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सुनो, विराट कोहली ना कहते तब भी तुम गलत थे!

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तो विराट कोहली को कहना ही पड़ा. भगवान के लिए अनुष्का शर्मा को इसमें न घसीटो. क्यों कहना पड़ा? फ्लैशबैक. साल भर पीछे जाइए. 13 गेंद खेलकर कोहली एक रन पर आउट हुए. कैच हैडिन ने लिया बॉल जॉनसन ने फेंकी. लेकिन दोहपन किस पर आया? अनुष्का शर्मा पर. अनुष्का स्टेडियम में थीं, पनौती कहा गया. कहने वालों को क्या सच में लगता है कि शॉट की टाइमिंग से लेकर फील्डर की प्लेसिंग तक अनुष्का शर्मा और विराट कोहली के रिलेशनशिप पर टिकी थी. इस बार तो बस उसी को दोहराया गया था. फर्क ये कि अब ब्रेकअप हो चुका है, और विराट इस बार सफल हुए. लेकिन इससे अनुष्का की खिल्ली उड़ने में कमी ना आई.

विराट ने क्रीज पर कहां पर खड़े होकर कितने डिग्री से बैट तिरछा कर जमीन से कितने ऊपर उठती बॉल को हिट किया, कितने समय तक गेंद हवा में रही, फील्डर कितना इधर या उधर हिला. फील्डर का एफर्ट, विराट की मिसटाइमिंग सब अनुष्का के कारण थी? है न?  

इस देश में सबसे ज्यादा कमी अगर किसी चीज की है न तो वो चीज टॉलरेंस नहीं है, सेंस ऑफ ह्यूमर है. लोग सेंस ऑफ ह्यूमर बेचकर नेट पैक डलाते हैं. हम न इतने नीच हैं कि किसी के रिलेशनशिप को चुटकलों में घसीटने से बाज नहीं आते. गलती हमारी नहीं है, हमें कभी समझ नहीं आया कि किस चीज पर हंसना है किस पर नहीं. हंसने की बात पर हम ऑफेंड हो जाते हैं, और जिन चीजों को गलती से भी नहीं कुरेदना चाहिए उस पर चुटकुले बनाते हैं. स्कूल में नैतिक शिक्षा की क्लास लगती थी. संविधान बनाने वालों ने गलती कर दी, आजादी के बाद कुछ दिन हमें लोकतंत्र नहीं देना चाहिए था, पहले हमारी पीठ पर सवार होकर हंसने न हंसने का सलीका सिखाया जाता. बाकी चीजें वहीं से सुधर जातीं. साठ-पैंसठ साल में हमारा इसलिए भी कटा है क्योंकि जिन बातों और जिन लोगों को हमें हंसी में उड़ा देना था. उन्हें हमने सीरियसली ले लिया. स्कूलों में हास्य शिक्षा जैसी क्लास  लगनी  चाहिए, जहां मजाक की तमीज़ सिखाई जाए.

एक बात समझिए, रिलेशनशिप, फैमिली, रंग, जाति, धर्म, लिंग, सेक्शुएलिटी, शरीर में कोई कमी, शरीर में कोई अधिकता, इन चीजों पर मजाक नहीं बनाते. नहीं बनाते. नहीं बनाते. ये कोई नियम नहीं है. हंसी के फुहारे जैसी किताबें लिखने के पहले नहीं पढ़ाया जाता पर अगर आप इंसान हैं, और बुद्धि रखते हैं. सही-गलत की थोड़ी सी भी समझ रखते हैं, तो आपसे ये उम्मीद की जाती है. कुछ चीजों को बख्श दिया जाता है. दुनिया ऐसे ही रहने को अच्छी जगह बनती है.

बात सिर्फ तभी समझ आती है जब खुद पर आ गिरे!
बात सिर्फ तभी समझ आती है जब खुद पर आ गिरे!

समस्या पता कहां हैं? हम एंगल निकालने में मरे जा रहे हैं. इस वक्त की बुराइयों में ये सबसे बड़ी बुराई है. हमें हर चीज में एंगल खोजना है. निदा फाजली उस दिन मरे जिस दिन जगजीत सिंह पैदा हुए थे. अब इनने उनकी गजलें गाईं थी हम इस पर कागज रंग देंगे एंगल खोज-खोजकर. ये तो चलो भला एंगल हुआ. ये जब बिगड़ता है तो मौतों में दलित-मुसलमान और हिंदू खोजने लगते हैं. रोड रेज में बांग्लादेश घुस आता है. फिर उस महिला अधिकारी की भी नहीं सुनी जाती जो सच कह रही है. उसे भी कोसा जाता है. ये मान लीजिए, महिलाओं के मामले में हम आज भी जाहिल हैं. हमें नहीं पता कि एक महिला से आज की तारीख में हमें साधारण सा व्यवहार कैसे करना चाहिए.

ये किसी सरकार से नहीं आता, ये किसी का फैन होने या न होने से भी नहीं आता. ये आप में भरा हुआ है. इसी कारण से आप बीवियों से बने जोक पर दांत निपोरते हैं. कपिल शर्मा अपनी बीवी के होठों का मजाक उड़ाता है और आप खें खें खें कर हंसते हैं. आपको लगता है स्वस्थ मनोरंजन हो रहा है. ऐसे में कभी खुद को शीशे में हंसते देखिएगा, चुगद लगते हैं आप. बीवियों से तकलीफ है तो शादी मत कीजिए, लेकिन एक सेकंड अपने सेंस ऑफ ह्यूमर से ही आप किसे इम्प्रेस करना चाहते हैं? ये तमाम वो वजहें हैं जिनसे ‘हंसी तो फंसी’ जैसे चोमू बोल फूटते हैं.

कोहली बुरा खेले तो अनुष्का शर्मा के कारण या अच्छा खेले तो अनुष्का से ब्रेकअप के कारण, ये बहुत ही मूर्खतापूर्ण सोच है. उतनी ही बेवकूफाना जितनी किसी को पनौती कहना. इसका और बर्बर रूप लीजिए, किसी को डायन कहकर जला देना. आपको लगेगा एक मजाक को कहां तक खेंचा जा रहा है. पर ये सिर्फ मजाक नहीं है, ये सालों से जमाया गया कूड़ा है आपके दिमाग पर. आज किसी को पनौती कहना ही कल किसी को डायन कहकर जिंदा जला देने में बदल जाता है. कूड़ा भी धरते जाओगे तो ऊंचा होगा ही न!

तो पता क्या कीजिए. मुंह बंद रखिए. विटी न होना, या फनी न होना गुनाह नहीं है. हमारे देश में ऐसा कानून नहीं बना है कि आप दिन में दस चुटकुले न गिराएंगे तो आपको गिलोटिन पर चढ़ा दिया जाएगा. शांत रहिए. खासतौर पर तब जब आपको समझ न हो, हाथी चींटी वाले जोक शेयर कीजिए. बहुत मजा आएगा. कुछ अच्छी किताबें पढ़िए. मुंह बंद रखना बेहतर है, बजाय मुंह खोलकर बेइज्जती कराने से.

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