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रिज़र्व बैंक छोड़ चुके रघुराम राजन की सत्यकथा: पार्ट 2

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हम सबकी जिंदगी में एक बड़ा भाई होता है. या तो अपना भाई होता है या चाचा का लड़का, मामा का, बुआ का, किसी का होता है. मस्त, जबरदस्त, रॉकस्टार टाइप का. उसको देख के ही अपन बादशाह बन जाते हैं. वो सबको ठेंगे पे ले के चलता है. चाहे काम कितना भी गड़बड़ा रहा हो, उसके खड़े रहने मात्र से उस गड़बड़ में भी मज़ा आता है. उस वक़्त हम अफ़सोस नहीं जताते. बल्कि मस्त रहते हैं कि भाई के साथ 5 मिनट गुज़रा.

उसके साथ चेन्नई जाने के लिए निकलो. 2nd AC रिजर्वेशन है. ट्रेन छूट जाती है. पर अपन खुश. कोई चिंता नहीं. यही लगता है कि कुछ नहीं हुआ. मज़ा आएगा. उसकी जगह कोई और साथ रहता तो घबराहट हो जाती. ट्रेन छूटने पर तो लोग रो देते हैं.

भारत की इकॉनमी के लिए रघुराम राजन वही वाले बड़े भाई हैं.

और वो खुद इंडिया छोड़ के जा रहे हैं. दुनिया किसी के जाने से नहीं रुकती. धरती तो घूमेगी. पर वो बड़ा भाई सबके जेहन में रहता ही है. उम्र-भर.

रघुराम राजन सत्यकथा सीरीज की दूसरी किस्त में आइये देखें कि राजन ने तीन साल में क्या-क्या किया. भाई याद रखने लायक है या नहीं. तीन हिस्सों में देखेंगे: काबिलियत, अफसरियत और इंसानियत.

काबिलियत

a) इन्फ्लेशन

जब राजन गवर्नर बने तब भारत की इकॉनमी कुछ ऐसी थी:
Inflation Rate : 9.52% : Economy Growth : 5.6%

गवर्नर बनने के बाद:
Inflation Rate : 5.6% : Economy Growth : 7.6%

बीच में इन्फ्लेशन 3.5% तक कम हुआ था.

दाल तो बहुत दिन से महंगी है. आलू और टमाटर भी महंगे हो गए हैं. जबकि कच्चे तेल के दाम बहुत दिन से कम हैं. मोदी जी ने तेल के कम दाम के चलते ही खुद को ‘नसीबवाला’ भी बता दिया था. रघु के चलते इतने पर ही रुका है मामला. नहीं तो 200 रुपये दाल देखने के लगते.

मोदी सरकार रघु से नाराज है. क्योंकि कॉर्पोरेट और बैंकों को दिए जाने वाले लोन का इंटरेस्ट रेट राजन ने तीन साल में उतना कम किया ही नहीं जितना वो लोग चाहते थे. क्योंकि राजन की प्राथमिकता ‘इन्फ्लेशन’ रही है. क्योंकि महंगाई जनता को सीधे मारती है. इंटरेस्ट रेट कम करने से मार्किट में बिजनेस के लिए ज्यादा पैसा आएगा. पैसे का इतना फ्लो होने से महंगाई और बढ़ेगी. सिर्फ कुछ लोगों को फायदा होगा. केंद्र सरकार की नाखुशी के बावजूद राजन ने रेट महंगाई के हिसाब से ही रखा.

