेशनल डाडा फेयर में लगी डाडा मूवमेंट की प्रदर्शनी. फोटो: विकीमीडिया

लेकिन इस विचार का काठी के घोड़े से क्या रिश्ता. एक किंवदंती चलती है. कि जर्मनी के अवां गार्द आर्टिस्ट रिचर्ड ह्यूलसेनबेक ने काग़ज़ काटने वाली चाकू उठाई और सामने रखी डिक्शनरी का एक पन्ना खोला और घोंप दी. जो शब्द नोंक के नीचे आया वो डाडा था. तो नाम पड़ गया. इतना रैंडम क्यों, इसका क्या लॉजिक हुआ. दरअसल ये पूरा आंदोलन ही कथित लॉजिक के ख़िलाफ़ था.

हालांकि कई लोग ये भी कहते हैं कि ये आर्ट आंदोलन बच्चे की तरह निष्कलुष था. बच्चा जिसके शुरुआती स्वर होते हैं डाडा. बहरहाल. आंदोलन आया. सब कथित बिगड़ैल आर्टिस्ट इससे जुड़े. फिर कलाकारों ने इसको अगली स्टेज में पहुंचाया. ये स्टेज कहलाई सरियलिज्म.

2. सरियलिज्म

रियल से बना. मगर उससे ज़्यादा. इस शब्द के अंग्रेजी माने क्या हैं. कुछ ऐसा जो असली से ज़्यादा हो. जिसमें अवचेतन की झलक हो. अतियथार्थवाद. ऐसे समझ न आए शायद. एक उदाहरण से समझते हैं. संजय लीला भंसाली की फिल्म. सांवरिया. एक सरियल वर्ल्ड में स्थापित है. सब कुछ नीला. सुंदर. कलात्मक. मगर सेट पैटर्न से अलग. रेगुलर चीजें लेकिन उलट-पलट तर्क के साथ. जिन्हें देख कुछ अजीब लगे. कुछ बेचैनी लगे. ये मनुष्य के भीतर के ऊट-पटांग का सेलिब्रेशन है. दाली की कलाकारी में ये बार-बार आएगा. इसलिए दिमाग में पैठने दें इसे.

सर्रियलिज्म आंदोलन के कलाकारों का एक ग्रुप, जिसमें डाली आगे बीच में दिख रहे हैं. फोटो: Widewalls
सर्रियलिज्म आंदोलन के कलाकारों का एक ग्रुप, जिसमें दाली आगे बीच में दिख रहे हैं. फोटो: Widewalls

1.

1936 का साल था. लंदन के एक म्यूज़ियम में सरियलिज्म पर बहुत बड़ा फेस्टिवल हो रहा था. इसमें सल्वादोर दाली को भी लेक्चर देने के लिए बुलाया गया. लेकिन सुर्खियां उनके बोले से ज़्यादा पहनावे ने बनाईं. दाली वहां समंदर के गोताखोरों वाले कपड़े पहनकर गए. डीप सी डाइविंग सूट. सिर पर हेलमेट. और उस हेलमेट में छेद ताकि सांस लेते रहें. दाली के एक हाथ में बिलयर्ड्स क्यू (गेम खेलने वाली छड़ी) थी. और दूसरे हाथ में लगाम, वुल्फहाउंड्स नस्ल के कुत्तों की.

उनसे पूछा गया. ये सब क्या है. दाली का जवाब था,

मैं इंसानों के समंदर में गहरे डूब रहा हूं.

दाली का यूं डूबना उनका ट्रेडमार्क था. कभी प्रदर्शनी के लिए एक महंगी खुली कार में पत्ता गोभी भरकर पहुंचना. कभी अपने घर में संभोग का प्रदर्शन आयोजित करना. जैसी कला, वैसा जीवन. और इसकी शुरुआत कहां से हुई. वहीं जहां अंत हुआ. स्पेन का फिगेरस कस्बा.

11 मई, 1904 को दाली पैदा हुए. अपने भाई की मौत के ठीक 9 महीने बाद. उनको वही नाम दिया गया, जो भाई का था. सल्वादोर. दाली ने बाद के जीवन में इस चीज पर टिप्पणी करते हुए कहा,

हम पानी की दो बूंदों की तरह थे. एक से. बस हममें नजर आने वाले अक्स अलग थे. वो शायद मेरा पहला संस्करण था. उसमें सब कुछ बहुत ज्यादा था.

दाली ने अपने इस संस्करण को बाद के दशक में ‘पोट्रेट ऑफ माय डेड ब्रदर’ नाम की पेंटिंग बनाकर याद किया.

दाली की पेंटिंग पोर्ट्रेट ऑफ अ ब्रदर जो उनके भाई को एक ट्रिब्यूट थी. फोटो: Wikiart.org
दाली की पेंटिंग ‘पोर्ट्रेट ऑफ माय डेड ब्रदर’ जो उनके भाई को एक ट्रिब्यूट थी. फोटो: Wikiart.org

दाली के बाप का नाम था रफायल . एक सख्त और नास्तिक तबीयत के वकील. जो अपनी औलादों के कील-कांटे दुरुस्त रखना चाहते थे. मगर दाली की मां दयालु थीं. मां का दयालु होना लगभग उतना ही ज़रूरी और फिर भी कहने में घिसा हुआ वाक्य है, जैसे ऑक्सीजन की हमारे इर्द गिर्द मौजूदगी.

