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फरहान अख्तर ने कौन-सी देशविरोधी बात की, जो IPS ऑफिसर उन्हें 'धमकाने' पहुंच गए?

अकेले-अकेले सोशल मीडिया पर विरोध जताने का समय ख़त्म हो गया है.

ये फ़रहान अख़्तर के एक ट्वीट की पंक्ति है. संदर्भ- सिटिज़नशिप (अमेंडमेंट) ऐक्ट, 2019. CCA. फ़रहान अख़्तर का ये ट्वीट आया 18 दिसंबर को. इसमें लिखी पूरी बात थी-

ये विरोध प्रदर्शन क्यों अहमियत रखते हैं, ये समझने के लिए ज़रूरी बातें ये रहीं. 19 दिसंबर को मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में आपसे मुलाकात होगी. सोशल मीडिया पर अकेले-अकेले विरोध जताने का समय ख़त्म हो गया है.

Here’s what you need to know about why these protests are important. See you on the 19th at August Kranti Maidan, Mumbai. The time to protest on social media alone is over.

इस ट्वीट में एक वेब पोस्टर का स्क्रीनशॉट भी था. जिसपर लिखा था-

हम CAA+NRC पर प्रोटेस्ट क्यों कर रहे हैं? सिटिज़नशिप अमेंडमेंट ऐक्ट 2019 (CAA/CAB) क्या है?

फ़रहान के इस ट्वीट पर भारतीय पुलिस सेवा (IPS) के एक अधिकारी संदीप मित्तल ने जवाबी ट्वीट किया. इसमें लिखा था-

आपको भी ये जानने की ज़रूरत है कि आपने भारतीय दंड संहिता (IPC) की दफ़ा 121 के तहत अपराध किया है और आपकी ओर से ऐसा अनजाने में नहीं किया गया. मुंबई पुलिस और NIA इंडिया, क्या आप ये देख रहे हैं. प्लीज, उस देश के बारे में सोचिए जिसने आपको जीवन में सबकुछ दिया. क़ानून समझिए.

इसके साथ संदीप मित्तल ने एक विडियो का लिंक दिया. जिसमें IPC के बारे में जानकारी दी गई है.

संदीप मित्तल के ट्विटर हैंडल पर ब्लू टिक है. यानी, वैरिफाइड हैंडल. इनकी प्रोफाइल फोटो में जो तस्वीर है, उसमें इन्होंने वर्दी पहनी हुई है. सिर पर यूनिफॉर्म वाली कैप है. परिचय में IPS लिखा है. आगे लिखा है- साइबर सिक्यॉरिटी में रिसर्चर. ट्विटर पर करीब 27.4 हज़ार लोग इन्हें फॉलो करते हैं. यानी, आप इन्हें ‘इन्फ्लूएंसर’ (जो दूसरों पर प्रभाव बनाता हो) कह सकते हैं. ट्विटर पर इनकी ऐक्टिविटी का एक बड़ा हिस्सा लीडर्स के ट्वीट रीट्वीट करना है. ज़्यादातर इसमें सत्ता पक्ष से जुड़े लोग हैं.

जावेद अख़्तर को भी जवाबी ट्वीट किया था
कुछ दिनों पहले फ़रहान के पिता जावेद अख़्तर ने दिल्ली पुलिस के जामिया कैंपस में घुसकर स्टूडेंट्स को पीटने वाले एपिसोड पर एक ट्वीट किया था. जावेद ने लिखा था कि क़ानून पुलिस को इस तरह बिना इजाज़त लिए यूनिवर्सिटी कैंपस में घुसने का अधिकार नहीं देता. उनके इस ट्वीट पर संदीप मित्तल ने जवाब दिया कि जावेद कौन से क़ानून की बात कर रहे हैं, ब्योरा दें.

जावेद अख़्तर के उस ट्वीट में फैक्ट की ग़लतियां थीं. शायद इसीलिए संदीप के ट्वीट पर ख़बरें बनीं. मगर फ़रहान अख़्तर के ट्वीट पर दिया गया उनका जवाब क्या है- सही या ग़लत? क्या सच में फ़रहान ने वो ट्वीट करके ऐसा कोई अपराध किया कि उनके ऊपर दफ़ा 121 लगाई जा सके? माना जा सके कि फ़रहान ने देश की सरकार के विरुद्ध जंग छेड़ी है? या ऐसा करने के लिए लोगों को उकसाया है?

