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वो जंग, जिसमें पाकिस्तान की आधी नेवी ख़त्म हो गई

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3 दिसंबर 1971. इंदिरा गांधी दिल्ली से बाहर थीं. उन्हें सूचना मिली कि पाकिस्तानी जंगी जहाज़ों ने भारत पर हमला कर दिया है. इंदिरा गांधी उसी दिन दिल्ली आईं और उन्हें पूरे हालात की जानकारी दी गई. उन्होंने सेना के अफसरों और कैबिनेट के नेताओं के साथ रात के ग्यारह बजे एक मीटिंग की और उसके बाद आधी रात को ऑल इंडिया रेडियो से अनाउंस किया-

”कुछ ही घंटों पहले पाकिस्तानी हवाई जहाज़ों ने हमारे अमृतसर, पठानकोट, श्रीनगर, अवंतीपुर, उत्तरलाई, जोधपुर, अम्बाला और आगरे के हवाईअड्डों पर बमबारी की. मुझे ज़रा भी संदेह नहीं है कि विजय भारत की जनता की. भारत की बहादुर सेना की होगी.

आर्मी के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा ने बताया, ”उन्होंने बमबारी शुरू कर दी. हम भी तैयार थे. हमने प्लान बना रखा था.”

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इंदिरा गांधी

इस युद्ध से सात महीने पहले 25 अप्रैल को उन्होंने एक कैबिनेट मीटिंग बुलाई थी. उन्होंने उस ख़ास कैबिनेट मीटिंग में जनरल सैम मानेक शॉ को भी बुलाया. बांग्लादेश से लाखों शरणार्थी भारत आ रहे थे. इंदिरा इससे परेशान थीं. उन्होंने कहा कि उन्हें इसे रोकना होगा. भले ही इसके लिए हमें युद्ध करना पड़े. लेकिन सैम मानेक शॉ ने कहा अभी हम इसके लिए तैयार नहीं हैं. उन्होंने बताया कि कुछ ही दिनों में मानसून आने वाला है और उस इलाके में मूसलाधार बारिश होती है. नदियां समुद्र बन जाती हैं. एक किनारे से दूसरा किनारा नहीं दिखता. वायुसेना हमारी मदद नहीं कर सकती. हम अगर युद्ध करेंगे तो युद्ध हार जाएंगे. मानेक शॉ ने उनसे युद्ध की तैयारी के लिए वक्त मांगा था.

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सैम मानेक शॉ

इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश को फ़ौज के जुल्म से आजाद कराने का वादा किया था. वो युद्ध को ज्यादा दिनों तक टाल भी नहीं सकती थीं. मीटिंग के सात महीने बाद ही पाकिस्तान ने युद्ध की शुरुआत कर दी थी.

पाकिस्तान के हमले के बाद इंदिरा ने इंडियन आर्मी को ढाका की तरफ बढ़ने का ऑर्डर दिया. एयरफ़ोर्स ने वेस्ट पाकिस्तान के हवाई अड्डों पर बम बरसाना शुरू कर दिया.

इंदिरा गांधी ने कहा, ”हम लड़ रहे हैं इस उसूल के लिए, कि सब देशों को स्वतंत्र होने का अधिकार है. सब लोगों को अपनी आवाज उठाने का अधिकार है. अगर उनकी मांगें ठीक हों तो. और हमें पूरा विश्वास है कि जब आजादी की आवाज उठती है, न्याय की आवाज उठती है, भाईचारे की आवाज उठती है तो हमेशा उसी की विजय होती है.”

तब पाकिस्तान, इंडिया के पूरब और पश्चिम दोनों तरफ था. इंडियन आर्मी ईस्ट पाकिस्तान पर ज्यादा ध्यान दे रही थी. ईस्ट पाकिस्तान के बांग्ला भाषियों ने वेस्ट पाकिस्तान के दमन के खिलाफ विद्रोह छेड़ रखा था. हथियारों से लैस ‘मुक्तिवाहिनी’ से जुड़े लोग पाकिस्तान की सेना से लड़ रहे थे. इससे भारत का काम थोड़ा आसान हो गया. भारतीय सेना ने ईस्ट पाकिस्तान पर कब्जा करना शुरू कर दिया. तब पाकिस्तान के राष्ट्रपति याहया खान ने भारतीय सेना को पश्चिमी सीमा पर घेरना चाहा. पाकिस्तान को लगा भारत का ज्यादा ध्यान ईस्ट बॉर्डर पर है इसलिए पश्चिमी सीमा के ज्यादा से ज्यादा भाग पर कब्जा कर लिया जाए. इसके लिए उसने सबसे पहले उत्तरलई एयर बेस को निशाना बनाया. जैसलमेर में डिनर करने का सपना देखने वाले पाकिस्तानी ब्रिगेडियर तारिक मीर को इंडियन आर्मी और एयर फ़ोर्स की तरफ से पश्चिमी सीमा पर करारा जवाब मिला. इंदिरा गांधी ने भारत के ऊपर से उड़ रहे पाकिस्तान के एयरक्राफ्ट पर बैन लगा दिया. इससे वेस्टर्न पाकिस्तान, ईस्टर्न पाकिस्तान से कट गया.