दाली की मां ज़्यादा दिन मौजूद नहीं रहीं. 16 बरस के थे दाली, जब वो चल बसीं. फिर बाप ने दाली की मौसी से ब्याह कर लिया. दाली खुश थे. मौसी पसंद थीं उन्हें. मगर मां की याद आती थी और बाप से चिढ़ आती थी. इसका अंजाम क्या हुआ. आगे बताएंगे. फिलहाल दाली के कैलेंडर में साल बदलते हैं.

1910 में दाली का परिवार. फोटो: विकीमीडिया
1910 में दाली का परिवार. पीछे चट्टान पर दाहिनी तरफ बैठीं दाली की मौसी हैं, जिनसे बाद में उनके पिता ने शादी की. फोटो: विकीमीडिया

वो घर से निकले. मड्रिड पहुंचे. आर्ट्स पढ़ने. डिग्री नहीं ले पाए लेकिन. कभी स्टूडेंट प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने के चलते. कभी अपनी जिद में एग्जाम में बैठने से इनकार के चलते. इन सबके बीच कला के अलग अलग प्रयोग भी चल रहे थे. डाडाइिज्म. क्यूबिज्म. फ्यूचरिज्म. सरियलिज्म.

1922 में बनी दाली की पेंटिंग कैबरे सीन, जो क्यूबिज़्म का एक नमूना है. फोटो: Wikiart.org
1922 में बनी दाली की पेंटिंग कैबरे सीन, जो क्यूबिज़्म का एक नमूना है. फोटो: Wikiart.org

आवारागर्दी के इस दौर में उनकी दोस्ती हुई लोर्का से. फेदरिको गार्सिया लोर्का. कवि. प्रेमी. दोनों की अंतरंगता के रंग कई प्रिज़्मों से गुजारे गए. सब अलग हो गए.

लोर्का (दाएं) के साथ दाली. फोटो: विकीमीडिया
लोर्का (दाएं) के साथ दाली. फोटो: विकीमीडिया

उसकी यौन क्रीड़ा वाली पहलों में मेरी दिलचस्पी नहीं थी. ये कहकर दाली अलग हो गया. लोर्का से.

उनकी राजनीति क्या है. कला को इससे मुक्त रहना चाहिए. ये कहकर दाली अलग हो गया. आंदोलन से.

और अलग होने के क्रम में दाली के भीतर खीझ भरती गई. वह सार्वजनिक रूप से आंदोलन के साथियों को लताड़ने लगा. उनका एक बयान बहुत चर्चित हुआ.

The difference between the Surrealists and me is that I am a Surrealist

इसी दौर में उनकी बनाई एक पेंटिंग भी चर्चित हुई. ‘द मेटामॉर्फसिस ऑफ नारसिसस’ (आत्ममोह वाला)

दाली की चर्चित पेंटिंग द मेटामॉर्फसिस ऑफ नारसिसस. फोटो: विकीमीडिया
दाली की चर्चित पेंटिंग द मेटामॉर्फसिस ऑफ नारसिसस. फोटो: विकीमीडिया

आलोचकों ने कहा. दाली आत्ममोह से भर गया है. अब वो प्रगतिशील नहीं रहा. डरपोक है. हिटलर का उपासक है. फासिस्ट है. फ्रैंको का सपोर्टर है.

हिटलर तो ठीक है. मगर ये फ्रैंको कौन. जनरल फ्रैंको. दाली के मादरे वतन स्पेन में 20वीं सदी के चौथे दशक में सिविल वॉर हुआ. उसमें फ्रैंको एक धडे़ का अगुवा था. कम्युनिस्ट यानी दाली के साथी दूसरे धड़े को सपोर्ट कर रहे थे. मगर दाली चुप रहा. उसकी चुप्पी को फ्रैंको का साथ माना गया. फ्रैंको जंग जीत गया. हिटलर के शासन वाले जर्मनी की मदद से. फ्रैंको ने कई विरोधियों को मार दिया. इनमें से एक था. लोर्का.

स्पेन का तानाशाह फ्रांसिस फ्रैंको, जिसने 1939 से 1975 तक राज किया. फोटो: विकीमीडिया
स्पेन का तानाशाह फ्रांसिस फ्रैंको, जिसने 1939 से 1975 तक राज किया. फोटो: विकीमीडिया

दाली परदेस में था, जब लोर्का की ख़बर उसे मिली. और उसका पहला रिएक्शन था. ओले. स्पेनिश भाषा का शब्द. मोटा माटी हिंदी अनुवाद. ‘बहुत बढ़िया’.

क्या था ये. ट्रैजडी पर ज़ाहिर की गई बेबस हंसी. रैंडमनेस. इश्क की किरमिच. नहीं पता. बस इतना पता है कि दाली ने जब तक ब्रश घुमाया. कहीं न कहीं लोर्का का रेफरेंस आलोचक खोजते रहे. लेकिन एक चीज खोजने की ज़रूरत नहीं पड़ी. लोर्का की एक आख़िरी कविता. अधूरी कविता. एक पुरुष प्रेमी के लिए. आइए, अधूरी कविता का अधूरा टुकड़ा पढ़ा जाए.

