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इनके चलते हो गया हिंदी और उर्दू का ब्रेक-अप

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रामचंद्र शुक्ल हिंदी साहित्य के हिमालय माने जाते हैं. उन्होंने बीस साल की उम्र में निबंध लिखा था, जिसका नाम था साहित्य क्या है? 20 की उम्र में लिखा उनका ये निबंध आज भी हिंदी साहित्य के विद्यार्थियों के लिए मस्ट रीड माना जाता है. रामचंद्र शुक्ल बस ग्यारहवीं तक पढ़े थे और कहा जाता है कि उनकी इंटैलिजेंस गॉड गिफ्टेड है. जिंदगी भर बनारस और BHU की सेवा करने के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी का अंत भी बनारस में ही चुना. चार अक्टूबर को उनकी बर्थ एनिवर्सरी होती है. सेलिब्रेट करने के लिए आइए उनको करीब से जानते हैं और पढ़ते हैं उनकी जिंदगी के ये बेहद खास पहलू –

बीएचयू में ज्वाइनिंग के टाइम इंटरव्यूअर का ही ले लिया इंटरव्यू

शुक्ल जी को मालवीय जी ने बुलाया था. और BHU में उनकी सीधे प्रोफेसर के पद पर नियुक्ति होनी थी. इससे पहले मिर्जापुर के प्राइमरी स्कूल में रामचंद्र शुक्ल पेंटिंग पढ़ाया करते थे. और जब वो नियुक्ति के लिए डिपार्टमेंट पहुंचे और ये बात हेड को बताई तो हेड साहब को उनके सर्टिफिकेट देखकर यकीन नहीं हुआ. इसके बाद हेड ने उनका इंटरव्यू करके ही ज्वाइनिंग कराने की बात सोची. और उनसे हिंदी साहित्य के इतिहास पर कोई प्रश्न कर दिया. इसके बाद तो रामचंद्र शुक्ल उनके उस प्रश्न के जवाब में घंटों तक बोला. और बोलते ही गए.

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BHU में रामचंद्र शुक्ल ने दिया था इंटरव्यू.

कई बार हेड साहेब ने उनको रोकना चाहा. पर रामचंद्र शुक्ल का कहना था थोड़ा रुकिए अभी जवाब पूरा कहां हुआ है? आखिर में हेड साहब ने सीधे VC साहब को बुला भेजा. जब उस समय VC रहे मदन मोहन मालवीय को ये खबर पता चली तो वो तुरंत समझ गए कि रामचंद्र शुक्ल की बात हो रही है. वो वहां आए और बोले कि किसने कहा था इनका इंटरव्यू लेने को. इन्हें तो मैंने सीधे ज्वाइनिंग के लिए बुलाया था. इन्हीं रामचंद्र शुक्ल ने ही हिंदी साहित्य का इतिहास किताब लिखी है, जो हिंदी साहित्य के इतिहास पर लिखी गई सबसे फेमस किताब है.

श्याम सुंदर दास से रामचंद्र शुक्ल के कोल्डवॉर का किस्सा

श्याम सुंदर दास से रामचंद्र शुक्ल के कोल्डवॉर का एक किस्सा है. श्याम सुंदर दास ने अपने रिसर्च स्कॉलर लक्ष्मी नारायण मिश्र सुधांशु को काव्य में अभिव्यंजनावाद विषय पर लिखने को दिए. कहा जाता है कि श्याम सुंदर जी में लक्ष्मी नारायण जी को ब्रीफ भी किया था कि इस विषय में रामचंद्र शुक्ल को जो विचार हैं, उनकी आलोचना करते हुए लिखना. कुछ दिन पहले ही रामचंद्र शुक्ल ने इसी विषय पर में एक भाषण प्रयाग के हिंदी साहित्य सम्मेलन में दे चुके थे. लक्ष्मी नारायण जी ने लिख तो लिया पर जब उसे चेक करने की बारी आई तो उसे दो इक्जामिनर चेक करने वाले थे. जिसमें से एक रामचंद्र शुक्ल भी थे. ये बात जब लक्ष्मी नारायण को पता चली तो उनके होश उड़ गए. फिर भी बेचारे किसी तरह जो लिखे थे वो जांचा गया.

