Submit your post

Follow Us

स्पेन में फुटबॉलर्स को दौड़ा-दौड़ाकर मारने वाले डिएगो माराडोना इंसान से 'भगवान' कैसे बने?

साल 1986. मैक्सिको दूसरी बार फीफा वर्ल्ड कप होस्ट करने वाला पहला देश बना था. मैक्सिको यानी लैटिन अमेरिका. लैटिन अमेरिका, अमेरिकी महाद्वीप के उन हिस्सों को कहते हैं जहां स्पैनिश, फ्रेंच या फिर पुर्तगाली बोली जाती है. स्पैनिश भाषी मैक्सिको में होने वाले वर्ल्ड कप के जरिए 25 साल का एक लैटिन अमेरिकी अपना बदला लेना चाहता था. उस लैटिन लड़के को ‘डरपोक’ और ‘रोंदू’ बुलाया जाता था और उसे ये बदलना था.

ज़ख्म गहरा था, इसलिए तैयारी भी भयानक थी. 1978 के वर्ल्ड कप में उम्र और 1982 में खुद पर हुए हमले का जवाब देने के लड़कपन ने डिएगो माराडोना नाम के इस लड़के को वर्ल्ड कप उठाने से रोक दिया था. इसलिए इस बार वह कोई ग़लती नहीं करना चाहता था. पहले खतरनाक टैकल्स पर फ्रस्ट्रेशन में चीखने-चिल्लाने वाला माराडोना, अब हर टैकल के बाद और मज़बूती से उठकर अपने काम में लग जाता. काम यानी अर्जेंटीना को जिताना.

# कोलंबिया नहीं, मैक्सिको

सब सही रहता, तो बदले हुए माराडोना को दुनिया कोलंबिया से देखती. 1986 के वर्ल्ड कप की होस्टिंग कोलंबिया को ही मिली थी. लेकिन 1982 में कोलंबिया ने वर्ल्ड कप होस्ट करने से इनकार कर दिया. फिर ये जिम्मा मिला मैक्सिको को.

साल 1978 में अर्जेंटीना और 1982 में स्पेन के बाद लगातार तीसरी बार किसी स्पैनिश भाषी देश में वर्ल्ड कप होना था. दुनिया की नज़र मैक्सिको पर थी. मैक्सिको के लिए काम बहुत मुश्किल नहीं था. उन्होंने 1970 में भी FIFA वर्ल्ड कप होस्ट किया था. लेकिन टूर्नामेंट शुरू होने से आठ महीने पहले एक भयानक भूकंप आया. इस भूकंप में ऑफिशली पांच हजार लोग मारे गए. तमाम बिल्डिंगें धराशायी हो गईं, ट्रेवल सिस्टम लगभग तबाह हो गया. और लोगों को लगा कि अब मैक्सिको में वर्ल्ड कप नहीं हो पाएगा.

लेकिन ऊपरवाले को ये मंजूर नहीं था. उसके प्लान के मुताबिक माराडोना को मैक्सिको में ही ख़ुदा का दर्जा मिलना था. तभी तो इस भूकंप में स्टेडियमों को कोई नुकसान नहीं हुआ. वर्ल्ड कप तय समय से शुरू हुआ.

# पुराना घाव

पिछले वर्ल्ड कप के सेकंड ग्रुप स्टेज में दोनों मैच हारकर बाहर होने वाली अर्जेंटीना इस बार नए रंगरूप में थी. सिर्फ 25 साल के माराडोना इस नई अर्जेंटीना की अगुवाई कर रहे थे. ये नई अर्जेंटीना थी. पिछले वर्ल्ड कप तक राजधानी से सटे बोका इलाके में जलवा बिखेर अर्जेंटीना के लाडले बने माराडोना अब स्पेन और इटली तक अपनी कीर्ति फैला चुके थे. साल 82 में अर्जेंटीनी क्लब बोका जूनियर्स छोड़ माराडोना ने स्पैनिश क्लब बार्सिलोना का दामन थामा था.

माराडोना के लिए स्पेन प्रवास अच्छा नहीं रहा. पहले तो 82 वर्ल्ड कप में अपने देश के सबसे अहम मैच में उन्होंने जोश खोया. ब्राज़ील के ख़िलाफ अर्जेंटीना का करो या मरो का मुकाबला चल रहा था. मैच का 85वां मिनट. सिर्फ 21 साल के माराडोना को रोकने की सबसे सटीक तकनीक अपनाते हुए ब्राज़ीली मिडफील्डर बतिस्ता ने टांग उठाई और जूता जाकर लगा माराडोना के गाल पर. गुस्साए माराडोना ने तुरंत बतिस्ता को लात मार दी.