अनसोये प्रेम की रात

हम दोनों के लिए यह रात,

उन्माद की रात थी

और पूर्णिमा का पूरा चंद्रमा था

मैंने रोना शुरू कर दिया

तुम हंस रहे थे

तुम्हारा तिरस्कार एक ईश्वर था

और मेरा विलाप कुछ पल थे,

ज़ंजीरों से बंधे कपोत थे

(साहित्य की वेबसाइट सदानीरा से. अनुवाद- आग्नेय)

2.

लोर्का ने दाली से प्यार किया. दाली ने लोर्का से नहीं किया. तो क्या किसी से नहीं किया. ये जानने के लिए हमें एक किताब और एक शाम में जाना होगा.

दाली तब छोटा था. बहुत छोटा. खाली स्लेट जितना जितना छोटा. उसने एक किताब देखी. ये यौन रोगों के बारे में थी. तस्वीरों से भरी किताब. इसमें स्त्री के यौनांगों से होने वाली बीमारियों का वीभत्स वर्णन था. दाली के अंदर डर भर गया. संभोग के परंपरागत तरीकों के प्रति. जो उसके किशोर और जवान होने पर भी कायम रहा. फिर उसने फ्रॉइड के काम को पढ़ लिया. काम की धारणा और भी बदल गई. उन दिनों उसने एक पेटिंग बनाई.

साइकोएनालिसिस के क्षेत्र में सिगमंड फ्राएड बहुत बड़ा नाम हैं. फोटो: विकीमीडिया
सायकोएनालिसिस के क्षेत्र में सिगमंड फ्रॉइड बहुत बड़ा नाम हैं. फोटो: विकीमीडिया

मड्रिड की महफिलों में इसकी चर्चा होने लगी. एक रोज़ दाली की टोली का एक मेंबर, एक कवि पॉल इलुआर्द इसे देखने आया. अपनी बीवी गाला के साथ. पॉल पेटिंग देख रहा था. चार थीम उभरकर सामने आ रही थीं. सेक्स, रिजेक्शन, डिजेक्शन, सिडक्शन. दाली गाला को देख रहा था. चार थीम भीतर धंसकर सामने से गुम हुई जा रही थीं.

ये दोतरफा इश्क की शुरुआत थी. और इसका शीर्षक अनजाने ही पॉल ने दे दिया था. कैसे.

पॉल ने पेटिंग देखीं. दाली से पूछा, इसका नाम क्या है. दाली ने सर हिला दिया. पॉल का कवि जाग गया. उसने नाम दिया. द लुगुब्रियस गेम. हिंदी में अर्थ. शोक से भरा एक खेल.

द लिगुब्रियस गेम. फोटो: Wikiart.org
द लिगुब्रियस गेम. फोटो: Wikiart.org

गाला दाली की म्यूज़ बन गई. म्यूज़ का सही सही हिंदी अनुवाद नहीं है. ये कई चीजों की मिलावट है. प्रेरणा, वासना, प्रेम. गाला और दाली के किस्सों के चर्चे होने लगे. और इन्हें एक मुकाम मिला अख़बार में छपी एक टिप्पणी से.

गाला से मिलने के बाद दाली क्रिश्चियन मिथकों में दिलचस्पी लेने लगे थे. ऐसे में उन्होंने एक पेंटिंग बनाई. सेक्रेड हार्ट ऑफ जीज़स क्राइस्ट. पेटिंग के बारे में लिखते हुए दाली ने कहा,

”मेरे लिए ये सब मजे की बात है. ये किसी भी चीज में मिल सकता है. मसलन, मैं कभी-कभी मजे के लिए अपनी मां की तस्वीर पर थूकता हूं.”

1962 की दाली की पेंटिंग द सैक्रेड हार्ट ऑफ जीसस. फोटो: salvadordali.org
दाली की पेंटिंग द सैक्रेड हार्ट ऑफ जीज़स क्राइस्ट. फोटो: salvadordali.org

दाली के पिता सल्वादोर रफायल ने इसे अख़बार में पढ़ा तो भड़क गए. गाला के साथ रिश्तों ने उन्हें वैसे ही कुरेद रखा था. एक शादीशुदा औरत से बेटे के संबंध उनके सामाजिक स्तर को क्षति पहुंचा रहे थे. फिर ये मां की तस्वीर वाली बात. डॉन ने दाली को धक्के देकर अपने घर और अपनी जायदाद से निकाल दिया.

गाला दाली की पत्नी और म्यूज़ बनीं. फोटो: theparisreview.org
गाला दाली की पत्नी और म्यूज़ बनीं. फोटो: theparisreview.org

दाली एक मछुआरे की खोली में रहने चले गए. गाला के साथ. फिर अपनी कला के दम पर वो खोलियां खरीदते गए. पेंटिंग और बुलंद इमारत दोनों बनाते गए. तब तक, जब तक उनके विला की एक सीमा समंदर के किनारे नहीं पहुंच गई. दाली के पिता ने भी बाद में गाला के साथ रिश्ता कबूल कर लिया.