Raghuram Rajan speaks during an interview with Reuters in New Delhi March 11, 2013. REUTERS/B Mathur/Files

b) बैंक

i) पेमेंट बैंक: पहले बैंक का मतलब ब्रांच में जा के लाइन लगाना होता था. अगर मजदूर हैं तो लाइन के बाहर खड़े होकर निहारिये. जैसे ये स्वर्ग के लिए लगी लाइन हो. पहले मनमोहन सिंह और फिर मोदी जी ने ‘सिद्धांत’ रूप में इस चीज को सीरियसली लिया. रघु ने बैंकों के काम को आसान बनाकर छोटे-छोटे पेमेंट बैंक बनाने के सुझाव दिए. इसके बाद कई तरह के नए और विचार लाये गए. आनेवाले 4-5 सालों में इसका रिजल्ट दिखेगा.

ii) माइक्रो-फाइनेंस बैंक: छोटे-छोटे बिजनेस के लिए स्टेट बैंक वाले लोन नहीं देते. कुछ-कुछ बता के भगा देते हैं. राजन ने माइक्रो-फाइनेंस करने वाली कंपनियों को बैंक का लाइसेंस दे दिया. पहले वो इधर-उधर से जुटा के लोन देती थीं. अब ठाट से मार्किट से पैसा उठाकर छोटे बिजनेस के लिए लोन देंगी.

iii) पोस्ट ऑफिस: 2015 में रघु ने पोस्ट ऑफिस को भी बैंक चलाने का लाइसेंस दे दिया. हालांकि पेमेंट बैंक ही है. कम पूँजी वाला. पर कम पैसे वाले बिजनेस के लिए तो वरदान ही है.

iv) होलसेल बैंक: यूपीए सरकार में हमने ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ बहुत सुना था. माने डिसीजन ना होने से प्रोजेक्ट का लटक जाना. बहुत बार सरकारी बैंक लोन देने का डिसीजन ही नहीं ले पाते थे. और हमारे यहाँ रोड, बिजली, बिल्डिंग याने इंफ्रास्ट्रक्चर की बहुत कमी है. बिना लोन के बनेगा ही नहीं. किसके पास इतना पैसा है. राजन ने प्रपोज किया कि सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर को फाइनेंस करने के लिए होलसेल बैंक बनाये जाएं.

v) फॉरेन बैंक: सरकारी बैंकों का इतना वर्चस्व है कि नए बैंक हांफने लगते हैं. तो राजन ने फॉरेन बैंकों के लिए पेपर वर्क आसान कर दिया. वो यहां अपने ब्रांच खोल सकते हैं अब. वो नई टेक्नोलॉजी लेकर आते हैं. उनमें बात-बात में राशन कार्ड भी नहीं मांगा जाता. फिर सब कुछ हो जाने के बाद अंत में वो हाई स्कूल से एफिडेविट कराने भी नहीं भेजते. न तो उनका कर्मचारी पान खा के थूकता है. ना उनको ‘सर’ कहना पड़ता है. आप ‘मिस्टर डीकोस्टा’ बुलाइए, वो सर बोलेंगे. बैंक सर्विस सेक्टर है. उनको ही सर बोलना चाहिए हमें. अगर वो बैंक यहां छोटे शहरों में पहुंचे तो बाकी बैक थोड़ी शर्म तो करेंगे. बड़े शहरों में SBI वाले सोफे पर बैठाते हैं.

c) बैंकों की बैलेंस-शीट

हम रोज न्यूज़ में सुनते हैं: NPA. नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स. मतलब बैंकों के ऐसे लोन जो लोग वापस ही नहीं करते. पर लोन कौन सा? रामप्रसाद चौरसिया का? या परदेसी महतो का? मुन्नू पांडे का? बैल तक खोल ले जाते हैं बैंक वाले.

नॉन परफोर्मिंग एसेट्स मतलब माल्या वाला. सहारा वाला. अदानी वाला. जो सीना ठोंक के लेते हैं. फिर सीना ठोंक के देश से बाहर चले जाते हैं. आप कुछ उखाड़ नहीं पाते.

पर इनको लोन बिना सोचे कौन देता है?

बैंक वाले. बड़े-बड़े अधिकारी लोग. जो थाईलैंड छुट्टी मनाने जाते हैं. उसका पैसा कौन देता है? खुद ही सोच लीजिये.

