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'फैमिली' कम और 'मैन' ज्यादा: देश का हीरो श्रीकांत अपनी पत्नी का हीरो क्यों नहीं बन सका?

‘द फैमिली मैन’ (The Family Man Season 2) का दूसरा सीजन 4 जून, 2021 को रिलीज हुआ. जिसके बाद इस शो पर तमाम प्रतिक्रियाएं आ रही हैं. फिर चाहे वो रिव्यू के फॉर्म में हों, या मीम और चुटकुलों के फॉर्म में. पहले सीजन की तरह ‘द फैमिली मैन’ का सीजन-2 भी अपने आप में तमाम इशूज समेटे हुए है. आइए एक-एक कर इनपर बात करते हैं.

‘लोनावला में क्या हुआ?’

हाल ही में सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी पढ़ने को मिली. कि ‘सुची के रहस्य’ नाम की एक अलग किताब लिखनी पड़ेगी. सीरीज में बार-बार रेफरेंस आता है लोनावला की एक रात का. दो सीजन के बाद भी किसी को नहीं मालूम कि असल में उस रात क्या हुआ था. मगर उस रात जो भी हुआ था, भले ही वो अरविंद के साथ हुआ कोई ऐसा प्रसंग हो जिसे ‘एक्स्ट्रा मैरिटल अफ़ेयर’ कहा जाए या फिर महज़ उसकी भूमिका बनी हो. मगर उसने सुची को हमेशा के लिए बदल दिया. अब वो चाहकर भी श्रीकांत के साथ खुश नहीं रह पाती. जबकि श्रीकांत ने उसके लिए अपना काम छोड़ आईटी फर्म जॉइन कर ली थी.

लेकिन क्या लोनावला में जो हुआ उसका गिल्ट अकेले सुची को कैरी करना चाहिए? हमारा सोशल फैब्रिक ऐसा है जहां लोग तलाक नहीं लेते. वो तबतक रुकते हैं जबतक बात शारीरिक या मानसिक हिंसा तक न आ जाए. लोग अक्सर शादियां बचा लेना चाहते हैं.

मगर क्या श्रीकांत का एक प्राइवेट कॉर्पोरेट नौकरी जॉइन कर लेना शादी को बचा लेने के लिए काफी है? श्रीकांत ने सुची पर तब शक किया जब वो अरविंद से केवल एक दोस्त के तौर पर मिलने गई थी. एक वक़्त उसने सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल कर पत्नी की लोकेशन ट्रैक की थी.

सुची अरविंद से मिलते हुए या तो झूठ बोलती है या आधा सच बोलती है. क्या ये इसलिए कि श्रीकांत एक मच्योर फ्रेंडशिप समझने की समझ नहीं रखता है? या फिर इसलिए कि अरविंद से मिलते वक़्त उसके ही मन में 'चोर' है?
सुची अरविंद से मिलते हुए या तो झूठ बोलती है या आधा सच बोलती है. क्या ये इसलिए कि श्रीकांत एक मच्योर फ्रेंडशिप समझने की समझ नहीं रखता है? या फिर इसलिए कि अरविंद से मिलते वक़्त उसके ही मन में ‘चोर’ है?

श्रीकांत ने रिश्ते में अनगिनत झूठ बोले हैं जिसके पीछे उसका दावा है कि वो अपनी फैमिली को प्रोटेक्ट करना चाहता है. लेकिन उसके ये झूठ उसके रिश्ते को प्रोटेक्ट नहीं कर पाते.

सुची अपनी पुरानी नौकरी छोड़ एक ऐसी नौकरी में आ गई है जो एंग्जायटी और डिप्रेशन से जूझ रहे लोगों की मदद करती है. मगर क्या सुची खुद की मदद कर पा रही है?