बतिस्ता की टांग देखने में नाकाम रहे रेफरी को माराडोना की लात दिख गई. नतीजा, लाल कार्ड और बेइज्जत होकर माराडोना मैच से बाहर. अर्जेंटीना ये मैच 3-1 से हार गया. साल 1978 वर्ल्ड कप में कोच सेजार लुइस मेनोत्ती की बेफ़ुजूल ज़िद ने माराडोना को वर्ल्ड कप में नहीं खेलने दिया था. और इस वर्ल्ड कप में वो अपने गुस्से से हार गए.

# बदले-बदले सरकार

फिर आया 86 का वर्ल्ड कप. 1984 के कोपा डेल रे (स्पैनिश नेशनल कप) के फाइनल में स्पेन के राजा के सामने मैदान पर विपक्षी प्लेयर्स को दौड़ा-दौड़ाकर मारने वाले माराडोना अब शांत होकर फुटबॉल खेलने पर जोर देते थे. माराडोना को शांत करने में उनकी नई टीम का भी हाथ था. साल 84 की लड़ाई के बाद ही वह इटैलियन टीम नापोली से जुड़ गए थे.

अब उन्हें ऐसी खतरनाक डिफेंडिंग से हर हफ्ते दो-चार होना होता था. इटैलियन फुटबॉल में सबसे ज्यादा जोर डिफेंस पर ही दिया जाता था. और पिछले वर्ल्ड कप में उन्हें बुरी तरह से बुली करने वाले डिफेंडर्स अब हर हफ्ते उनके सामने होते थे. इससे माराडोना खतरनाक डिफेंडिंग पर ओवररिएक्ट करने से बचने लगे. साथ ही उनका टेम्परामेंट बदलने में अर्जेंटीना के नए कोच कार्लोस बिलार्डो का भी बड़ा रोल था. बिलार्डो साल 1983 में हेपेटाइटिस से जूझ रहे माराडोना से मिलने स्पेन गए थे.

यहीं पर उन्होंने सिर्फ 22 साल के माराडोना को नेशनल टीम का कैप्टन बनने के लिए मनाया था. माराडोना कप्तान तो बन गए, लेकिन इससे टीम में असंतोष फैलने लगा. सीनियर प्लेयर्स को लगता था कि उनके सामने टीम में आया बंदा उन्हें लीड कैसे कर सकता है. इस गुट के लीडर थे दिग्गज डिफेंडर डैनिएल पासारेया.

1978 की वर्ल्ड कप विनिंग टीम के कैप्टन रहे पासारेया अपनी जगह माराडोना को मिलने से गुस्सा थे. इसी गुस्से में उन्होंने टीम के पहले मैच से ठीक पहले अपना नाम वापस ले लिया. ख़ैर, इतने बड़े स्टेज पर आकर एक प्लेयर के लिए तो टीम रुकती नहीं. अर्जेंटीना ने अपना पहला मैच साउथ कोरिया से खेला.

साउथ कोरिया ने माराडोना को रोकने के लिए सबसे टेस्टेड टेक्नीक अपनाई. बॉल से ज्यादा माराडोना को लुड़काओ, उन्हें लगातार गिराते रहो. ये टेक्नीक इतनी मारक थी कि सारी टीमें इसी का इस्तेमाल करती थीं. फिर चाहे वो इंटरनेशनल मैच हो या क्लब मैच.

स्पैनिश क्लब एथलेटिक बिल्बाओ ने 1983-84 सीजन में इसी टेक्नीक से दो बार माराडोना को रोका था. पहली बार तो उनके डिफेंडर्स ने माराडोना का टखना ही तोड़ डाला था. इसके बाद वह तीन महीने तक बाहर रहे. दूसरी बार उन्होंने जो बवाल किया, वो आप इस वीडियो में देख सकते हैं.