गाला के साथ आने पर दाली को लगा कि जैसे उनकी सनक को एक सहारा मिल गया. बकौल दाली, सिर्फ गाला ही थी, जिसके साथ मैं सामान्य भी हो सका. फिर चाहे वह जिस्मानी ताल्लुकात की बात हो या फिर दुनिया से ताल्लुकात की. लेकिन ये नया पाया क्रम, ये ऑर्डर भी ध्वस्त होना था. कुछ दशकों बाद. फिलहाल तो तयशुदा कॉस्मिक ऑर्डर ध्वस्त हो रहे थे.

सल्वादोर दाली और गाला. फोटो: theparisreview.org
सल्वादोर दाली और गाला. फोटो: theparisreview.org

सबको लगता था. समय बलवान है. आइंस्टाइन कह रहे थे. समय एक रिलेटिव चीज है (ज़्यादा समझ के लिए थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी पढ़ें) और दाली कूची के जरिए कह रहे थे. समय एक कंस्ट्रक्ट की हुई चीज है. उनके कैनवस पर चीटियां घड़ी खा रही थीं. समय पिघल चुका था. ये दाली की सबसे मशहूर पेंटिंग बनी. 1931 में बनी इस पेंटिंग का टाइटिल था द परसिस्टेंस ऑफ मेमरी.

दाली की सबसे मशहूर पेंटिंग 'द पर्सिस्टेंस ऑफ मेमरी.' फोटो: Wikiart.org
दाली की सबसे मशहूर पेंटिंग ‘द पर्सिस्टेंस ऑफ मेमरी.’ फोटो: Wikiart.org

3.

एंग्जाइटी. ढीला अनुवाद होगा बेचैनी. बहुत तेज़. जिनको ये नहीं है, उनके लिए एक शब्द भर है. जिनको है, उनके लिए एक खौफ़ है. इसके होने और फिर होने के बीच के गैप में वे जीते हैं. कम बेचैनी के साथ. कि फिर बेचैनी झपट लेगी.

दाली की पेंटिंग्स को देखकर भी ऐसा ही लगता था. ‘द न्यूयॉर्कर’ ने उनके लिए दुरुस्त बात बोली थी.

”बर्फ से जमे हुए, रात के बुरे सपनों को ये आदमी जागती हुई आंखों में ठूंस देता है.”

दाली के काम में सामान्य कोमल भावनाओं के लिए जगह नहीं थी. इच्छाएं थीं, जो फ्रॉइड की व्याख्याओं के तने पर लिपटी बेतहाशा बढ़ रही थीं. उन्होंने एक पेटिंग बनाई थी. ‘डायलॉग ऑन द बीच’. इसे देखकर बार्सिलोना म्यूज़ियम वालों के तोते उड़ गए. वह इसे प्रदर्शनी हॉल में रखने को राज़ी नहीं हुए. उन्हें लगा कि सेक्शुअल टोन का ऐसा चित्रण दर्शक सहन नहीं कर पाएंगे.

1928 की दाली की पेंटिंग 'डायलॉग ऑन द बीच' जिसे 'अनसैटिस्फाइड डिज़ायर्स' के नाम से भी जानते हैं. फोटो: Wikiart.org
1928 की दाली की पेंटिंग ‘डायलॉग ऑन द बीच’ जिसे ‘अनसैटिस्फाइड डिज़ायर्स’ के नाम से भी जानते हैं. फोटो: Wikiart.org

कुछ बरस बाद. ठीक-ठीक कहें तो 1938 में. दाली फ्रॉइड से मिले. जो एक 82 साल का बूढ़ा था. दाली ने उनके सिद्धांतों पर पेंटिंग्स बनानी शुरू कीं. फिर फ्रॉइड की पोट्रेट बनाने लगे. एक रोज़ एक कहवाघर में किसी ने फ्रॉइड से इस नए प्रयोग और नए लड़के के बारे में पूछा. फ्रॉइड का जवाब था,

”ये लड़का सनक से भरा है. किसी चरमपंथी की तरह.”

दाली के हाथों बनाया गया सिगमंड फ्रायड का स्केच. फोटो: openculture.com
दाली के हाथों बनाया गया सिगमंड फ्रायड का स्केच. फोटो: openculture.com

कुछ रोज़ बाद दाली को पता चला, तो वो खुश हो गया. एक जीनियस उसे नकार चुका था. पिकासो. क्योंकि दाली जनरल फ्रैंको का पिट्ठू बन गया था. एक जीनियस ने उसे मोहलत दी. क्योंकि फ्रॉइड को देशों वाली पॉलिटिक्स का ज़्यादा लोड नहीं था. मगर तब तक वर्ल्ड वॉर सेकंड भी नहीं था.

ये अगले बरस शुरू हुआ. दाली तब फ्रांस में था. उसने किसी तरह पुर्तगाल की एंबेसी से वीजा हासिल किया. और फिर वो पुर्तगाल से पानी के रास्ते गाला के साथ अमरीका चला गया. यहीं पर दाली ने एक और चर्चित पेंटिंग बनाई- ‘फेस ऑफ वॉर’.