सुची एक मॉडर्न, करियर-ओरिएंटेड औरत है. लेकिन एक मां होते हुए ऐसी औरत होना आसान नहीं. क्योंकि इसमें सबसे पहली लड़ाई खुद से है. सुची के लिए श्रीकांत को छोड़ना और एक बेहतर रिश्ते में जाना आसान हो जाता अगर उसके बच्चे न होते. बच्चे उसे वापस खींचते हैं. वो नौकरी करती जाती है और खुद को दोष देती रहती है कि वो बच्चों के लिए उपलब्ध नहीं है. जब वो नौकरी छोड़ देती है तब भी खुद को खुश नहीं रख पाती है क्योंकि दिनभर घर में रहना उसे पसंद नहीं आता. वो दोबारा नौकरी शुरू करती है, जिसके बाद बच्चों की हालत बदतर हो जाती है.

श्रीकांत अपनी बदली हुई नौकरी में खुश नहीं है. पति-पत्नी अपनी प्रोफेशनल खीज भी एक दूसरे पर ही उतारते हैं. नतीजतन सुची के बर्थडे डिनर पर वो पब्लिक में लड़ते हैं.
श्रीकांत अपनी बदली हुई नौकरी में खुश नहीं है. पति-पत्नी अपनी प्रोफेशनल खीज भी एक दूसरे पर ही उतारते हैं. नतीजतन सुची के बर्थडे डिनर पर वो पब्लिक में लड़ते हैं.

ये शादी हर दिन और बोझिल, और भारी होती जा रही है और इसका सीधा असर बच्चों पर आता है. श्रीकांत स्कूल में पनिशमेंट झेल रही बेटी को बचा लेता है. उसको मौत के मुंह से निकाल लाता है. मगर क्या वो नाज़ुक उम्र की अपनी बेटी की मानसिक ज़रूरतें समझ पा रहा है? बेटी कभी-कभी अपनी मां के जी भर गले लगती है मगर पिता से बात तक करना पसंद नहीं करती. श्रीकांत और सुची के बेटे को ‘अटेंशन डेफिसिट हाइपरएक्टिविटी डिसऑर्डर’ के लक्षण हैं. यानी लोगों का ध्यान आकर्षित करने के लिए दूसरों का नुकसान करने की हद तक जा सकता है. मगर क्या उसके मां-बाप को इसकी खबर है?

एक बिखर चुकी शादी का नमूना है ‘द फैमिली मैन’. सोशल मीडिया पर पसरे तमाम रिव्यू और चुटकुले ये बताते हैं कि सीरीज को बनाने वालों ने लोगों के मन में श्रीकांत के लिए बेहद प्रेम और सम्मान भरा है. वहीं सुची और बेटी धृति के ऊपर स्त्री-विरोधी चुटकुले बन रहे हैं. लोगों को धृति और सुची के बर्ताव से घृणा हो रही है. जिस पुरुष ने देश की सुरक्षा में अपने दिन रात कुर्बान करने की कसम खा ली है, क्या उसके पत्नी और बच्चों को भी इसका नतीजा भुगतना ज़रूरी है? क्या हर सूरत में रिश्ते को बचा लेना औरत का ही काम है?

‘ही नीड्स सीरियस हेल्प’

ये स्वीकारना कि उसे सीरियस मेंटल हेल्थ इशू है, श्रीकांत के लिए उसके अभिमान और पौरुष से नीचे है. सुची उनके रिश्ते को बचाने के लिए उन्हें एक मैरिज काउंसिलर के पास लेकर जाती है. लेकिन श्रीकांत पहले मिनट से ही इस बात से कन्विंस नहीं है कि उसे वहां होना चाहिए. वो काउंसिलर का अपमान करता है. मगर ये समझना ज़रूरी है कि ये अपमान सिर्फ काउंसिलर का ही नहीं, उस एफर्ट का भी है जो सुची ने शादी को बचाने और बच्चों की बेहतर परवरिश के लिए किया.