अब लक्ष्मी नारायण को बस रिजल्ट का इंतजार था कि वो कितने नंबर से फेल किए गए हैं. ये बात जान लें. पर जब रिजल्ट आया तो लक्ष्मी नारायण को दूसरे इक्जामिनर के दिए 62 नंबर के बदले शुक्ल जी ने 67 नंबर दिए थे. ये बात जानकर वो शुक्ल जी के पैरों में जाकर गिर पड़े. शुक्ल जी को लगा कि लक्ष्मी पास हो जाएं इसलिए ऐसा कर रहे हैं. उन्हें पता नहीं था कि रिजल्ट लक्ष्मी देख चुके हैं. तो उन्होंने कहा कि रिजल्ट आने वाला है. तुमने जो लिखा था उसके हिसाब से मैंने नंबर दे दिए हैं. अब क्या कर सकता हूं. लक्ष्मी नारायण ने कहा जानता हूं. मैंने आपकी आलोचना की फिर भी आपने मुझे इतने अच्छे नंबर दिए. रामचंद्र इस बात पर मुस्कुराने लगे. लक्ष्मी नारायण मिश्र बाद में बिहार के फेमस नेता रहे और बिहार विधानसभा के अध्यक्ष भी बने.

चित्रलेखा लिखने वाले भगवती चरण वर्मा के कांफिडेंस की हवा निकाल दी

भगवती चरण वर्मा का उपन्यास चित्रलेखा तब नया-नया ही आया था. बहुत हिट चल रहा था. एकदम बेस्टसेलर. हालांकि अभी की तरह उस वक्त बेस्टसेलर की नापतौल का कोई खास पैमाना नहीं था. फिर भी चारों ओर चित्रलेखा की ही चर्चा थी. एक रोज शिवमंगल सिंह सुमन भगवती से मिलने आए. भगवती उस वक्त अपनी सफलता के खुमार में थे. एकदम चांप के अपनी तारीफ करते रहे.और बोले कितने बड़े-बड़े आलोचकों ने मेरी तारीफ की. पर मैं एक बार रामचंद्र शुक्ल से मिलना चाहता हूं और ये जानना चाहता हूं कि वो मेरे उपन्यास के बारे में क्या सोचते हैं. शिवमंगल जी ने उनके मन में प्रभुता पाई काहि मद नाहीं वाली फीलिंग भांप ली और मुस्कुराते हुए रामचंद्र शुक्ल के साथ भगवती जी की मीटिंग फिक्स करा दी.

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भगवती चरण वर्मा का उपन्यास चित्रलेखा.

भगवती जैसे ही रामचंद्र शुक्ल के पास पहुंचे अपनी तारीफ शुरू कर दी. कहां उनकी क्या तारीफ हुई. कहां सम्मान में क्या छपा बताने लगे. काफी देर तक रामचंद्र शुक्ल सुनते रहे फिर बोले भगवती जी आपने एक मेन किरदार के लिए कुमारगिरी नाम का प्रयोग किया है. जबकि आपकी कहानी दूसरी-तीसरी शताब्दी के आस-पास की है और गिरी टाइटल का प्रयोग तो आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य के बाद होना शुरू हुआ था. इतना सुनना था कि भगवती चरण वर्मा को अहसास हो गया कि वो किसके सामने बैठे हैं. उन्होंने तुरंत अपनी किताब की और अपनी पॉपुलैरिटी बनी रहे इस डर से अपना झोला उठाया और तुरंत रामचंद्र शुक्ल के पैर छूकर निकल लिए.

सारा का सारा हिंदी साहित्य एक तांगे में ही समा जाता था

रामचंद्र शुक्ल, श्याम सुंदर दास, भगवानदीन और अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ चारों एक ही तांगें में बैठकर कई बार डिपार्टमेंट आते और जाते थे. जबकि चारों के बीच बहुत से मतभेद थे और पूरे बनारस में इन मतभेदों के किस्से चाव से सुनाए जाते थे. पर जब कोई चारों को इस तरह एक ही तांगे पर यूं आते हुए देखता तो इस अद्भुत सीन को देख कर कहता कि सारा का सारा हिंदी साहित्य एक ही तांगे पर जा रहा है.