दाली की एक और मशहूर पेंटिंग, 'द फेस ऑफ वॉर' जिसमें उन्होंने युद्ध की व्यर्थता बताई. फोटो: Wikiart.org
दाली की एक और मशहूर पेंटिंग, ‘द फेस ऑफ वॉर’ जिसमें उन्होंने युद्ध की व्यर्थता बताई. फोटो: Wikiart.org

इस समय में दाली का भी एक नया फेस लोगों के सामने आया. जब उन्होंने अपनी ऑटोबायोग्राफी ‘द सीक्रेट लाइफ ऑफ सल्वादोर दाली’ लिखी.

इसमें उनके भीतर के उजबक से पर्दा हटा. मशहूर राइटर जॉर्ज ऑरवैल ने इस किताब की एक चर्चित समीक्षा की. Benefit of clergy के नाम से. इसमें जॉर्ज ने दाली के खुद की क्रूरताओं को उघाड़ने के पीछे की ट्रिक उघाड़ दी. कैसे ये आदमी अपनी सनक, अपनी क्रूरताओं को आर्ट का जामा पहनाकर लोगों त्क बेचता आया है. ऐसा लिखते हुए जॉर्ज ने दाली के खुलासों पर पूरी ईमानदारी से विचार भी किया. जो भी सल्वादोर की आर्ट समझना चाहता हो, उसे जॉर्ज का ये पीस ज़रूर पढ़ना चाहिए. हम आपको इसके दो हिस्सों का अनुवाद पढ़वाते हैं.

1. आत्मकथाओं पर तभी भरोसा करना चाहिए जब वे कोई घृणित बात उजागर करें. कोई व्यक्ति अगर महज़ अपनी उपलब्धियों की नुमाइश कर रहा है तो वो झूठा है. क्योंकि अपने जीवन को अंदर से देखें तो हमें बार-बार हारा हुआ एक व्यक्ति दिखेगा. हालांकि कोई निरी झूठी आत्मकथा (जैसे फ्रैंक हैरिस के आत्मकथ्य) भी लेखक की असलियत दिखा सकते हैं जबकि उसका ऐसा मकसद नहीं होता. दाली की आत्मकथा ऐसी ही है. उसके कुछ हिस्से अविश्वसनीय हैं. तो कुछ बड़े ही सायास तरीके से रूमानी बनाकर प्रस्तुत किए गए हैं. न सिर्फ उनको अपमानित करने वाले वाकये काटे गए हैं, बल्कि रोज़मर्रा की कुछ चीज़ें जो दाली को इंसान बनाती हैं, उन्हें भी काट दिया गया है. दाली खुद मानते हैं कि वे आत्ममुग्ध व्यक्ति थे. और उनकी आत्मकथा मानो गुलाबी रोशनी की चमक में रचा गया एक स्वांग हो, दुनिया को मोहित करने के लिए. मगर फंतासी के स्तर पर- या ये ध्यान में रखते हुए कि इस मशीनी दौर ने हमारी स्वाभाविकताओं को दूषित कर दिया है, इस आत्मकथा के बहुत मायने हैं. (अनुवाद- प्रतीक्षा)

2. दाली क्या है. एक बहुत अच्छा चितेरा और एक बहुत घटिया इंसान. क्या किसी किताब से बदबू आ सकती है. अगर ऐसा होता तो दाली की आत्मकथा वह किताब होती. अपनी महानता के लिए उसने क्या रास्ता चुना. पाजीपने का. कुछ ऐसी हरकतें करो कि लोग सदमे में चले जाएं. दर्द से चीखें. पांच साल के हो, तो अपने से छोटे एक बच्चे को पुल से नीचे फेंक दो. डॉक्टर सामने आए तो घूंसा मारकर उसका चश्मा तोड़ दो. जब कभी ये न कर पाओ तो इसके ख्वाब तो देखो ही. बीस साल बाद एक मरे हुए गधे की आंखें कैंची से निकालो.

ये सब करते हुए आप खूब ओरिजिनल महसूस कर सकते हैं. और कमाल की बात. लोग इसे आर्ट समझकर आप पर पैसे भी लुटाते हैं.

सल्वादोर दाली की आत्मकथा 'द सीक्रेट लाइफ ऑफ दाली' 1942 में प्रकाशित हुई थी. फोटो: विकीमीडिया
उनकी आत्मकथा ‘द सीक्रेट लाइफ ऑफ सल्वादोर दाली’ 1942 में प्रकाशित हुई थी. फोटो: विकीमीडिया

दाली ने और भी कई चीजें लिखीं. नॉवेल, नाटक वगैरह. मगर चर्चा या तो इस किताब को मिली. या फिर उस किताब को, जो उनकी बहन ने लिखी.

4.

‘सल्वादोर दाली सीन बाई हिज़ सिस्टर’

ये शीर्षक था दाली की बहन एना मारिया की 1960 में आई किताब का. दाली इसे पढ़कर भड़क गए. परिवार से उनका आख़िरी नाता टूट गया. एक बरस पहले बाप सल्वादोर रफायल मरा था. उसने भी जायदाद में कुछ नहीं दिया. उलटा जो पेंटिंग घर छूट गई थीं, उनके लिए भी मुकदमेबाजी चलती रही. एक रोज़ तो दाली ने कोर्टरूम में वकील को ही पीट दिया.