आगे बढ़ने से पहले कुछ ज़रूरी पॉइंट्स पढ़िए-

1. सिटिज़नशिप (अमेंडमेंट) ऐक्ट (CAA) के विरोध में 19 दिसंबर को ‘भारत बंद’ बुलाया गया है.
2. सिविल सोसायटी संगठनों ने CAA के अखिल भारतीय विरोध के लिए ये तारीख़ चुनी है.
3. इसके बाद से ही सोशल मीडिया पर एकजुट होकर विरोध (प्रोटेस्ट) जताने की अपीलें आने लगीं.
4. ‘ऑक्सफर्ड इंग्लिश डिक्शनरी’ के मुताबिक Protest का मतलब होता है-

किसी चीज, किसी बात से असहमति और आपत्ति की अभिव्यक्ति. इसका अर्थ ‘जन प्रदर्शन’ भी है. किसी आधिकारिक नीति या फैसले से सख़्त आपत्ति की स्थिति में जब लोग जमा होकर अपनी असहमति जताते हैं, तो उसको प्रोटेस्ट करना कहते हैं.

5. इंडियन पीनल कोड (IPC) में एक सेक्शन है- 121. इसके तहत- जो कोई भी भारत सरकार के विरुद्ध जंग छेड़े या लोगों को जंग छेड़ने के लिए भड़काए या ऐसी कोशिश करे, उसके लिए सज़ा का प्रावधान है. मौत या उम्रकैद.

अब लौटते हैं संदीप मित्तल के ट्वीट पर. उन्होंने फ़रहान अख़्तर के सामने दफ़ा 121 की जो चेतावनी चमकाई, उस पर. मगर उससे पहले दो ट्वीट. संदीप के ही. जो उन्होंने बाद में किए. पहला ट्वीट-

फ़रहान अख़्तर, देश को उम्मीद है कि आप आज अगस्त क्रांति मैदान में प्रदर्शनकारियों की जिस भीड़ को इकट्ठा कर रहे हैं, उन पर आपका पूरा नियंत्रण होगा. और ये प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहेंगे.

इसके बाद उनका एक और ट्वीट आया-

प्रिय दोस्तो और दुश्मनो, मेरा ट्विटर हैंडल आंशिक रूप से हैक कर लिया गया था. ये उन तत्वों का काम है, जो अख़्तर बाप-बेटे से किए गए मेरे सवालों के विरुद्ध हैं. मैं दिल्ली पुलिस में इन तत्वों के नाम शिकायत लिखवा रहा हूं. मैं इन ऐंटी-सोशल तत्वों के रोके रुकने वाला नहीं हूं.

संदीप के ट्वीट्स में क्या दिक्कत है
जो उनके IPS अधिकारी होने की वजह से और बढ़ जाती है. इन वजहों से-

1. क्या फ़रहान अख़्तर ने अपने ट्वीट में हिंसा की अपील की थी? क्या उन्होंने कोई भड़काऊ बात लिखी थी?

2. फ़रहान को किस आधार पर दफ़ा 121 का अपराधी बताया गया? उनके ट्वीट में देश और सरकार के विरुद्ध जंग जैसा क्या था?

3. फ़रहान के ट्वीट पर जवाब देते हुए संदीप मित्तल ने NIA इंडिया को टैग किया. क्यों? क्या ये इतना गंभीर है कि NIA को इन्वॉल्व किया जाए?

4. क्या CAA का विरोध करना ग़ैरक़ानूनी है? क्या प्रोटेस्ट करना ग़ैरक़ानूनी है?

5. क्या एक IPS अधिकारी इस तरह बिना पक्के आधार और सबूत के सोशल मीडिया पर किसी को धमकी दे सकता है?

