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वो कंपनी मालिक, जो दवाएं बिकवाने के लिए डॉक्टरों के आगे नंगी लड़कियां नचवाता था

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अमृतसर का एक आदमी था. वो पहुंचा अमेरिका. बहुत बड़ा आदमी बन गया. एक दवाई कंपनी बनाई इसने. उसकी कंपनी एक खास किस्म की दवा बनाती. नाम था, सबसिस. दवाई खूब बिके, इसके लिए ये आदमी डॉक्टरों के सामने स्ट्रिपर्स नचवाता था. स्ट्रिपर्स माने वो लड़कियां, जो डांस करते हुए एक-एक करके कपड़े उतारती हैं. डॉक्टरों को और भी बहुत कुछ मिलता. महंगी-महंगी दारू. बेहतरीन वर्ल्ड क्लास खाना. रिश्तेदारों-दोस्तों के लिए नौकरियां. और बढ़िया-बढ़िया गिफ्ट. ये सब इसलिए कि डॉक्टर ज्यादा से ज्यादा मरीज़ों को ये दवाई लिखें.

इस आदमी का नाम है जॉन नाथ कपूर. फोर्ब्स मैगजीन है एक. जो दुनिया के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट निकालती है. उस लिस्ट में दो बार जगह पाई जॉन ने. अब उसके ऊपर बॉस्टन के एक कोर्ट में केस चल रहा है. कई संगीन इल्ज़ाम हैं उस पर. सबसे संगीन ये कि लोगों को नशे की लत लगाई. वो भी दवा में मिलाकर. दवा भी कौन सी? कैंसर की. जॉन पर चल रहे मुकदमे में गवाहियां दर्ज़ की जा रही हैं. और इन गवाहियों में सामने आ रही हैं एक से एक हैरान करने वाली बातें. वो बताएं, इससे पहले एक कैच. जॉन ने कैंसर की दवाई के सहारे इतना क्राइम किया. और पता है उसकी पत्नी कैसे मरी? ब्रेस्ट कैंसर से.

कौन है ये जॉन कपूर?
जॉन कपूर पैदा हुआ, तो हिंदुस्तानी था. आज़ादी से चार बरस पहले 1943 में जन्म हुआ उसका. अपने परिवार का पहला आदमी, जो कॉलेज पढ़ने गया. शहर था बंबई. वहां ‘इंस्टिट्यूट ऑफ केमिकल टेक्नॉलजी’ से फार्मेसी की पढ़ाई की. फिर पहुंचा अमेरिका. वहां न्यू यॉर्क में एक बफेलो यूनिवर्सिटी है. वही बफेलो, जिसको हिंदी में भैंस कहते हैं. वहां से जॉन ने मेडिसिनल केमिस्ट्री में डॉक्टरेट किया. फिर जनाब वहीं बस भी गए.

ऊपर उठने का सफ़र
जिस शहर में पढ़ाई की, उसी शहर में नौकरी भी खोज ली. इनवेनेक्स लेबोरेट्रीज, ये न्यू यॉर्क में एक दवा कंपनी थी. यहां छह साल काम किया जॉन ने. मगर जॉन को ज़िंदगी भर नौकरी नहीं करनी थी. अपना काम शुरू करना था. 1978 में उन्होंने लाइफोमेड नाम की दवा कंपनी से संपर्क किया. न केवल जॉन ने यहां नौकरी हासिल की, बल्कि इस कंपनी की मालिक कंपनी- स्टोन कंटेनर ने एक डील भी दी उन्हें. स्टोन कंटेनर कार्डबोर्ड बनाने के बिजनस में थी. उन्होंने कहा कि अगर वो फार्मा बिजनस छोड़ते हैं, तो लाइफोमेड जॉन को बेच देंगे.

1981 में जॉन ने निवेशकों को जमा किया. पैसा जोड़ा और लाइफोमेड खरीद लिया. 1983 में इसे पब्लिक कंपनी बना दिया. उस दौर में अमेरिका ने जनरिक दवाओं के पक्ष में कानून बनाए. लाइफोमेड की बिक्री बढ़ी. 1983 में इसकी सेल करीब 136 करोड़ रुपये (अब के रेट में) थी. 1989 आते-आते ये बढ़कर 1,137 करोड़ रुपया हो गया. इस कंपनी का FDA (फूड ऐंड ड्रग अडमिनिस्ट्रेशन) के साथ कुछ इशू था. FDA का कहना था कि जॉन की कंपनी दवा बनाने में ज़रूरी नियमों का ध्यान नहीं रखती. 1990 में जॉन ने जापान की फुजिसावा फार्माक्यूटिकल्स को ये कंपनी बेच दी. लगभग 7,156 करोड़ रुपये की डील थी ये.