श्याम सुंदर दास बोले, समझ नहीं आ रहा रुको शुक्ल जी से पूछ कर आता हूं

श्याम सुंदर दास क्लास में सूरदास का लिखा भ्रमर गीत सार पढ़ा रहे थे. एक लाइन पर अटक गए. उस लाइन में गोपियां जरा देवी से प्रार्थना कर रही हैं कि राहु और केतु को जोड़ दो. यहां पर श्याम जी जरा का अर्थ बुढ़ापा लगा रहे थे. पर उससे मतलब क्लियर नहीं हो रहा था. तो उन्होंने क्लास में स्टुडेंट्स से कहा कि कुछ देर रुकिए, मैं रामचंद्र जी से इसका मतलब पूछ कर आता हूं क्योंकि उन्हीं ने भ्रमर गीत सार संपादित किया है और सिलेबस में भी उन्हीं ने लगाया है. स्टुडेंट उनकी इस बात से दंग रह गए कि वो शुक्ल जी से पूछने जा रहे थे जबकि दोनों राइवल माने जाते थे.

रामचंद्र शुक्ल ने उन्हें सही अर्थ बताया कि यहां जरा देवी नाम की राक्षसी है, जिसका बेटा जरासंध था. और उसने जरासंध को जब दो भागों में पड़ा पाया था तो उसे जोड़ दिया था. ऐसे में अगर वो राहु और केतु को भी जोड़ दे तो जब राहु चांद को निगलेगा, उसके बाद कृष्ण से बिछड़ने के बाद उन गोपियों का दिल जलाने वाला चांद कभी दिखाई नहीं देगा.

शुक्ल जी ‘मजाक’ में कहा करते थे कि उर्दू की गजलें हॉस्पिटल की तरह होती हैं

कुछ लोग कहते हैं कि उर्दू को अपने हिंदी साहित्य में शामिल न करके रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी का बहुत नुकसान किया पर ये बात मान्य है कि अगर ये उनका नजरिया रहा भी हो तो कोई उनके स्तर पर हिंदी के इतिहास पर काम करके उर्दू को उसमें शामिल भी नहीं कर पाया. आज भी बेस्ट और फेमस किताब रामचंद्र शुक्ल की ही है.

शुक्ल जी कहते थे कि उर्दू गजलों को पढ़ते हुए यूं लगता है कि किसी हॉस्पिटल का रुख कर लिया है. इनमें कोई कराह रहा होता है. कोई चिल्ला रहा होता है तो कोई दर्द से कपड़े फाड़ रहा होता है. और इन सारे बीमारों और पागलों की पेंनिसलीन की तरह दवा एक ही है, महबूब.

उर्दू पर अपनी बात के दौरान वो उर्दू के एक शेर का जिक्र किया करते थे. और कहते थे इसे ही देख लो लगता है कि शायर साहब ने आशिक को खटमल का बच्चा समझ रखा है –

इंतेहा-ए-लागरी से जब नजर आया न मैं

हंसके वो कहने लगे बिस्तर को झाड़ा चाहिए

माने इतनी कमजोरी थी कि मैं बिस्तर पर लेटा हुआ सामने वाले को नजर नहीं आ रहा था. इसलिए उसने कहा कि अगर मुझे खोजना है तो बिस्तर को झाड़ना पड़ेगा. तब कहीं गिरा हुआ मिलूंगा.

पर दुःख की बात ये है कि ये मजाक भारी पड़ गया. उर्दू धीरे-धीरे बाहर होती गई. ग़ालिब से लेकर मीर तक, सब हिंदुस्तान से बेगाने हो गए.

(इन सारे किस्सों के लिए डीयू से हिंदी में एमफिल कर रहे सुशांत कुमार शर्मा को दी लल्लनटॉप पुच्ची.)

ये स्टोरी ‘दी लल्लनटॉप’ के लिए अविनाश जानू ने की थी.


वीडियो देखें:

 

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