मगर बहन एना पर दाली के भड़कने की एक ख़ास वजह थी. किताब में गाला की बुराई थी. कोई बीवी की शिकायत करे, ये दाली को बर्दाश्त नहीं हुआ.

और गाला, उसे दाली बर्दाश्त होना बंद हो गया था. लेकिन ये अचानक नहीं हुआ. दाली कई किस्म के प्रेम, उत्तेजनाओं और सनकों के बावजूद गाला के साथ था. गाला भी कई प्रेमियों के बाद भी दाली के साथ थी. इसी साथ के दौरान दाली की एक और क्लासिक पेटिंग आई. जिसका नाम भी बेतरह लंबा है. माई वाइफ, न्यूड, कंटेंपलेटिंग हर ओन बॉडी ट्रांसफॉर्म्ड इन टु स्टेप्स, द थ्री वर्टीब्रा ऑफ ए कॉलम, स्काई एंड आर्किटेक्चर.

1945 की डाली की पेंटिंग, 'माय वाइफ...'. फोटो: Wikiart.org
1945 की दाली की पेंटिंग, ‘माय वाइफ…’. फोटो: Wikiart.org

कंटेंपलेट. यानी गहरे विचार में डूबकर किसी चीज को एकटक देखना. दाली दिखता है. अमरीका से यूरोप के बीच शटल करता. कभी किसी फिल्म, तो कभी किसी प्रदर्शनी के लिए इंस्टॉलेशन गढ़ता, पेंटिंग बनाता, आर्किटेक्चर फाइनल करता. चौंकाने की हद को आगे धकेलता. लेकिन अब इसका भी एक ढर्रा बन चुका है. और वो ख़ुद अपने जीनियस की बूढ़ी परछाईं भर रह गया है. और पूछे जाने पर कहता है.

”मुझमें और एक सनकी आदमी में एक ही अंतर है. वो ये कि मैं सनकी नहीं हूं.”

और जो ड्रग्स के इल्ज़ाम लगें तो कहता है

”मैं ड्रग्स नहीं लेता. मैं ख़ुद ड्रग्स हूं.”

पर मामला सिर्फ व्यक्तिगत चुनावों का नहीं, राजनीतिक चुनावों का भी था. कभी विचारों की आज़ादी का पक्षधर रहा, गरीबों के हक में नारे लगाता जेल जाता दाली अब स्पेन के तानाशाह जनरल फ्रैंको का सपोर्टर था. उसने स्पेन में ही बसेरा कर लिया था. उसने ‘बॉस्केट ऑफ ब्रेड’ बनाकर सर्रियल की मौत की मुनादी पहले ही पीट दी थी.

बास्केट ऑफ ब्रेड का एक और वर्ज़न दाली ने 1926 में बनाया था. ये 1945 की पेंटिंग वाला वर्ज़न है. फोटो: Wikiart.org
‘बास्केट ऑफ ब्रेड’ का एक और वर्ज़न दाली ने 1926 में बनाया था. ये 1945 की पेंटिंग वाला वर्ज़न है. फोटो: Wikiart.org

दाली पर बड़बोले, आत्ममुग्ध और सनकी होने के आरोप लगे. कहा गया कि दाली पब्लिसिटी स्टंट करते हैं. वो ख़ुद को कई दिनों तक बंद कर लेते थे. खुद को एक्स्ट्रीम पर ले जाते थे, ताकि अवचेतन मन को ऑब्जर्व किया जा सके. इसे Paranoic Critical Method कहा गया. 1939 में एक प्रदर्शनी में उनके आर्टवर्क में उनसे पूछे बिना कुछ बदलाव किए गए. यहां उन्होंने गुस्से में आकर प्रदर्शनी में लगा एक बाथटब खिड़की से नीचे फेंक दिया. 1955 में सॉरबॉन यूनिवर्सिटी में लेक्चर देने वो रॉल्स रॉयस से आए और इसमें बहुत सारी फूलगोभियां भरी हुई थीं. 1970 में अमेरिका के ‘डिक कैवेट शो’ में वो ऐंटईटर नाम का जानवर ले आए थे.

अब बस इंतजार उसके अपने अंत के स्वर का था. लेकिन सबसे पहले प्रेम को मरना था.

गाला को दाली नाम के कलाकार का अमानवीय रूप, जो पहले लुभाता था, अब डराता था. उबकाई आती थी. दाली बार-बार एक्सट्रीम पर जाता. कभी खुद को हफ्तों के लिए कमरे में बंद कर लेता. कभी औरों को बंद कर निहारता. इसके पीछे का तर्क. अवचेतन मन को निहारना. लेकिन गाला को अब इस आदमी की नजर भी नहीं निहारनी थी.

दाली ने आखिरी कोशिशों में अपना एक पुराने ज़माने का बना किलेनुमा बंगला गाला को दे दिया. गाली उसमें रहने चली गई. मगर एक शर्त पर. कि दाली जब भी वहां आएगा, उसकी लिखित इजाज़त लेकर आएगा. दाली एक आख़िरी दफा आया. नशे के भयानक चंगुल में था वो. और गाला, वो बहुत बीमार थी. 87 बरस की हो गई थी. मर गई थी. 1982 में. और मर सा गया था दाली.