6. क्या किसी मास प्रोटेस्ट के समर्थन में ट्वीट करने का मतलब है कि आप उसमें शामिल हर किसी की शख्स की ज़िम्मेदारी लेते हैं? अगर हां, तो ये बात क्या सत्ता और विपक्ष, दोनों तरफ के नेताओं पर भी लागू होती है?

7. उन्होंने अपने ट्वीट में ‘ऐंटी-सोशल एलिमेंट्स’ लिखा है. वो किसी कह रहे हैं ऐंटी-सोशल? जो जावेद और फ़रहान के ट्वीट पर दिए गए उनके जवाब का विरोध कर रहे हैं? या उनको, जिन्होंने हैंडल हैक किया? मगर संदीप मित्तल ने तो दोनों को लिंक कर दिया. फिर क्या मानें? ऐंटी-सोशल किसे कहा जा रहा है? क्या इतने संदिग्ध आधार पर एक IPS ‘ऐंटी-सोशल’ कह सकता है किसी को?

8. संदीप मित्तल ने अपने एक ट्वीट में फ़रहान से कहा कि वो उस देश की सोचें, जिसने उन्हें सब कुछ दिया. क्या किसी क़ानून की आलोचना करना, उससे असहमति रखना देश विरोधी काम है?

9. संदीप मित्तल का दावा है कि उनका ट्विटर हैंडल ‘पार्शली हैक’ किया गया. वो इसकी शिकायत दिल्ली पुलिस में लिखवाएंगे. प्रक्रिया है कि शिकायत लिखवाए जाने के बाद पुलिस जांच करती है. आरोपियों की शिनाख़्त करती है. आरोप तय करती है. मामला कोर्ट में जाता है. पुलिस को आरोपी पर लगाए गए आरोप साबित करने होते हैं. फिर अदालत फैसला करती है. क्या संदीप मित्तल को पक्का यकीन है कि उनका हैंडल किसने हैक किया? क्या वो दावे से कह सकते हैं कि ये जावेद और फ़रहान को जवाबी ट्वीट करने की ही वजह से हुआ है? और अगर ये तय नहीं है, बस आरोप है, तो क्या एक IPS अधिकारी इस तरह का ‘रैंट’ दे सकता है सोशल मीडिया पर? क्या इसे पद का बेजा इस्तेमाल न माना जाए?

10. रैली और मास प्रोटेस्ट के लिए पुलिस-प्रशासन से अनुमति लेनी होती है. ‘अगस्त क्रांति मैदान’ वाले प्रोटेस्ट के लिए आयोजकों ने इजाज़त ली थी कि नहीं, ये जानकारी नहीं है. क्या संदीप मित्तल ने इस बारे में जानकारी लेकर ट्वीट किया था? क्या फरहान अख़्तर आयोजकों में से हैं? अगर बिना परमिशन वाले प्रोटेस्ट में वो जा भी रहे हों, तो क्या ये दफ़ा 121 लगाए जाने लायक अपराध है?

दो ज़रूरी बातें-

पहली बात

फ़रहान अख़्तर के ट्वीट में एक भारी ग़लती थी. उन्होंने जो पोस्टर शेयर किया, उसमें भारत के मानचित्र का ग्राफिक था. इसमें जम्मू-कश्मीर का हिस्सा अलग रंग में था, जबकि बाकी हिस्से अलग रंग में थे. ये दिखाने का मतलब होता है कि जम्मू-कश्मीर विवादित क्षेत्र है और भारत का इसपर अधिकार विवादित मामला है. मगर फ़रहान ने एक और ट्वीट करके इस चूक के लिए मुआफ़ी मांगी. उन्होंने लिखा-

मैंने 19 दिसंबर को प्रस्तावित विरोध प्रदर्शन को लेकर कुछ समय पहले एक मेसेज पोस्ट किया था. मैं अभी भी उसमें कही गई बाकी बातों पर कायम हूं, मगर मैंने अभी-अभी नोटिस किया कि इसमें जो भारत का मैप दिखाया गया है, वो सही नहीं है. कश्मीर का हर एक इंच, हर एक हिस्सा, भारत का हिस्सा है. और मैं इस ग़लत मानचित्र को ख़ारिज़ करता हूं. इस खामी पर पहले मेरा ध्यान नहीं गया, इस बात का अफ़सोस है मुझे. मैं इसके लिए खेद प्रकट करता हूं.