इस दौरान इंदिरा गांधी ने एक स्पीच दी और कहा, ”हम समझते हैं कि हम केवल भारत के लिए नहीं लड़ रहे हैं. केवल अपने उसूलों के लिए नहीं लड़ रहे हैं. हम आज जो सारी दुनिया में दबे हैं, सारी दुनिया में जो वर्षों से दबाए गए, उनके लिए लड़ रहे हैं. भले ही वो इसे ना पहचान सकें, वो अपनी गुलामी को ना पहचान सकें लेकिन हम पहचानते हैं और हम जानते हैं कि उससे आज हम नहीं लड़ेंगे तो यही धक्का हमको लगेगा.”

भारतीय नौसेना का युद्ध में कूदना

पश्चिमी तट

नौसेना की तरफ से 4 दिसंबर को ऑपरेशन ट्राईडेंट शुरू कर दिया गया. भारतीय नौसेना ने युद्ध के दो मोर्चे संभाल रखे थे. एक था बंगाल की खाड़ी में पूर्वी पाकिस्तान और दूसरा पश्चिमी पाकिस्तान का अरब सागर की ओर से मुकाबला करना. पश्चिमी मोर्चे पर सेना का नेतृत्त्व नौसेना पोत मैसूर से एडमिरल कुरुविल्ला और वाइस एडमिरल एस.एन. कोहली कर रहे थे. 3-4 दिसंबर की रात कराची पोर्ट पर हमला कर दिया गया. पाकिस्तान के PNS खैबर को डुबो दिया गया. माइंस स्वीपर PNS मुहाफ़िज़, PNS शाहजहां को भी बुरी तरह नुकसान पहुंचा. इसमें मरने और जख्मी होने वाले पाकिस्तानी सैनिक की संख्या 720 रही.

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ऑपरेशन ट्राईडेंट के बाद 8-9 दिसंबर को ऑपरेशन पायथन हुआ. इसमें भारत के मिसाइल जहाज़ों ने फिर से कराची बंदरगाह पर हमला किया. इसमें पाकिस्तान के रिज़र्व फ्यूल टैंक को नष्ट किया गया और उसके तीन मर्चेंट शिप डूब गए. उसका नौसेना हेडक्वार्टर तहस नहस कर दिया गया. कराची पोर्ट कई दिनों तक जलता रहा. पाकिस्तान भारत के एयरक्राफ्ट कैरियर INS विक्रांत को निशाना बनाना चाहता था.

पूर्वी तट

पूर्वी तट पर वाइस एडमिरल कृष्णन ने मोर्चा संभाल रखा था. आईएनएस विक्रांत की मदद से सी-हॉक फाइटर बॉम्बर ने पूर्वी पाकिस्तान के कई तटीय इलाकों में हमले किए. पाकिस्तान ने जवाब देते हुए अपना सबमरीन PNS गाज़ी भेजा जो विशाखापत्तनम कोस्ट के पास डूब गया. इसमें 93 सैनिक थे. भारत के आईएनएस राजपूत ने इसे नष्ट कर दिया था. इससे पाकिस्तान की कमर टूट गई. भारत का भी इस तट पर नुकसान हुआ. 9 दिसंबर को भारत को तगड़ा झटका तब लगा जब पाकिस्तानी सबमरीन PNS हंगोर ने INS खुकरी को अरब सागर में डुबो दिया. इसमें भारत के 18 अफसर और 176 सेलर मारे गए.

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पाकिस्तानी सबमरीन PNS गाज़ी

इस नौसेना के युद्ध में पाकिस्तान की सात गनबोट, एक माइंस स्वीपर, एक सबमरीन, दो डिस्ट्रॉयर, तीन क्राफ्ट, अट्ठारह कार्गो को नुकसान पहुंचा. तीन मर्चेंट नेवी शिप – अनवर बक्श, पसनी और मधुमथी पर कब्जा कर लिया गया. पाकिस्तान के एक स्कॉलर तारिक अली के मुताबिक़, पाकिस्तान ने अपनी आधी नौसेना इस युद्ध में खो दी.