1972 में सल्वादोर दाली. फोटो: विकीमीडिया
1972 में सल्वादोर दाली. फोटो: विकीमीडिया

उसने खाना-पीना कमोबेश बंद कर दिया. पर्किंसन हो गया. हाथ बेतरह कांपता. वही दाहिना हाथ, जिससे उसने कई मास्टर पीस गढ़े. फिर एक रोज़ उसके घर में आग लग गई. वो जलकर मरते-मरते बचा. उसे अपने कस्बे में बने म्यूज़ियम में ले आया गया. ये म्यूज़ियम उसी ने डिज़ाइन किया था. और अब यहीं उसे मरना था. 1989 के पहले महीने में.

मगर मरकर भी दाली कहां मरा. वो ख़ुद भी कहता था.

”जीनियस को मरने का अधिकार नहीं होता.”

लेकिन उसका क्राफ्ट उसके पहले ही मर चुका था क्या. ये सवाल पूछा गया 1983 में बनी दाली की पेंटिंग ‘द स्वैलोस टेल’ देखकर. आख़िरी पेंटिंग. इतनी साफ लकीरें. लोगों ने पूछा. जिसका हाथ कांपता हो, वो ये कैसे कर सकता है. कहीं ऐसा तो नहीं कि पेंटिंग किसी से बनवाई और दस्तखत अपने कर दिए. ये इल्जाम किसी भी कलाकार के लिए अंग्रेज़ी का शब्द उधार लेकर कहूं तो कैटेस्ट्रोफी की तरफ था. एक क्लासिक ट्रेजडी का भयानक वीभत्स अंत. और क्या ही इत्तेफाक. ये पेटिंग मशहूर फ्रेंच गणितज्ञ रेने थॉम की कैटेस्ट्रोफी थ्योरी से प्रभावित थी.

दाली की आखिरी पेंटिंग 'द स्वैलोज़ टेल' विवादित हो गई थी. फोटो: Wikiart.org
दाली की आखिरी पेंटिंग ‘द स्वैलोस टेल’ विवादित हो गई थी. फोटो: Wikiart.org

5.

ढूंढता फिरता है मुझ को क्यूं फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू

मैं वहां हूं ख़ुद जहां अपना पता मिलता नहीं

– अब्दुल्लतीफ़ शौक़

दाली कहां है. अपनी कब्र में. मगर कई फरेबों का पता लगाने के लिए उसके इस पते पर दस्तक होती रहती हैं. मसलन, मौत के 38 बरस बाद. 2017 में दाली की कब्र खोदी गई. एक औरत ने दावा किया. दाली मेरा बाप है. मामला कोर्ट कचहरी में पहुंचा. और फिर डीएनए सैंपल के लिए कब्र खोदी गई. भीतर कुदालें चल रही थीं और बाहर दाली की कला के संरक्षक प्रदर्शन कर रहे थे.

दाली की कब्र की खुदाई के दौरान म्यूज़ियम के बाहर प्रदर्शन. फोटो: bbc.com
दाली की कब्र की खुदाई के दौरान म्यूज़ियम के बाहर प्रदर्शन. फोटो: bbc.com

तभी कुछ लोगों को एक टैक्सी याद आ गई. जहां लाश से घोंघे निकल रहे थे. ये दाली का 1938 में पैरिस एग्जिबिशन के लिए बनाया इन्स्टॉलेशन था. द रेनी टैक्सी.

एक टैक्सी है. जिसकी छत में छेद हैं. भीतर पानी आ रहा है. फ्रंट की ड्राइविंग सीट पर एक पुरुष का मैनिक्विन (पुतला, जैसा हम कपड़ों की दुकानों में देखते हैं). पीछे की सीट पर एक महिला का मैनिक्विन. दोनों में से वनस्पतियां निकल रही हैं. पत्ता गोभी सी. और निकल रहे हैं खूब सारे घोंघे. असली.

दाली का इंस्टालेशन. दे रेनी टैक्सी. फोटो: artnet.com
दाली का इंस्टॉलेशन. दे रेनी टैक्सी. फोटो: artnet.com

बहरहाल, दावा, कि दाली मेरा बाप है, नकली निकला.

और उन दावों का क्या. कि दाली से, उसके सरपरस्तों ने, खाली कैनवस पर दस्तखत करवाए गए. बाद में बेचे जाने के लिए. किसी और से लकीरें गढ़वाकर. दाली के नाम पर. या फिर ये कि ख़ुद दाली ने अपने दस्तखत वाली शीट्स बेचीं. पैसे कमाने को. ताकि नशा कायम रहे. ये दावे आज भी हवा में तैरते हैं. नशे की तरह. या फिर दाली के पुरुष प्रेमी लोर्का की एक और कविता की तरह.

मौत

शराबखाने में

आती-जाती है

काले घोड़े

और फरेबी लोग

गिटार के गहरे रास्तों

के बराबर चलते हैं

और समन्दर के किनारे

बुखार में डूबी गंठीली झाड़ियों से

नमक की और औरत के खून की

बू आती है

मौत

आती और जाती है

आती और जाती है

मौत

शराबखाने की !