1992 में फुजिसावा ने जॉन पर केस कर दिया. उनका कहना था कि लाइफोमेड की FDA दिक्कतें बेहिसाब हैं. 1999 में फुजिसावा और जॉन का सेटलमेंट हो गया. 1991 में जॉन ने ऐकरॉन नाम की कंपनी में निवेश किया. इस कंपनी ने कई और फर्म्स को अपने में मिलाया और बड़ी हो गई.

सबसिस बनाने का आइडिया कहां से आया?
1992 में जॉन ने बनाई एक कंपनी- शिले फार्मा. वो अकेले नहीं थे इसके मालिक. पार्टनरशिप में थे पैट्रिक फोर्टो. पैट्रिक को दवा बेचने का अनुभव था. शिले फार्मा से पहले वो दवा कंपनियों की बिक्री बढ़ाने का ठेका लेते थे. जब दवा कंपनियों को बिक्री बढ़ानी होती, तो वो पैट्रिक को कॉन्ट्रैक्ट देते. पैट्रिक ने अपना ये अनुभव शिले फार्मा को भी दिया.

ये कंपनी दिल की बीमारियों, बच्चों और एलर्जी की दवाएं बनाती थी. ये लोग फार्मा के अनुभवियों को नौकरी पर नहीं रखते. कम वेतन पर हाल ही में कॉलेज पास करके आए फ्रेशर्स, नर्स वगैरह को नौकरी देते. उनसे कहा जाता कि अगर डॉक्टर ने कंपनी की दवाएं लिखीं मरीज़ों को, तो उनको कमीशन मिलेगा. ये स्ट्रेटजी काम आई. शिले फार्मा में दिल की बीमारी वाले मरीज़ों के लिए एक खास स्प्रे बनाया जाता था. ये सीने का दर्द कम करता था. इसी से जॉन को सबसिस बनाने का आइडिया आया.

फिर बनाई इनसिस
साल 2002 में जॉन ने इनसिस बनाई. 2011 में पैट्रिक भी आ गए इसमें. इस कंपनी में जॉन की हिस्सेदारी तकरीबन 60 फीसद है. इसकी सबसे कुख्यात दवाई है सबसिस. ये एक तरह का स्प्रे है. कैंसर के मरीज़ों को जब बेतहाशा दर्द होता है, तो उसे दबाने की दवा है ये सबसिस. इसे जीभ के नीचे स्प्रे किया जाता है. ये दवा यूं खराब थी कि लेने वालों को इसकी लत लग जाती थी. वो इसलिए कि इसमें एक किस्म का ड्रग्स ‘फेन्टेनिल’ डाला जाता था. ये एक तरह का ओपिऑइड है. इल्ज़ाम है कि जॉन से रिश्वत लेने वाले डॉक्टर उन मरीज़ों को भी ये दवा लिख देते थे, जिन्हें कैंसर नहीं होता था. जॉन की कंपनी पर 2015-16 से ही इल्ज़ाम लगना शुरू हो गया था. अक्टूबर 2017 में पहली बार जॉन को अरेस्ट किया गया. तब से वो जेल में है. जॉन पर लगे सबसे गंभीर आरोप हैं-

1. अपनी दवा लिखने के लिए डॉक्टरों को घूस देना
2. बंदोबस्त करके बिना कैंसर वाले मरीज़ों को भी ओपिऑइड वाली दवा दिलवाना
3. इंश्योरेंस कंपनियों के साथ धोखाधड़ी. उन्हें चूना लगाना.

क्या था जॉन का मोडस ऑपरेंडी?
सबसिस बेचने के लिए जॉन की कंपनी ने खूब पैसे खर्च किए. कंपनी खास इवेंट्स करवाती. इनमें डॉक्टरों को बुलाया जाता. डॉक्टर कहते, दवाओं के इस्तेमाल और बाकी जरूरी चीजों पर रिसर्च वगैरह जानने जा रहे हैं. जबकि इन इवेंट्स में डॉक्टरों की जमकर अय्याशी करवाई जाती थी. बाकी रिश्वत अलग. रिपोर्ट्स के मुताबिक, सिर्फ 2016 में करीब 18 हज़ार बार डॉक्टरों को भुगतान किया गया. बस इन पेमेंट्स को जोड़ें, तो लगभग 14 करोड़ 23 लाख रुपये होते हैं.