एक आम निर्दोष स्टूडेंट को आतंकी गतिविधियों के शक में मार गिराने के बाद श्रीकांत गिल्ट में है. उसने गोली नहीं चलाई मगर वो टीम को लीड कर रहा था. पूरा देश उस निर्दोष मुसलमान लड़के को टेररिस्ट समझ रहा है. श्रीकांत इस गिल्ट में जल रहा है. शराब और सिगरेट में खुद को ख़त्म कर रहा है. जब बर्दाश्त नहीं होता तो वो मृत लड़के की गर्लफ्रेंड से माफ़ी मांगने भी जाता है मगर उसे माफ़ी नहीं मिलती. वो घुटता रहता है, मगर दो पल बैठकर इसके बारे में किसी से बात नहीं करता. जो डॉक्टर उसे शराब-सिगरेट छोड़ने को बोलता है, उसे भी वो इग्नोर कर देता है.

श्रीकांत के द्वारा काउंसिलर का अपमान उसके पौरुष और डिनायल का प्रतीक है.
श्रीकांत के द्वारा काउंसिलर का अपमान उसके पौरुष और डिनायल का प्रतीक है.

श्रीकांत एक ऐसे पौरुष का गुलाम हो चुका है जिसका उसे खुद ही अंदाज़ा नहीं है. ये वो पौरुष नहीं जो पत्नी को खुद से कमतर आंके, महिलाओं का अपमान करे. ये वो पौरुष है जो सबसे ज्यादा नुकसान पुरुष के लिए ही लेकर आता है. अपनी भावनाएं छुपा ले जाना, रोना आने पर रो न पाना, सबसे ज्यादा नुकसान पुरुष का ही करता है.

एक कमज़ोर वक़्त में श्रीकांत अपनी पत्नी को फोन भी लगाता है मगर कुछ कहता नहीं. और टूटकर आंसुओं में बहने के पहले वो फोन काट देता है. श्रीकांत ने तमाम जिम्मेदारियों के साथ अपने कन्धों पर एक और ज़िम्मेदारी उठा रखी है. अपनी परेशानी से फैमिली को परेशान न होने देने की. लेकिन ये ज़िम्मेदारी उसे किसी ने दी नहीं. उसने खुद ही अपनाई है. उसकी परवरिश ही ऐसी है.

एक कमज़ोर वक़्त में श्रीकांत अपनी पत्नी को फोन भी लगाता है मगर कुछ कहता नहीं.
एक कमज़ोर वक़्त में श्रीकांत अपनी पत्नी को फोन भी लगाता है मगर कुछ कहता नहीं.

श्रीकांत अपनी बीमारियों के प्रति डिनायल में है. उसे डर है बदलावों से. हर औसत भारतीय ऐसा ही है. जो लक्षण होने पर भी किसी बीमारी का टेस्ट नहीं करवाता कि कहीं बीमारी का पता न चल जाए. ये डिनायल महज़ बीमारियों के लिए ही नहीं है. बल्कि उसके रिश्ते पर भी लागू होता है. उसे अपनी पत्नी से दो पल बैठकर कॉल करनी हो या उसका कॉल उठाना हो, वो इस प्रोसेस को डिले करने की कोशिश करता है. ऐसा नहीं कि उसे अपनी पत्नी या बच्चों से प्रेम नहीं है. बल्कि बात ये है कि अपनी ड्यूटी पर गोली से न डरने वाला व्यक्ति एक मच्योर संवाद से डरता है. वो बिखरती हुई असलियत को जानते हुए उससे रूबरू नहीं होना चाहता क्योंकि वो एक भी कमज़ोर पल से डरता है.