– कवि लोर्का. अनुवाद – विष्णु खरे (सबसे पहले आलोचना पत्रिका में प्रकाशित)

P.S.

पुनर मूछको भव.

मशहूर कहानी है. नदी में नहाने के बाद सूर्य को अर्घ्य देते साधु का हाथ. उसमें गिरती चुहिया. फिर उसके परिणय की कोशिश. पहाड़, बादल, हवा से होता हुआ आख़िर में फिर चूहा रूप ही सर्वोत्तम. इसी को सार रूप में कहा जाता है पुनर मूषको भव. फिर चूहा हो जाओ. लेकिन दाली की कहानी में ये होगा पुनर मूछको भव. फिर मूंछ हो जाओ. अर्थात. कहानी मूंछ से शुरू हुई तो खत्म भी वहीं हो.

दाली की भौंह की तरफ तनी मूंछें उनका अपना क्रिएशन नहीं था. उन्होंने 17वीं सदी के स्पैनिश दरबारी चित्रकार डिएगो वेलास्कैस को कॉपी किया था.

डिएगो वेलास्कैस. फोटो: विकीमीडिया
डिएगो वेलास्कैस. फोटो: विकीमीडिया

डिएगो की एक पेंटिंग के साथ कई किस्से और कंट्रोवर्सी जुड़े हैं. पेटिंग जिसमें एक स्त्री नग्न है और उसके नितंबों को दुनिया में सबसे खूबसूरत बताया गया. और इसी के चलते एक स्त्री ने मांस काटने वाला चापड़ लेकर हमला कर दिया. पेटिंग पर. इसे बनाए जाने के सदियों बाद.

पेंटिंग डिएगो ने रानी के बाथरूम के लिए बनाई थी. इसका नाम रखा गया था टॉयलेट ऑफ वीनस. मकसद ये कि हमेशा खूबसूरत दिखने की चाह रखने वाले जान लें ये परम सत्य. कुछ भी स्थायी नहीं. सौंदर्य भी नहीं. इसलिए बाल परा (चेरब) के शीशे में नज़र आते चेहरे में कुछ पट्टियां हैं, कुछ जो नहीं है, मगर जतन के सहारे लाने की कोशिश की जा रही है. लेकिन पारखियों को नज़र आए स्त्री के पुट्ठे. उनका थ्रीडी इफेक्ट, देखने वालों को ये लगना कि जैसे पेंटर के साथ वह भी देख रहे हैं, छू रहे हैं, आदि इत्यादि. कहा गया कि आज तक कैनवस पर स्त्री का ये अंग इससे ज़्यादा सुंदर नहीं गढ़ा जा सका.

डिएगो वेलेस्कैस की पेंटिंग रोकबी वीनस. फोटो: flickr.com
डिएगो वेलेस्कैस की पेंटिंग रोकबी वीनस. फोटो: flickr.com

नेपोलियन के दौर में ये पेंटिंग गुम हो गई. फिर एक रोज़ रोकबी पार्क एरिया में मिली. तो इसका नाम हो गया रोकबी वीनस. फिर ये लंदन के नेशनल म्यूज़ियम में चली गई. और वहां पर 1906 के बरस में मेरी नाम की एक महिला ने इस पर हमला कर दिया. मेरी महिला अधिकारों के लिए संघर्षरत सेफ्रजेट आंदोलन से जुड़ी थीं. उनसे पूछा गया, रोकबी वीनस ही क्यों. तो जवाब मिला,

जिस तरह से हज़ारों पुरुष पूरे दिन इसे खड़े घूरते रहते थे. और औरतों के शरीर के बारे में एक सख्त विचार लेकर चले जाते थे. वह मुझे बेचैन करता था.

बेचैनी. कला कुंज का भी बीज शब्द. या फिर दाली के शब्दों में कहें तो भीतर जो कुछ है. उसका मास्टरबेशन (हस्तमैथुन). खुद अपनी नजर में वो यही था. ग्रेट मास्टरबेटर.

1929 में बनी दाली की पेंटिंग द ग्रेट मास्टरबेटर. फोटो: Wikiart.org
1929 में बनी दाली की पेंटिंग द ग्रेट मास्टरबेटर. फोटो: Wikiart.org

वीडियो देखें: एक जीनियस आर्टिस्ट या बदबूदार फ्रॉड: ‘मनी हाइस्ट मास्क’ वाले सल्वादोर दाली की कहानी का पहला हिस्सा.

वीडियो देखें: एक जीनियस आर्टिस्ट या बदबूदार फ्रॉड: ‘मनी हाइस्ट मास्क’ वाले सल्वादोर दाली की कहानी का दूसरा हिस्सा.

वीडियो देखें: एक जीनियस आर्टिस्ट या बदबूदार फ्रॉड: ‘मनी हाइस्ट मास्क’ वाले सल्वादोर दाली की कहानी का तिसरा हिस्सा.

वीडियो देखें: एक जीनियस आर्टिस्ट या बदबूदार फ्रॉड: ‘मनी हाइस्ट मास्क’ वाले सल्वादोर दाली की कहानी का चौथा हिस्सा.

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