वापस मैच पर लौटें तो साउथ कोरिया ने भी वही किया, लेकिन ये माराडोना अलग था. इसे अब गुस्सा काबू करना आता था. माराडोना भड़के नहीं और एक अच्छे फुटबॉलर की तरह अपने खेल से जवाब दिया. अर्जेंटीना ने मैच 3-1 से जीत लिया. माराडोना ने तीनों गोल करने में अपने साथियों की मदद की. फुटबॉल की भाषा में इसे असिस्ट कहते हैं.

अर्जेंटीना ने अगला मैच 1-1 से ड्रॉ खेला. इटली के साथ हुए इस मैच में माराडोना ने बेहद खूबसूरत गोल किया. इसके बाद उनकी टीम ने तीसरे मैच में बुल्गारिया को 2-0 से हराकर अगले राउंड में एंट्री कर ली. सेकंड राउंड में उन्होंने उरुग्वे को 1-0 से हराया. अब बारी थी क्वॉर्टर-फाइनल की.

# पुरानी अदावत

क्वॉर्टर-फाइनल में अर्जेंटीना के सामने थी इंग्लैंड. वही इंग्लैंड जिसने 19वीं सदी में अर्जेंटीना को ये खेल सिखाया था. दोनों देशों के बीच 1966 वर्ल्ड कप से ही विवाद चल रहा था. इस वर्ल्ड कप का क्वॉर्टर-फाइनल भी इन्हीं दो टीमों के बीच खेला गया था. मैच में अर्जेंटीना के कप्तान अंटोनियो रैटिन को रेड कार्ड मिला था. वजह बताई गई कि वह बॉबी चार्लटन को अपशब्द कह रहे थे. अर्जेंटीना की पूरी टीम रेफरी पर चढ़ गई. चढ़ने की वजह भी थी. रेफरी रुडोल्फ क्रीटलीन जर्मन थे और उनको स्पैनिश आती ही नहीं थी, जबकि रैटिन स्पैनिश भाषी थे.

कहा गया कि क्रीटलीन जानबूझकर अपने यूरोपीय साथी की मदद के लिए अर्जेंटीना से बेईमानी कर रहे हैं. ब्रिटेन में हो रहे इस वर्ल्ड कप मैच के मेहमानों में महारानी भी शामिल थीं. उनके लिए बाकायदा लाल कालीन बिछा था. रैटिन मैदान से बाहर जाने से मना कर रहे थे तो रेफरी ने गार्ड्स बुलाकर उन्हें धक्के मारकर निकाला. तमतमाए रैटिन जाकर महारानी के लिए बिछी लाल कालीन पर बैठ गए.

मैच के बाद इंग्लैंड के मैनेजर (कोच) अल्फ रामज़ी ने विवाद बढ़ाते हुए अर्जेंटीना के प्लेयर्स को जानवर कह दिया. इसके बाद दोनों टीमें जब भी फुटबॉल के मैदान पर उतरतीं, यह विवाद हर बाद दिखता. साल 86 के वर्ल्ड कप क्वॉर्टर-फाइनल में भी यह दिखना ही था. लेकिन इस बार इसे और करारा होना था. क्यों होना था? क्योंकि साल 1982 में दोनों देश फॉकलैंड आइलैंड्स नामक द्वीपों के लिए आपस में भिड़ गए थे.

दोनों देशों ने ऑफिशली इसे कभी युद्ध नहीं माना. फॉकलैंड वॉर के नाम से मशहूर इस घटना में 258 ब्रिटिश और 655 अर्जेंटीनी सैनिक मरे थे. इस युद्ध के सिर्फ चार साल बाद दोनों टीमें वर्ल्ड कप में आमने-सामने थीं.

# इसमें ही हराएंगे

इस मैच में अर्जेंटीना को ना सिर्फ इंग्लैंड से बल्कि मैक्सिको की गर्मी से भी निपटना था. अर्जेंटीना की नीले रंग की किट उस मौसम के लिए सही नहीं थी. किट बनाने वाली कंपनी के हाथ खड़ा करने के बाद कोच बिलार्डो ने अपने स्टाफ के एक मेंबर रुबेन मोशेल्ला को मार्केट से कोई अच्छी किट लाने के कहा. मोशेल्ला लगभग एक जैसी दो शर्ट्स लेकर लौटे. वह इन शर्ट्स को बिलार्डो को दिखा ही रहे थे कि वहां पहुंचे कप्तान माराडोना ने एक शर्ट उठाई और कहा,

‘यह अच्छी जर्सी है, हम इसे पहनकर इंग्लैंड को हराएंगे.’