इंश्योरेंस कंपनियों को भी बुद्धू बनाते थे
लोग मेडिकल इंश्योरेंस लेते हैं. ताकि वो बीमार हों, तो दवा कंपनियां उनके इलाज का, उनकी दवाओं का खर्च उठाएं. ये जो सबसिस दवा थी, ये बहुत महंगी थी. अब कैंसर में इस्तेमाल होने वाली दवा बाकी मरीज़ों को क्यों लिखी जा रही है? इंश्योरेंस कंपनी तो ये सारे सवाल पूछेगी. सवाल पूछे जाते, तो शायद सारा मामला खुल जाता. इसका हल निकाला जॉन ने. उसकी कंपनी के कुछ लोग डॉक्टरों के ऑफिस में बैठे रहते. उस डॉक्टर का कर्मचारी बनकर. जब इंश्योरेंस कंपनियां किसी मरीज़ के बारे में तफ़्तीश करतीं, तो ये लोग झूठ बोलते. ताकि दवाई का खर्च क्लियर कर दें एजेंट.

फिर की बहुत बड़े लेवल की धोखाधड़ी
जब सबसिस को कैंसर के अलावा बाकी मरीज़ों को देने के मामले बढ़े, तो हेल्थ इंश्योरेंस कंपनियां सतर्क हुईं. उन्होंने कहा, अगर ये दवा बाकी मरीज़ों को दी जाती है तो हम इंश्योरेंस कवर नहीं देंगे. इल्ज़ाम है कि इससे निपटने के लिए जॉन और उनके साथियों ने एक साज़िश की. उन्होंने बनाया ‘रिइम्बर्समेंट यूनिट’. इसमें क्या होता था कि इंश्योरर और फार्मेसी बेनेफिट मैनेजर (PBM) से पहले ही परमिशन मिल जाती थी. बाद में अप्रूवल का झंझट ही खत्म.

PBM क्या होता है, क्या करता है?
अमेरिका में इलाज बहुत महंगा है. शायद दुनिया में सबसे महंगा. वहां बिना हेल्थ इंश्योरेंस के लोगों का गुजारा नहीं हो सकता. वजह ये कि इंश्योरेंस की किस्त फिर भी आप भर लेंगे. लेकिन इलाज इतना हाई रेट है कि इंश्योरेंस न हो, तो औकात के बाहर हो जाता है. ऐसे में PBM का रोल देखिए, तो बहुत बड़ा हुआ. PBM होता है थर्ड-पार्टी अडमिनिस्ट्रेटर. मतलब इंश्योरेंस लेने वाले और इंश्योरेंस देने वाले के बीच की कड़ी. जब दोनों पार्टियों के बीच क्लेम का सेटलमेंट होगा, तब ये PBM का रोल आएगा. ये कार-बाइक वाले थर्ड पार्टी से अलग होता है. यानी इस तरह जॉन और उसके साथियों ने इंश्योरेंस कंपनियों को धोखा दिया. ये बहुत ऊपर का खेल रहा होगा.

ये ‘रिइम्बर्समेंट यूनिट’ क्या चालाकी थी?
इसकी वजह से क्या होता कि इलाज के वक़्त डॉक्टर जो भी दवा लिखता, उसका भुगतान इंश्योरेंस कंपनी को करना ही पड़ता. कंपनी को पता ही नहीं होता था कि वो जिसका क्लेम दे रही है, वो किस दवा के लिए है.
ऐसा करके जॉन से इंश्योरेंस कम्पनियों को खूब चपत लगाई.

अमेरिका की दुखती रग है ये ओपिऑइड
इसकी लत समझिए कि अमेरिका की महामारी है. चरस-गांजा खराब क्यों है? क्योंकि एक तो इसका नुकसान. दूसरा, इसकी लत. ओपिऑइड दवाओं की शक्ल में आने वाला ड्रग्स है. बहुत तेज दर्द को दबाने में इस्तेमाल होती हैं. बहुत लंबे समय तक इस्तेमाल की जाएं, तो वो असर भी चला जाता है. बल्कि दर्द बढ़ सकता है. बाकी लत अलग लग जाती है. इसके ज्यादा इस्तेमाल से मौत भी हो सकती है. ओपिऑइड का इस्तेमाल अमेरिका में महामारी बन गया है. 1999 के बाद के सालों में ओपिऑइड वाली दवाओं के प्रिस्क्रिप्शन में लिखे जाने के मामलों में बेतहाशा तेज़ी आई. इसके ओवरडोज़ से मरने वालों की तादाद भी बढ़ती गई. आंकड़े कहते हैं कि अकेले 2017 में इस तरह की दवाओं से 47,600 लोगों की मौत हुई.