अमेरिकी नेवी का दखल

लड़ाई के चार दिनों में भारत की कई जीत हुईं. लेकिन उसने अभी युद्ध नहीं जीता था. इस युद्ध में अमेरिका पाकिस्तान के पक्ष में था और मसला यूनाइटेड नेशंस में चला गया था. उसने युद्ध विराम का प्रस्ताव रखा लेकिन रूस भारत का दोस्त था और उसने इसके खिलाफ वीटो कर दिया. युद्ध चलता रहा. हार की कगार पर खड़े पाकिस्तान ने अमेरिका से मदद मांगी. इसके लिए अमेरिकी प्रेसिडेंट निक्सन ने हेनरी किसिंगर को चीन भेजा. उसका मानना था कि चीन भारत को धमकी दे जिससे भारत का ध्यान युद्ध से भटकाया जा सके. अमेरिका ने पाकिस्तान के लिए सातवां जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया. ये सबसे शक्तिशाली नौसेना बेड़ा था.

इसकी खबर भारत को 8 दिसंबर को लगी. अब बात रूस और अमेरिका के बीच आ गई थी. मामला इंटरनेशनल बन चुका था. इंदिरा ने रूस से मदद मांगी. रूस से मित्रता संधि हुई. इस संधि का मतलब ये था कि भारत पर हमला रूस पर हमला है. रूस ने भारत की मदद के लिए प्रशांत महासागर में तैनात अपने जंगी बेड़े को हिन्द महासागर में भेज दिया. इस बेड़े को 10th Operative Battle Group कहा जाता था. इसमें न्यूक्लियर पनडुब्बी और जहाज शामिल थे. इसका काम अमेरिकी बेड़े को भारत तक पहुंचने से रोकना था.

इंदिरा गांधी ने फैसला लिया कि अमेरिकी बेड़े के भारत पहुंचने से पहले पाकिस्तान को सरेंडर के लिए मजबूर करना होगा. सैम मानेक शॉ ने पाकिस्तानी सेना को सरेंडर करने को कहा. पाकिस्तान नहीं माना. इसलिए 14 दिसंबर को भारतीय सेना ने एक ऐसी जगह को निशाना बनाया जिसकी पाकिस्तान को उम्मीद नहीं थी. उन्होंने ढाका में पाकिस्तान के गवर्नर के घर पर हमला कर दिया.

दो दिन पहले भारत को चुनौती देने वाले पाकिस्तान के पूर्वी कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी पस्त हो गए. उन्होंने भारत को युद्ध विराम का प्रस्ताव भेज दिया. मानेक शॉ ने जवाब दिया कि युद्ध विराम सिर्फ सरेंडर करने के साथ ही माना जाएगा. भारत की पूर्वी कमान लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के हाथों में थी. वो पाकिस्तान से सरेंडर करवाने की तैयारी कर रहे थे. बाद में पाकिस्तान ने हथियार डाल दिए.

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सरेंडर करने के दौरान दस्तखत करते नियाज़ी. साथ में जगजीत सिंह अरोड़ा.

ये युद्ध बांग्लादेश की आजादी के साथ 16 दिसंबर को ख़त्म हुआ. इंदिरा गांधी ने रेडियो पर कहा, ”ढाका अब एक स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी है. आत्मसमर्पण के कागजात पर पाकिस्तान के पूर्वी कमान की ओर से लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी ने 16:31 बजे भारतीय समय पर ढाका में हस्ताक्षर किए. पूर्वी कमान पर भारतीय और बांग्लादेश बलों के जीओसी कमांड लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने आत्मसमर्पण स्वीकार किया.”

इस युद्ध ने पाकिस्तान का नक्शा बदल दिया. अब भारत के पूर्वी और पश्चिमी किनारे पर पाकिस्तान एक देश ना रहा. एक नया आजाद देश पैदा हुआ. बांग्लादेश.

पूर्वी सीमा पर इस जीत के साथ इंदिरा ने पश्चिमी सीमा पर एकतरफा युद्ध विराम की घोषणा कर दी. इस पर उनका विरोध भी हुआ, लेकिन इससे वो ये सन्देश देना चाहती थीं कि भारत जबरदस्ती लड़ाई नहीं चाहता है.

 


ये स्टोरी निशांत ने की है.

 

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