भारत के मानचित्र को लेकर नियम हैं. भारत जिन क्षेत्रों पर अपना अधिकार बताता है, जिस मानचित्र को आधिकारिक मानता है, वही शेयर किया जा सकता है. फरहान वाले ट्वीट में जो पोस्टर है, उसमें भारत का नक्शा वैसे तो पूरा है. मगर उसमें शेष भारत और जम्मू-कश्मीर के हिस्से में भरे गए रंगों में अंतर है. फ़रहान अख़्तर ने कहा कि उन्होंने देर से ग़ौर किया इस बात पर. और एहसास होने पर उन्होंने मुआफ़ी मांगी. वो माफ़ी नहीं मांगते, तो बात होती. मगर फ़रहान की माफ़ी से भी संदीप मित्तल संतुष्ट नहीं हुए. उन्होंने ट्वीट करके फ़रहान के लिए लिखा-

अब जब कि आपने मान लिया है कि आपने ग़लती से वो ग्राफिक्स शेयर किया था, तो प्लीज देश को ये भी बताइए कि जनता को भड़काने जैसी देशविरोधी हरक़त करने की सीख कौन दे रहा है आपको?

क्या संदीप मित्तल साबित कर सकेंगे कि फ़रहान अख़्तर ने किसी को भड़काया? क्या ये साबित कर सकते हैं कि फ़रहान अख़्तर किसी देशविरोधी गतिविधि में शामिल हैं? अगर फ़रहान ने ऐसा किया है, तो संदीप को प्रक्रिया के तहत केस दर्ज़ करवाना चाहिए. या उन्होंने ट्विटर पर ही थाना और कोर्ट, सब खोल लिया है? इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसले का ज़िक्र आता है. 2016 में जस्टिस ए के सीकरी और आर के अग्रवाल की बेंच ने कहा था-

लोकतंत्र का एक बेहद अहम पक्ष ये है कि इसमें लोगों को अपनी जायज असहमति जताने के लिए जगह दी जाती है. भारत में राजनैतिक जीवन का एक बहुत ख़ास पक्ष ये है कि यहां शांतिपूर्ण प्रदर्शनों के ज़रिये अपना विरोध जताने की परंपरा रही है. आज़ादी हासिल करने के हमारे संघर्ष के मुख्य हथियार थे संगठित और अहिंसक प्रोटेस्ट मार्च. शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करना अब बुनियादी अधिकार है.

ये फैसला आया था जम्मू-कश्मीर पुलिस की एक कार्रवाई पर. 7 अगस्त, 2007. पुलिस ने एक प्रोटेस्ट के दौरान ‘जम्मू ऐंड कश्मीर पैंथर्स पार्टी’ की जनरल सेक्रटरी अनीता ठाकुर, पार्टी की सेक्रेटरी और एक पत्रकार को पीटा था. ये मामला कोर्ट में पहुंचा. फैसला सुनाते हुए अदालत ने वही बात कही, जो अभी ऊपर पढ़ा आपने. इसके अलावा अदालत ने अनीता ठाकुर को दो लाख रुपये और बाकी दोनों को एक-एक लाख रुपये का ज़ुर्माना भी दिलवाया. हालांकि अपने इस आदेश में कोर्ट ने ये भी माना था कि धर्म, जाति, नस्ल, भाषा वगैरह के आधार पर कई बार जनविरोध और प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़काई जाती है. ये बेहद अफ़सोस की बात है. ऐसे प्रोटेस्ट्स में तोड़-फोड़, हिंसा और सार्वजनिक/निजी संपत्ति को नुकसान नहीं पहुंचाया जाना चाहिए. इनसे पुलिस और प्रशासन की चुनौतियां तो बढ़ती हैं. मगर, तब भी, शांतिपूर्ण प्रदर्शन फंडामेंटल अधिकार है.