स्ट्रिपर को सेल्स मैनेजर बना दिया
इनसिस ने मुनाफ़े के लिए क्या-क्या किया. इसकी एक मिसाल देखिए. एक महिला थी. उसका नाम था सनराइज़ ली. वो स्ट्रिपर थी. जॉन की कंपनी ने उसे सेल्स मैनेजर की पोस्ट दे दी. अदालत में जो गवाहियां दी जा रही हैं, उसमें एक है ऐलेक बरलाकोफ की गवाही. ऐलेक जॉन की कंपनी में काम करते थे. ऐलेक के मुताबिक, जॉन से घूस पाने वाले डॉक्टरों के बीच सनराइज़ का बहुत चार्म था. उसका काम था डॉक्टरों को रिझाना. ताकि वो मरीज़ों को सबसिस दें. ऐलेक समेत और कई कर्मचारी हैं, जो जॉन के खिलाफ गवाही दे रहे हैं.

जॉन का केस क्यों इतना बड़ा है?
इनसिस इकलौती कंपनी नहीं है जिसने नारकोटिक्स का ग़लत इस्तेमाल किया हो. 2008 में सेफालोन ने करोड़ों रुपये का जुर्माना भरा था. पाया गया कि उसने ऐक्टिक नाम की एक दवा को बढ़ावा दिया. सेफालोन ने कैंसर की इस दवा को माइग्रेन, ऐनिमिया जैसी बीमारियों, यहां तक कि घाव की पट्टी बदलते समय भी इसके इस्तेमाल को बढ़ावा दिया. 2011 में इजरायल की टेवा फार्माक्यूटिकल्स ने इसे खरीद लिया. जितना बड़ा क्राइम सेफालोन ने किया था, उसके मुकाबले वो बहुत सस्ते में छूट गए. इनसिस थेरप्यूटिक अमेरिका की पहली बड़ी दवा कंपनी है, जिस पर इतनी बड़ी कार्रवाई हुई है. यहां जस्टिस हुआ, तो बाकी दवा कंपनियों को ज़रूरी संदेश जाएगा.

जॉन के किये का अंजाम क्या था, एक मिसाल पढ़िए
32 साल की सारा फुलप का केस फोर्ब्स में छपा था. 25 मार्च, 2016. इस दिन सारा को अपनी मां की कार दुकान पर छोड़नी थी. ये याद दिलाने के लिए मां ने सुबह के आठ बजे सारा को फोन किया. उन्हें लगा, पक्का वो सो रही होगी. सारा ने फोन नहीं उठाया. उनकी मां ने फिर सारा के मंगेतर को फोन मिलाया. मंगेतर सारा को जगाने उसके कमरे में गया. देखा, सारा जमीन पर पड़ी है. चेहरा फर्श में धंसा हुआ है. वो मर चुकी थी.

लाश की जांच हुई. पता चला, सारा की दवा चल रही थी. दो दवाएं खाती थी वो. एक, सेनेक्स. ये ऐन्ग्जाइटी की दवा थी. दूसरी दवा थी सबसिस. ये कॉम्बिनेशन जानलेवा था. सारा को कैंसर नहीं था. एक ऐक्सिडेंट के बाद उसकी पीठ और गरदन में चोट आई थी. उनको हड्डियों में दर्द होता था. ऐसे मरीज़ को सबसिस देना अपराध था. सारा का परिवार सबसिस बनाने वाली कंपनी को हत्यारा समझता है. वो ग़लत तो नहीं समझता. 2015 में इनसिस ने कुल 2,368 करोड़ की दवाएं बेचीं. ये बिक्री बस कैंसर मरीज़ों के दम पर नहीं आई थीं. इसका एक बड़ा हिस्सा सारा जैसे मरीज़ों को बेचा गया था. अगर जॉन कपूर पर इल्ज़ाम साबित हो जाता है, तो वो 25 साल जेल की चक्की पीस सकते हैं. अगर वो अपराधी पाए जाते हैं, तो उनके अपराध के मुकाबले ये बहुत मामूली सज़ा होगी.


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