मोशेल्ला वापस दुकान पर गए और तुरंत उसी कलर की 38 शर्ट्स खरीद ली. जल्दी-जल्दी एक डिजाइनर को बुलाकर उन शर्ट्स में नेशनल टीम की जर्सी में लगने वाली चीजें लगाई गईं. मैच शुरू हुआ. पहले हाफ में दोनों ही टीमें गोल नहीं कर पाईं. सेकंड हाफ का छठा और मैच का कुल 51वां मिनट.

माराडोना बॉल लेकर इंग्लिश गोल की ओर बढ़े, वह मैदान के बाईं तरफ से अंदर की ओर आए और अपने टीममेट होर्हे वाल्दानो की ओर एक लो पास उछाल दिया. बॉल आगे बढ़ाकर माराडोना रुके नहीं, वह अब भी इंग्लिश बॉक्स की ओर भागे जा रहे थे. इधर इंग्लिश प्लेयर्स का ध्यान बॉल की ओर था. उस दिन डिफेंस में खेल रहे इंग्लिश मिडफील्डर स्टीव हॉज ने उसे वाल्दानो तक पहुंचने से पहले ही क्लियर कर दिया. ये अलग बात है कि इससे बॉल ग़लत दिशा, यानी इंग्लिश गोल की तरफ ही उछल गई.

माराडोना उधर ही भाग रहे थे. इधर बॉल को बॉक्स में आता देख इंग्लिश गोलकीपर पीटर शिल्टन उसे पंच करने के लिए लाइन से आगे निकल आए. बॉल हवा में थी, माराडोना और शिल्टन दोनों एक साथ बॉल की तरफ उछले… लेकिन शिल्टन से पूरे 8 इंच छोटे माराडोना का हाथ जाने कैसे शिल्टन से पहले बॉल तक पहुंच गया. माराडोना के हाथ से लग बॉल गोल में चली गई. इंग्लिश प्लेयर्स चिल्लाते ही रह गए और रेफरी ने इसे गोल करार दे दिया.

माराडोना ने बाद में कहा,

‘मैं अपने टीममेट्स द्वारा बधाई मिलने का इंतजार कर रहा था, लेकिन कोई नहीं आया. मैंने उनसे चिल्लाकर कहा, आगे बढ़ो और मुझे गले से लगाओ वर्ना रेफरी इस गोल को अलाऊ नहीं करेगा.’

मैच के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में माराडोना ने इस गोल को ‘हैंड ऑफ गॉड’ का परिणाम बताया. उन्होंने कहा,

‘A little with the head of Maradona and a little with the hand of God’

इसके बाद से ही इस गोल को ‘हैंड ऑफ गॉड’ गोल कहा जाने लगा.

मैच पर लौटें, तो पिच्चर अभी बाकी थी मेरे दोस्त. इंग्लिश टीम अभी इस गोल के सदमे से उबरी भी नहीं थी कि उन्हें एक झटका और लगा. मैच के 55वें मिनट में माराडोना ने जो किया उसे ऑफिशली ‘गोल ऑफ द सेंचुरी’ कहते हैं. मिडफील्डर एक्टर एनरीके ने इंग्लैंड के गोल से लगभग 55 मीटर दूर बॉल माराडोना को दी.

इस घटना के 10.8 सेकेंड्स में बॉल इंग्लिश गोल में पड़ी थी और प्लेयर्स के साथ अर्जेंटीनी फैंस भी झूम रहे थे. इन 10.8 सेकंड्स में माराडोना ने पीटर बीयर्डस्ले, पीटर रीड, टेरी फेनविक को एक बार जबकि टेरी बुचर को दो बार चकमा दिया.

इन लोगों को छकाने के बाद जब वह गोलकीपर पीटर शिल्टन के सामने पहुंचे, तो वहां उन्होंने डमी शॉट (शॉट या पास लेने का दिखावा करना) लिया और शिल्टन चालबाजी में फंस गए. इसके बाद माराडोना ने आराम के साथ बॉल को गोल में उलझा दिया. बाद में इंग्लिश स्ट्राइकर गैरी लिनेकर ने मैच के 81वें मिनट में अपनी टीम के लिए एकमात्र गोल किया. अर्जेंटीना 2-1 से जीत गया.