रघु ने बैंकों को अपने बैलेंस-शीट क्लियर करने के लिए बोला. सालों पुरानी भी. फिर जिन कंपनियों ने पैसे नहीं लौटाए थे उनका नाम पब्लिक में डाल दिया.

कौन-कौन नाराज हुआ, पूछना नहीं है.

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d) डॉलर रिज़र्व

रघु ने फॉरेन करेंसी नॉन-रेजिडेंट (B) (FCNR-B) मतलब बाहरी लोगों के इंडिया में अकाउंट खोल डॉलर में पैसे रखने के मामले को आसान किया. इससे विदेशी मुद्रा बढ़ी. ये बेहत चतुर तरीका था. विदेशी मुद्रा में भारत अब बहुत स्ट्रांग है. चिंता की कोई वजह नहीं.

e) 2005 के पहले के नोट

2005 के पहले के नोटों को रद्द करना रघु का मास्टरस्ट्रोक था. भारत में नकली नोट बहुत ही आ चुके हैं. और ये ‘आर्थिक आतंक’ फैला रहे हैं. हो नहीं पाया पूरा. पर एक रास्ता तो मिल गया है निबटने का.

f) रिज़र्व बैंक में रिक्रूटमेंट

अफसरों को सेलेक्ट करने का तरीका तेज और आसान बनाया गया. एग्जाम के पेपर में ‘कॉमन सेंस’ वाले प्रश्न लाये गए. बहुत अच्छा पेपर नहीं बना था पहली बार. पर एक झटके में नए के लिए एक्सपेरिमेंट करना एटीट्यूड दिखाता है. और इरादा भी.

g) कमिटियां

रिज़र्व बैंक में सुधार के लिए रघु ने तीन कमिटियां बनायीं: उर्जित पटेल कमिटी, नचिकेत मोर कमिटी, पी जे नायक कमिटी. तीनों कमिटियों ने भारत में बैंकिंग को बदल देने वाले सुझाव दिए. ये अभी प्रोसेस में है. पर जब लागू हो जायेगा तो रिज़र्व बैंक कॉर्पोरेट से जनता तक सबके लिए बड़ा भाई बन जाएगा.

h) अवार्ड

रघु को ‘दुनिया में बेस्ट गवर्नर’ का अवार्ड मिल चुका है.

धड़ाधड़ फैसले. अब इससे अंदाज़ा लगा लीजिये कि रोजाना ऑफिस में क्या माहौल रहता होगा. मोदी जी ने खुद एक मीटिंग में कहा था कि मुझे फाइनेंस और इकॉनमी पढ़ना नहीं पड़ता. रघु खट से समझा देते हैं.

और भी कुछ जानना है?

अफसरियत

बिना कुछ जाने चेतन चौहान फैशन इंस्टिट्यूट के कर्ता-धर्ता बन गए हैं. गजेन्द्र चौहान स्टूडेंट्स द्वारा बाकायदा बेइज्जत हो जाने के बाद भी बने हैं. पहलाज निहलानी ने फिल्म सेंसर के नाम पर भारतीय दर्शकों के मान की धज्जियां उड़ा दीं. जैसे दर्शक निरे चम्पू हैं. सब इन्हीं को पता है.

कहीं जज कभी मोदी जी के तो कभी अखिलेश बाबू के पैर छूते पाए गए. कई पुलिस कमिश्नर गाली खाते रहे. सीबीआई चीफ बदमाशों के साथ ठट्ठा करते पाए गए.

