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जब शरद पवार 1978 में कांग्रेस के विधायक तोड़कर महाराष्ट्र सीएम बने थे

22 नवंबर, 2019. शिवसेना, एनसीपी और कांग्रेस तीनों पार्टियों की मुंबई में मीटिंग हुई. मीटिंग के बाद उद्धव ठाकरे और शरद पवार दोनों ने कहा कि सरकार बनाने पर सहमति बन गई है. कल साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद सारी चीजें साफ हो जाएंगी. अगले दिन यानी 23 नवंबर को प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई. लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी. महाराष्ट्र के अगले मुख्यमंत्री के रूप में देवेंद्र फडणवीस शपथ ले चुके थे. उनके साथ एनसीपी के विधायक दल के नेता अजित पवार ने भी शपथ ली. उपमुख्यमंत्री पद की. मतलब ये कि शिवसेना-एनसीपी और कांग्रेस की सारी तैयारियां धरी रह गईं और प्रदेश में नई सरकार बन गई.

अब साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस का एजेंडा बदल चुका था. एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने कहा कि फडणवीस के साथ जाने का फैसला अजित का निजी फैसला है. जिसका एनसीपी से कोई लेना-देना नहीं है. चाचा पवार ने भतीजे पवार को पार्टी से निकालने की बात भी कही. और कहा कि

मुझे कोई चिंता नहीं है, मेरे साथ पहले भी ऐसा हो चुका है.

शरद पवार इशारों इशारों में कह रहे थे कि हमने बहुत राजनीती की है. इस तरह की समस्याओं से भी निपट चुके हैं. उन्होंने प्रेस कांफ्रेंस के दौरान ऐसी एक मिसाल दी भी थी. लेकिन उस मिसाल के उलट एक दूसरी मिसाल भी है. आज शरद पवार की पार्टी तोड़कर कोई सीएम बना है. एक वक्त वो था, जब शरद पवार खुद कांग्रेस को तोड़कर सीएम बने थे.

कहानी पवार के पहली बार सीएम बनने की

साल 1977. इमरजेंसी खत्म होने का साल. लोकसभा के चुनाव हुए. पहली बार कांग्रेस पार्टी सत्ता से बाहर हुई. ये हार छोटी-मोटी हार नहीं थी. सो पार्टी में इस्तीफों का दौर शुरू हुआ. महाराष्ट्र में कांग्रेस की सरकार थी. हार की जिम्मेदारी लेते हुए मुख्यमंत्री शंकर राव चव्हाण ने भी पद से इस्तीफा दे दिया. नए मुख्यमंत्री बने वसंतदादा पाटिल. इन सबके बीच ही पार्टी में दो फाड़ हो गई. महाराष्ट्र में कांग्रेस के दो धड़े हो गए. कांग्रेस (यू) और कांग्रेस (आई). पवार यशवंत राव चव्हाण के साथ कांग्रेस (यू) में शामिल हो गए. 1978 में विधानसभा चुनाव हुए. दोनों धड़ों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा. इसका फायदा मिला जनता पार्टी को. जो 99 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. लेकिन सरकार नहीं बना पाई. क्योंकि सत्ता के लिए कांग्रेस के दोनों धड़े एक हो गए थे. कांग्रेस (आई) के पास 62 और कांग्रेस (यू) के पास 69 सीटें थीं. दोनों एकजुट हो गए और मुख्यमंत्री एक बार फिर से वसंतदादा पाटिल.

लेकिन ये सरकार ज्यादा दिन चल नहीं पाई. 5 महीने बाद ही सरकार गिर गई. क्योंकि शरद पवार पार्टी से अलग हो गए थे. अकेले नहीं गए, अपने साथ 12 विधायक भी ले गए. शरद पवार ने 18 जुलाई 1978 को 38 साल की उम्र में मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. जनता पार्टी के समर्थन से. उनके इस दांव से बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषक हैरान रह गए थे. जैसे आज हैं. 41 साल बाद. भतीजे अजित पवार ने भी चाचा शरद पर उन्हीं का दांव आजमाया है. लेकिन वे कितना सफल हो पाएंगे ये कहना थोड़ा मुश्किल है.

78 साल के ‘युवा’ शरद पवार
2019 के विधानसभा चुनाव में एनसीपी को खत्म माना जा रहा था. लगातार एनसीपी के विधायक और पार्टी पदाधिकारी पार्टी छोड़कर जा रहे थे. कहा जाने लगा कि शरद पवार अब बूढ़े हो चुके हैं और एनसीपी डूबता जहाज. लेकिन शरद पवार डटे रहे. महाराष्ट्र चुनाव के दौरान की एक तस्वीर भी खूब वायरल हुई. सातारा की. लोकसभा के उपचुनाव थे. शिवाजी महाराज के वंशज उदयन राजे एनसीपी छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे. बीजेपी ने उन्हें अपना उम्मीदवार बनाया था. एनसीपी की ओर से श्रीनिवास पाटिल उम्मीदवार थे. समर्थन में शरद पवार की सभा थी. वायरल फोटो में शरद पवार मंच पर खड़े हैं. सामने भीड़ है. बारिश हो रही है. और पानी से तरबतर हो चुके 78 साल के ‘युवा’ शरद पवार मंच से डिगे नहीं. फोटो खूब वायरल हुई. खासतौर पर चुनाव परिणाम आने के बाद. विजयन राजे को तगड़ी शिकस्त मिली.

एक बार फिर से शरद पवार ने साबित किया कि वे अभी खत्म नहीं हुए हैं. विधानसभा में एनसीपी ने कांग्रेस को पीछे छोड़ दिया. और बड़े भाई की भूमिका में आ गई. चुनाव के जो परिणाम आए और फिर उसके बाद का जो पूरा घटनाक्रम रहा. उसमें पवार ने दिखा दिया कि किंगमेकर वही है. आज भले ही अब उन्हें अपने ही भतीजे अजित पवार से चुनौती मिल रही हो लेकिन इतनी आसानी से हारा हुआ नहीं माना जा सकता. 52 साल के राजनीतिक जीवन में 78 साल के इस खिलाड़ी ने इस तरह के तमाम सियासी उठापटक देखे हैं. जिसका अंदाजा उनके बयान से ही लगता है.

मुझे कोई चिंता नहीं है, मेरे साथ पहले भी ऐसा हो चुका है.


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