# मथायस वर्सेज माराडोना

सेमी-फाइनल में माराडोना ने दो गोल और मारे. अर्जेंटीना ने बेल्जियम को 2-0 से हराकर फाइनल में एंट्री की. यहां उन्हें भिड़ना था वेस्ट जर्मनी से. जर्मन टीम माराडोना के करिश्मे से परिचित थी. उन्होंने अपने बेस्ट डिफेंडर लोथार मथायस को माराडोना को थामने का ज़िम्मा सौंपा. मथायस, जिनके बारे में माराडोना अक्सर कहते हैं- मैंने लोथार मथायस से बेहतर प्लेयर के ख़िलाफ नहीं खेला. मथायस अपनी टीम के भरोसे पर खरे भी उतरे और इस पूरे मैच में माराडोना को थामे रखा.

लेकिन जर्मन टीम शायद भूल गई थी कि फुटबॉल टीम गेम है. मैच में अर्जेंटीना के लिए माराडोना के अलावा कम से कम नौ ऐसे प्लेयर्स थे जो गोल कर सकते थे. और यहीं उनसे चूक हो गई. डिफेंडर होजे ब्राउन ने मैच के पहले हाफ में अर्जेंटीना को 1-0 से आगे कर दिया. सेकंड हाफ की शुरुआत में ही फॉरवर्ड होर्हे वाल्दानो ने स्कोर 2-0 किया.

अभी तक जर्मनी सिर्फ अटैक रोकने के लिए खेल रही थी. लेकिन दो गोल से पिछड़ने के बाद उन्हें समझ आ गया कि अब स्ट्रैटेजी बदलनी होगी. स्ट्रैटेजी बदली भी और नतीजन कार्ल हाइंज़ रुम्मेनिगे तथा रुडी वॉलर ने गोल दागे. अब मैच 2-2 से बराबर था और किसी भी तरफ जा सकता था.

लेकिन जैसा कि हमने पहले ही कहा- माराडोना को यहां भगवान बनना था. मैच खत्म होने से सिर्फ सात मिनट पहले माराडोना ने अपना जादू दिखाया.  उन्होंने ऐसा पास दिया, ऐसा पास दिया कि बॉल वेस्ट जर्मनी की पूरी मिडफील्ड और डिफेंस को पार कर गई. इधर होर्हे बुर्रुचागा ने आगे बढ़ बॉल को जर्मन गोलकीपर के पीछे गोल में डाल दिया. अर्जेंटीना 3-2 से जीत गई. माराडोना अमर हो गए.

माराडोना की कप्तानी में अर्जेंटीना ने वर्ल्ड कप जीत लिया. इस वर्ल्ड कप में अर्जेंटीना ने कुल 14 गोल किए थे. इनमें से पांच गोल माराडोना ने अकेले किए. इतना ही नहीं, उन्होंने 1986 वर्ल्ड कप में पांच असिस्ट भी किए थे. यानी अर्जेंटीना के 14 गोल में से 10 में माराडोना शामिल थे. फीफा वर्ल्ड कप के इतिहास में किसी भी प्लेयर ने एक टूर्नामेंट पर ऐसा असर नहीं डाला. इस वर्ल्ड कप की जीत ने माराडोना को इंसान से ख़ुदा बना दिया.

# ईश्वर का पतन

अर्जेंटीना को वर्ल्ड कप जिता ख़ुदा बनने वाले माराडोना ये शोहरत संभाल नहीं पाए. उन्हें कोकीन की लत लग गई. क्लब ने हजारों डॉलर के जुर्माने ठोके लेकिन माराडोना को सुधार नहीं पाए. माराडोना पर कमोर्रा नाम के इटैलियन माफिया से दोस्ती रखने का संदेह भी जाहिर किया गया. साल 91 में माराडोना कोकीन सेवन के दोषी पाए गए. 15 महीने का बैन लगा. फिर वापसी की और पहुंचे 1994 के वर्ल्ड कप में.

अर्जेंटीना किसी तरह घिसटते हुए इस वर्ल्ड कप में पहुंचा था. आखिरी क्वॉलिफाइंग मैच में उन्होंने कोलंबिया ने 5-0 से धोया था. इसके बाद उन्होंने ऑस्ट्रेलिया के साथ दो लेग का कॉन्टिनेंटल प्ले-ऑफ खेला. इन मैचों से पहले तक माराडोना कोच की नज़र में DDLJ फर्स्ट हाफ वाले राज थे. लेकिन मैच तक आते-आते सिमरन उनकी ही हुई, माराडोना के ही गोल ने अर्जेंटीना को 1994 वर्ल्ड कप में पहुंचाया.