ऐसे में राजन ने दिखाया कि अफसरियत क्या होती है. क्यों अफसरों को नेताओं के सामने अपनी टशन में रहना चाहिए. बिना गर्मी दिखाए, बिना बदतमीज हुए. मुस्कुराते हुए. बिना एक लफ्ज निकाले आंख से दुश्मनों की निगाहें नीचे कर देना.

a) देशभक्त vs देशद्रोही

आजकल देश के बारे में एक शब्द खराब कहना गुनाह है. वैसे में जब अरुण जेटली कह रहे थे कि भारत जल्दी ही चीन को पीछे छोड़ेगा तो राजन ने कहा: सावधान! अभी बहुत दूर है. अपना काम करते हैं पहले. बिना देशभक्त vs देशद्रोही सोचे. राजन ने अच्छे दिन वाली जुमलेबाजी नहीं की. सीधा सपाट इरादा. काम करेंगे.

b) इंटरेस्ट रेट

ऊपर बताया है हमने. सही बात पर टिके रहना कितने लोगों को आता है? आने पर भी कितने टिकते हैं? महंगाई के मुद्दे पर राजन की प्राथमिकता क्लियर रही.

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c) अफसर आम आदमी की तरह एक दिन बिताएं

इंडियन एक्सप्रेस में रघु का संदेशा आया था. कहना था कि अफसर बैंक में जा के देखें कि एक आम आदमी को एक कागज़ बनवाने के लिए कितनी जहमत उठानी पड़ती है. नहीं तो जब आप रिटायर हो जायेंगे तब पता चलेगा. रघु ने लोगों की तकलीफ को महसूस किया था.

d) कौन अपनी ताकत कम करता है?

राजन ने अपने दोस्त और काबिल आदमी उर्जित पटेल की हेल्प मांगी रिज़र्व बैंक के सुधार में तो उन्होंने मोनेटरी पालिसी कमिटी बनाने का सुझाव दिया. इंटरेस्ट रेट तय करना गवर्नर के हाथ में होता है. पर कमिटी बनने से ये अधिकार कम हो जायेगा. और एक कमिटी के सामने जवाबदेह बनना पड़ेगा. कितने अफसर अपनी ताकत कम करते हैं? रघु को ये मंजूर था. पर जब सरकार ने ये अधिकार नेतागिरी से जोड़ने की कोशिश की तो रघु ने साफ़-साफ़ बता दिया कि सर, ऐसे नहीं. उर्जित पटेल शायद अगले गवर्नर बन सकते हैं.

रघु चलते-चल्रते दिल जीत लेते हैं. ये हुनर सबके पास नहीं होता:

इंसानियत

a) गार्ड को सलाम

जब एक गार्ड ने रघु को सैल्यूट किया तो बिंदास अंदाज़ में रघु ने भी सैल्यूट ठोंक दिया.

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b) बच्ची को जवाबी ख़त

2013 में मनमोहन सरकार के समय भारत की इकॉनमी लुढ़क रही थी. चारों तरफ फ्रस्ट्रेशन का माहौल था. एक दस साल की लड़की लैला ने रघु को लैटर लिखा. और बीस डॉलर भेज दिये. बोली कि सर, मेरी तरफ से. दस दिन के अन्दर रघु का लैटर लड़की के पास आया. बीस डॉलर और थैंक्स के साथ. बोले कि घबराने की जरूरत नहीं है. सब सम्हाल लेंगे. बहुत पैसा है अपने पास. बाद में लैला को बुला के रिज़र्व बैंक घुमाया भी.

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लैला की चिट्ठी रघुराम राजन को
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राजन का जवाबी ख़त लैला को

भाई चले गए हैं. पर ठीक है. हमारे जैसे लोगों के लिए बंदे ने काम करने का एक मॉडल दे दिया: निधड़क रहो, आउट-ऑफ़-बॉक्स सोचो, दिल जीतते रहो.

फिलहाल भारत से पैसा भागने की फिराक में है. मार्किट में खलबली मची हुयी है. शोभा डे लिख सकती हैं: The Sensex is sexless now.

उम्मीद है कि सब कुछ ठीक होगा. जो आएगा वो भी अच्छा काम करेगा. यही तो रघु की लीगेसी होगी.


(ये स्टोरी ऋषभ श्रीवास्तव ने की है.)

पढ़ें: रिज़र्व बैंक छोड़ रहे रघुराम राजन की सत्यकथा: पार्ट 1

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