दूसरी बात-

CAA की संवैधानिक मान्यता को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं आईं सुप्रीम कोर्ट के पास. 18 दिसंबर को इस पर पहली सुनवाई हुई. सुप्रीम कोर्ट में ये बात उठी कि CAA को लेकर कई तरह के भ्रम हैं लोगों के बीच. इसपर सुप्रीम कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल से मार्फ़त केंद्र सरकार को निर्देश दिया. कि वो CCA से जुड़ा ब्योरा मीडिया के ज़रिए लोगों तक उपलब्ध कराए. इसे पब्लिश करवाए. ब्रॉडकास्ट करवाए. ताकि लोग इस क़ानून के ब्योरे जान सकें.

 

मगर, कुछ और भी बातें हैं डर की वजह. CAA को NRC से जोड़कर देखने की वजह भी इसी डर में है. सरकार अब भले कह रही हो कि CAA और NRC को साथ जोड़कर न देखा जाए. मगर इसी सरकार के गृहमंत्री अमित शाह संसद में कह चुके हैं कि CAB के बाद अब पूरे देश में NRC करवाई जाएगी. NRC और CAA,दोनों सिस्टर बिल्स हैं. आप इन दोनों क़ानूनों को साथ में रखकर देखेंगे, तो नतीज़ा ये निकलेगा कि दो छन्नियां हैं इसमें. अगर असम का उदाहरण लें, तो पहली छन्नी है NRC.जिसमें हिंदू और मुस्लिम, सब फंसे हैं. इसके बाद लगती है दूसरी छन्नी- CAA. इसमें मुसलमानों को छोड़कर बाकी सारे पास हो जाएंगे.

यही वो पोस्टर है, जिसे फ़रहान अख़्तर ने अपने ट्वीट में इस्तेमाल किया था. हमने भारत के मानचित्र वाला हिस्सा ब्लर कर दिया है. बाकी टेक्स्ट आप इस इमेज में पढ़ सकते हैं (फोटो: ट्विटर)
यही वो पोस्टर है, जिसे फ़रहान अख़्तर ने अपने ट्वीट में इस्तेमाल किया था. हमने भारत के मानचित्र वाला हिस्सा ब्लर कर दिया है. बाकी टेक्स्ट आप इस इमेज में पढ़ सकते हैं (फोटो: ट्विटर)

इस तरह NIA का डर दिखाना ग़लत नहीं है क्या?
इस आधार पर फ़रहान अख़्तर के ट्वीट वाला पोस्टर देखिए. मानचित्र को छोड़ दें, तो उस पोस्टर में लिखी कोई बात एज़ सच ग़लत नहीं है. हां, उसमें ओपिनियन है. आशंका है. मगर आशंका रखना अस्वाभाविक नहीं है. इस क़ानून को लेकर बने भ्रम और डर का एक कॉन्टेक्स्ट है. उसके लिए सरकार की तरफ से संवाद होना चाहिए. एक ट्रैक में. विरोधाभासी बातें नहीं. और, जैसा कि 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था. मास प्रोटेस्ट के दौरान हिंसा भड़कने की कई घटनाएं हुईं. ऐसा होने का अंदेशा भी रहता ही है. मगर इसके मद्देनज़र प्रशासन को और चुस्त-दुरुस्त होना पड़ता है.

कुछ आपराधिक तत्वों की वजह से शांति से प्रदर्शन करने वाले नहीं पीटे जा सकते. कुछ हिंसक तत्वों की वजह से बाकियों का शांतिपूर्ण विरोध का लोकतांत्रिक अधिकार नहीं छीना जा सकता. और संदीप मित्तल के विभाग, उनके सीनियर्स को चाहिए कि वो इनकी ट्विटर ऐक्टिविटीज़ देखें. समझाएं उन्हें. नाम के साथ IPS लिखकर और वर्दी वाली फोटो लगाकर वैरिफाइड अकाउंट से बिना तथ्य-आधार किसी को धमकाना अपराध है. उसे यूं पुलिस और NIA का डर दिखाना ग़लत है. पुलिसवाले खुलेआम ऐसा करें, ये देश-विरोधी है.


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