लेकिन ये वर्ल्ड कप माराडोना नामक ईश्वर के पतन की आखिरी सीढ़ी साबित हुआ. पतन, जो पहली बार कोकीन सेवन के आरोप में बैन लगने से शुरू हुआ था. बात पतनों की करें तो 94 वर्ल्ड कप से ठीक पहले, फरवरी 1994 की घटनाओं का ज़िक्र जरूरी हो जाता है. इसी महीने माराडोना ने अर्जेंटीना की वर्ल्ड कप स्क्वॉड से अपना नाम वापस ले लिया था. बोले कि बहुत प्रेशर है और दिमागी तौर पर वह इससे डील नहीं कर पा रहे.

मीडिया को बात नहीं पची, दो दिन तक माराडोना के घर के आगे डेरा जमा दिया. मांग थी कि माराडोना अपने फैसले पर सफाई दें. माराडोना झक्किया गए और एयर राइफल से फायरिंग झोंक दी. चार पत्रकार जख्मी हुए, पुलिस बुलाई गई और चोटिल लोगों ने लीगल एक्शन लिया.

हालांकि इसके बाद भी माराडोना बाइज्जत अमेरिका पहुंच गए, वर्ल्ड कप खेलने. कहते हैं कि FIFA ने माराडोना से वादा किया था कि उन्हें ड्रग टेस्ट में बचा लिया जाएगा. माराडोना ने यहां दो मैच खेले भी. पहले मैच में उनका प्रदर्शन इतना बेहतरीन था कि फैंस ने उन्हें खड़े होकर सलाम किया. दूसरे मैच में भी माराडोना अर्जेंटीना के लिए शानदार रहे.

इस मैच के बाद माराडोना एक नर्स का हाथ थाम मैदान से बाहर निकले. इस नर्स को माराडोना को टेस्ट के लिए लाने का जिम्मा सौंप गया था. बाहर निकलते हुए माराडोना बेहद खुश नज़र आ रहे थे. वह लगातार हाथ हिलाकर फैंस का अभिवादन स्वीकार कर रहे थे. किसी को अंदेशा भी नहीं था कि माराडोना के साथ क्या होने वाला है. टेस्ट हुआ और चार दिन बाद, 29 जून को FIFA के जनरल सेक्रेटरी सैप ब्लाटर ने घोषणा की,

‘मूत्र के दोनों नमूने पॉजिटिव रहे. अर्जेंटीना नेशनल टीम के प्लेयर डिएगो माराडोना ने नाइजीरिया के खिलाफ मैच में डोपिंग कंट्रोल रेगुलेशंस का अतिक्रमण किया है.’

माराडोना को वर्ल्ड कप से बाहर कर दिया गया. 15 महीने का बैन भी लगा. इसके बाद अर्जेंटीना इस वर्ल्ड कप में एक भी मैच नहीं जीत पाई. दो बार की वर्ल्ड चैंपियन टीम बेआबरू होकर बाहर हो गई. माराडोना का फुटबॉल करियर भी खत्म हो गया.


वो बच्चा, जो 21 की उम्र में ‘कौड़ियों’ में बिककर इटली आया, 25 में सर्वश्रेष्ठ फुटबॉलर बन गया

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

गंदी बात

बहू-ससुर, भाभी-देवर, पड़ोसन: सिंगल स्क्रीन से फोन की स्क्रीन तक कैसे पहुंचीं एडल्ट फ़िल्में

जिन फिल्मों को परिवार के साथ नहीं देख सकते, वो हमारे बारे में क्या बताती हैं?

चरमसुख, चरमोत्कर्ष, ऑर्गैज़म: तेजस्वी सूर्या की बात पर हंगामा है क्यों बरपा?

या इलाही ये माजरा क्या है?

राष्ट्रपति का चुनाव लड़ रहे शख्स से बच्चे ने पूछा- मैं सबको कैसे बताऊं कि मैं गे हूं?

जवाब दिल जीत लेगा.

'इस्मत आपा वाला हफ्ता' शुरू हो गया, पहली कहानी पढ़िए लिहाफ

उस अंधेरे में बेगम जान का लिहाफ ऐसे हिलता था, जैसे उसमें हाथी बंद हो.