‘तलपड़े: एक आईना’

जेके एक ऐसा व्यक्ति है जो उसकी कर्मभूमि पर उसकी पत्नी को पूरी तरह से रिप्लेस कर देता है. जेके और श्रीकांत कभी एक दूसरे से अलग नहीं हुए, श्रीकांत ने नौकरी बदली, फिर भी नहीं. अपने ऑफिस की जो चिकचिक और युवा बॉस का बर्ताव उसे अपनी पत्नी से डिस्कस करना चाहिए था, वो असल में तलपड़े से करता है. जेके न सिर्फ उसकी सुनता है, बल्कि कई बार उसे आईना दिखाने की भी कोशिश करता है.

जेके श्रीकांत को उसके भरे-पूरे परिवार में खुश देखना चाहता है. वो कई बार उसे सुची का पक्ष दिखाने की भी कोशिश करता है जिसके प्रति श्रीकांत ने खुद को पूरी तरह से अंधा कर लिया था.

जो बातें श्रीकांत को अपनी पत्नी से करनी चाहिए थीं, वो भी वो जेके से करता है.
जो बातें श्रीकांत को अपनी पत्नी से करनी चाहिए थीं, वो भी वो जेके से करता है.

जेके एक साफ़ व्यक्ति है, जिसके दिमाग में विचारों की भीड़ नहीं है. उसे पता है कि किसी को बेवजह नहीं मारना है लेकिन ड्यूटी करते हुए अगर किसी निर्दोष की मौत हो गई है तो वो उनकी गलती नहीं है. चूंकि जेके के जीवन में झूठ नहीं हैं (कम से कम दर्शक को नहीं दिखते), उसके लिए अपने अंतर्मन को साफ़ रखना आसान है. वो खुद को ‘होलियर दैन दाऊ’ नहीं मानता, उसे पता है उसके पेशे में हर चीज सही नहीं हो सकती है. अगर वो हर चीज़ के लिए खुद को दोष देने लगेगा तो इतने गिल्ट के साथ कहां जाएगा?

मानसिक बीमारियां

‘द फैमिली मैन’ कहीं भी सीधे तौर पर मनोरोग और मानसिक दिक्कतों की बात नहीं करता, मगर एकाधिक बार उसके होने को स्वीकार करता है. सुची इसके बारे में अपनी ऑफिस प्रेजेंटेशन में लोगों को बताती है. और इस बात को हाईलाइट करती है कि मनोरोग के वजूद को मानना और उसके लिए हेल्प लेना कितना ज़रूरी है.

श्रीकांत के मानसिक संघर्ष पर हम पहले ही बात कर चुके हैं. लेकिन सीरीज के दूसरे किरदार भी इससे बचे नहीं हैं. मिलिंद और जोया एक ऐसे एक्सीडेंट का हिस्सा रह चुके हैं, जिसने उनका जीवन बदल दिया. जोया इतनी सिगरेट पीने लगी है कि अब हर वक़्त खांसती रहती है. उसके पांव ठीक नहीं हैं और अब वो घर में कैद हो चुकी है.

मिलिंद न सिर्फ इस गिल्ट में है कि उसके रहते हुए भी लोगों की जान गई. बल्कि उसे ये भी लगता है कि वो जोया के साथ न्याय नहीं कर पाया. वो नींद में चौंकता है. परेशान रहता है. मेडिकल भाषा में बात करें तो उसे पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर यानी PTSD कहा जाएगा.

पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से जूझते मिलिंद और जोया.
पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से जूझते मिलिंद और जोया.

बीबीसी शरलॉक में एक सीन है जब मायक्रॉफ्ट होम्स, जॉन वॉटसन से कहता है: तुम इसलिए बेचैन नहीं हो कि युद्ध की यादें तुम्हें डराती हैं. बल्कि इसलिए बेचैन हो कि तुम युद्ध में होने को मिस करते हो. इस टीम को यही लगता है कि किसी एक्शन का हिस्सा न होना उन्हें बेचैन करता है. जेके मिलिंद से कहता है कि तुम अब काम पर वापस आ जाओ, जितना घर पर बैठोगे, उतना ही बुरा महसूस होगा. मिलिंद मिशन पर वापस आ जाता है. मगर हम देखते हैं कि वो ठीक नहीं है. वो अभी पिछले ट्रॉमा से उबर नहीं है और नींद में चौंकता रहता है.