PubG वाले हैं क्या?

जबसे वीडियो गेम्स आए हैं, तबसे ही वे पॉपुलर कल्चर का हिस्सा रहे हैं. ये सोचते हुए डर लगता है कि जो पीढ़ी आज बड़ी हो रही है, उसके नास्टैल्जिया का हिस्सा पबजी होगा.

बायां हाथ 'उल्टा' ही क्यों हैं, 'सीधा' क्यों नहीं?

मां-बाप और टीचर बच्चों को पीट-पीट दाहिने हाथ से काम लेने के लिए मजबूर करते हैं. क्यों?

फेसबुक पर हनीमून की तस्वीरें लगाने वाली लड़की और घर के नाम से पुकारने वाली आंटियां

और बिना बैकग्राउंड देखे सेल्फी खींचकर लगाने वाली अन्य औरतें.

'अगर लड़की शराब पी सकती है, तो किसी भी लड़के के साथ सो सकती है'

पढ़िए फिल्म 'पिंक' से दर्जन भर धांसू डायलॉग.

मुनासिर ने प्रीति को छह बार चाकू भोंककर क्यों मारा?

ऐसा क्या हुआ, कि सरे राह दौड़ा-दौड़ाकर उसकी हत्या की?

हिमा दास, आदि

खचाखच भरे स्टेडियम में भागने वाली लड़कियां जो जीवित हैं और जो मर गईं.

सौरभ से सवाल

दिव्या भारती की मौत कैसे हुई?

खिड़की पर बैठी दिव्या ने लिविंग रूम की तरफ मुड़कर देखा. और अपना एक हाथ खिड़की की चौखट को मजबूती से पकड़ने के लिए बढ़ाया.

कहां है 'सिर्फ तुम' की हीरोइन प्रिया गिल, जिसने स्वेटर पर दीपक बनाकर संजय कपूर को भेजा था?

'सिर्फ तुम' के बाद क्या-क्या किया उन्होंने?

बॉलीवुड में सबसे बड़ा खान कौन है?

सबसे बड़े खान का नाम सुनकर आपका फिल्मी ज्ञान जमीन पर लोटने लगेगा. और जो झटका लगेगा तो हमेशा के लिए बुद्धि खुल जाएगी आपकी.

'कसौटी ज़िंदगी की' वाली प्रेरणा, जो अनुराग और मिस्टर बजाज से बार-बार शादी करती रही

कहां है टेलीविज़न का वो आइकॉनिक किरदार निभाने वाली ऐक्ट्रेस श्वेता तिवारी?

एक्ट्रेस मंदाकिनी आज की डेट में कहां हैं?

मंदाकिनी जिन्हें 99 फीसदी भारतीय सिर्फ दो वजहों से याद करते हैं

सर, मेरा सवाल है कि एक्ट्रेस मीनाक्षी शेषाद्री आजकल कहां हैं. काफी सालों से उनका कोई पता नहीं.

‘दामिनी’ के जरिए नई ऊंचाई तक पहुंचा मीनाक्षी का करियर . फिर घातक के बाद 1996 में उन्होंने मुंबई फिल्म इंडस्ट्री को बाय बोल दिया.

ये KRK कौन है. हमेशा सुर्खियों में क्यों रहता है?

केआरके इंटरनेट एज का ऐसा प्रॉडक्ट हैं, जो हर दिन कुछ ऐसा नया गंधाता करना रचना चाहता है.

एक्ट्रेस किमी काटकर अब कहां हैं?

एडवेंचर ऑफ टॉर्जन की हिरोइन किमी काटकर अब ऑस्ट्रेलिया में हैं. सीधी सादी लाइफ बिना किसी एडवेंचर के

चाय बनाने को 'जैसे पापात्माओं को नर्क में उबाला जा रहा हो' कौन सी कहानी में कहा है?

बहुत समय पहले से बहुत समय बाद की बात है. इलाहाबाद में थे. जेब में थे रुपये 20. खरीदी हंस...

सर आजकल मुझे अजीब सा फील होता है क्या करूं?

खुड्डी पर बैठा था. ऊपर से हेलिकॉप्टर निकला. मुझे लगा. बाबा ने बांस गहरे बोए होते तो ऊंचे उगते.