जिस पेशे में श्रीकांत और उसकी टीम है, उसमें होना आसान नहीं. इसमें जितना स्ट्रेस है, अपने लिए उतना ही कम वक़्त है. ये स्ट्रेस कब एंग्जायटी और अवसाद में बदल जाता है, किसी को मालूम नहीं पड़ता.

देशप्रेम

‘द फैमिली मैन’ हर रोज़ की घटनाओं से प्रेरित है, ऐसा उसे बनाने वाले कहते हैं. इसमें एंटी नेशनल क्या है से लेकर देशभक्ति, हर चीज पर टिप्पणी है. हमने पहले सीजन में देखा था कि किस तरह गोरक्षा, बीफ़, लिंचिंग और इस्लामोफोबिया जैसे मुद्दों पर इस सीरीज ने एक साफ़ पक्ष रखने की कोशिश की थी.

दूसरे सीजन में हम देख पाते हैं कि ऐसे अफसर जो स्पेशल ड्यूटी पर हैं, वो देशभक्ति किसे मानते हैं. पुलिस, इंटेलिजेंस, ब्यूरोक्रेट्स- इनके लिए देशभक्ति क्या है? इनकी देशभक्ति कभी नेताओं की देशभक्ति जैसी नहीं हो सकती. कि समय की हवा और पॉलिटिकल विचारधरा के हिसाब से तय हो. श्रीकांत कहता है कि PM बासु किसी भी पार्टी या विचारधारा की हों, उन्हें बचाना टास्क का फ़र्ज़ है और वो बचाएंगे. वो देश के लोगों को किसी भी आतंकी हमले से बचाएंगे. उनका काम अपने आप में पॉलिटिक्स मुक्त है. ये बात और है कि उनके अपने बबल के बाहर पॉलिटिक्स के सिवा कुछ भी नहीं. मुसलामानों के खिलाफ नफरत फैलाने वाले एक नेता के लिए भी उन्हें मिशन पर निकलना ही पड़ता है, क्योंकि उन्हें आतंकी हमले की आहट होती है.

ऐसे में इन पेशों में काम करने वाले पर्सोनेल्स के लिए उनकी पर्सनल पॉलिटिक्स मायने नहीं रखती. मायने रखता है तो केवल उनका उनका फ़र्ज़, जो बदलती सरकारों के साथ बदलता नहीं है.

मुत्थू तमिल है, तलपड़े मराठी और श्रीकांत का होमटाउन उत्तर प्रदेश का बनारस है.
मुत्थू तमिल है, तलपड़े मराठी और श्रीकांत का होमटाउन उत्तर प्रदेश का बनारस है.

दूसरे सीजन में हम ‘भारतीय’ होने की अन्य परिभाषाओं से भी होकर गुज़रते हैं. जैसे: “साउथ में 5 स्टेट्स हैं, आप किसकी बात कर रहे हैं”. या फिर काम करते हुए हिंदी गीत बजेगा या तमिल. टास्क की स्पेशल टीम में कई तरह की भाषाओं के बैकग्राउंड से आने वाले लोग हैं. मगर उनके काम और देश की एक ही परिकल्पना है.

ये ‘चक दे इंडिया’ जैसा मामला नहीं है जहां राज्य के नाम सुनाई न पड़ते हों. किसी भी देश की सबसे बुरी स्थिति ही वो होगी जिसमें राज्य के नाम सुनाई पड़ना बंद हो जाएं. कोई मराठी, मराठी रहते हुए और तमिल, तमिल रहते हुए, आपस में बहस करते हुए, एक दूसरे की टांग खींचते हुए भी कैसे साथ में काम कर सकें, ये एक होमोजीनस देश के से बेहतर विकल्प होगा.


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