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एक महीने से छात्र धरने पर हैं, किसी को परवाह नहीं

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राज्य है उत्तराखंड. यहां नेपाल की सीमा लगती है. और नेपाल की सीमा से सटे छोटे से शहर का नाम है पिथौरागढ़. पिथौरागढ़ के लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय के छात्र बीते 23 दिनों से धरने पर बैठे हैं. धरना है तो मांग भी होगी. और मांग बेहद छात्रों से जुड़ी हुई. मांग ये कि महाविद्यालय में शिक्षकों और किताबों की संख्या बढ़ाई जाए. ताकि उत्तराखंड के छात्र उत्तराखंड में ही पढ़ें, उन्हें बाहर न जाना हो. 

लक्ष्मण सिंह महर राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय उत्तराखंड के कुमाऊं विश्वविद्यालय से सम्बद्ध है. इसे उत्तराखंड के कुछ बड़े कॉलेजों में गिना जाता है. छात्रों की संख्या लगभग 7,000 और इतने छात्रों पर शिक्षक की पोस्टें सिर्फ 122. और यहां छात्र बताते हैं कि 122 सीटों में महज़ 65 शिक्षक पूर्णकालिक रूप से काम करते हैं. पूर्णकालिक यानी परमानेंट. सैलरी सरकारी मानकों के अनुसार. और जब उम्र होगी तो रिटायर होंगे और पेंशन मिलेगी. इसके अलावा जो पोस्टें खाली हैं, उनमें से कुछ ही पर महाविद्यालय की ओर से अनुबंधित या अस्थायी शिक्षक नियुक्त किए गए हैं.

कॉलेज में धरने पर बैठे छात्र.
कॉलेज में धरने पर बैठे छात्र.

इस साल ही कॉलेज से डिफेंस स्टडीज़ से एमए करके निकले शिवम पांडेय बताते हैं कि स्थिति क्या है. शिवम पांडेय कहते हैं,

“कॉलेज में इतने कम शिक्षक हैं कि कई कोर्सों की पढ़ाई ही नहीं हो पाती है. कॉलेज के हर विभाग में महज़ चार प्रोफ़ेसर हैं. जब कॉलेज खुला था तब भी चार प्रोफ़ेसर थे, और अब भी चार ही प्रोफ़ेसर हैं. यानी इतने सालों में कुछ भी नहीं हो सका.”

1963 में लक्ष्मण सिंह महर राजकीय डिग्री कॉलेज बना. अपने शुरुआती दिनों में कॉलेज आगरा विश्वविद्यालय से सम्बद्ध था. साल आया 1973. कॉलेज सम्बद्ध हो गया नैनीताल की कुमाऊं यूनिवर्सिटी से. शिवम पाण्डेय कहते हैं कि इतने सालों में कुछ नहीं हुआ. इतने सालों से मतलब है जब से कॉलेज खुला है, तब से. 1963 से लेकर 2019 तक. प्रोफेसरों की संख्या उतनी की उतनी ही.

छात्र इतिहास के कोर्सों की पढ़ाई के बारे में बताते हैं. एनशिएंट हिस्ट्री यानी आदिकालीन इतिहास में यहां के छात्र स्पेश्लाइज़ेशन नहीं कर सकते. क्यों? क्योंकि यहां इस विषय का कोई प्रोफ़ेसर नहीं है. पढ़ने की इच्छा रखने वाले छात्र भी मन मारकर मध्यकालीन इतिहास या आधुनिक इतिहास पढ़ते हैं.

शिवम पाण्डेय बताते हैं कि ऐसा बहुत सारे कोर्सों में हो रहा है. छात्रों की मांगों में दूसरा मुद्दा किताबों का है. छात्रों को किताबें नहीं मिल रही हैं. लाइब्रेरी में किताबें नहीं हैं. और जो हैं, वो बहुत ही पुरानी हैं. ग्रैजुएशन के कोर्स के छात्रों को साल भर में दो ही किताबें लाइब्रेरी से मिलती हैं.

कॉलेज के छात्रसंघ अध्यक्ष राकेश जोशी रसायन विज्ञान यानी केमिस्ट्री से एम.एससी. की पढ़ाई कर रहे हैं. ‘दी लल्लनटॉप’ से बातचीत में बताते हैं,

“जब कॉलेज को पहली बार फंड मिला था, तभी जो किताबें आयीं वे ही अभी तक चल रही हैं. बी.एससी. के कोर्स में 18 पेपर होते हैं और किताब मिल रही है सिर्फ दो. अब कई सारे छात्र ऐसे होते हैं कि जिनकी पूरी पढ़ाई लाइब्रेरी की किताबों पर होती है. वे छात्र क्या करेंगे? और जो भी किताबें मिल रही हैं, वे दशकों दशक पुरानी हैं. क्या करेंगे ऐसी किताबों का?”

कितना पुराना है आंदोलन?

लगभग एक साल पुराना. लम्बे समय से ये बातें उठती रही थीं कि कॉलेज में शिक्षकों और किताबों का टोटा है. लेकिन साल 2018 के सितम्बर में कॉलेज में छात्रसंघ चुनाव हुए. 8 अक्टूबर को इन दिक्कतों के संबंध में पहला ज्ञापन उच्च शिक्षा निदेशालय, नैनीताल को दिया गया. कॉलेज के छात्रों ने दिया. कोई कार्रवाई नहीं हुई.

अपनी मांग का पोस्टर उठाए पिथोरागढ़ कॉलेज की छात्रा
अपनी मांग का पोस्टर उठाए पिथोरागढ़ कॉलेज की छात्रा

इस घटना के बाद कुल 4 ज्ञापन दिए गए. इन पर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई. आखिरी ज्ञापन इस साल 12 जून को दिया गया. छात्रों ने कहा कि अगर इन मसलों पर एक हफ्ते तक कोई कार्रवाई नहीं की गयी तो लोग धरने पर बैठेंगे. छात्र कहते हैं कि कार्रवाई नहीं हुई. और 17 जून को छात्र धरने पर बैठ गए. बीच में छात्र एक बार जिलाधिकारी कार्यालय भी मिलने गए. अपने कॉलेज से पिथौरागढ़ डीएम कार्यालय तक रैली निकाली. मौन रैली. मुंह पर पट्टी बांधकर. इसका भी कोई फल नहीं निकला.

मौन रैली निकालते पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज के छात्र
मौन रैली निकालते पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज के छात्र

अब छात्रों के अभिभावकों ने भी मोर्चा सम्हाला. उन्होंने भी पिथौरागढ़ में रैली निकाली. इस रैली का भी कोई लाभ नहीं निकला और अब छात्र इस धरने से ही कोई समाधान निकालने की राह देख रहे हैं.

मौन रैली निकालते पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज के छात्र
मौन रैली निकालते पिथौरागढ़ डिग्री कॉलेज के छात्र

पहाड़ों से महानगरों की ओर पलायन एक बड़ा मुद्दा है. पढ़ाई के बाद नौकरी और दूसरे अवसरों के लिए छात्र महानगरों का रुख करते थे. शिक्षा का मुद्दा उठा है तो लोगों का कहना है कि अगर चीज़ें नहीं सुधरीं तो पलायन में और बढ़ोतरी होगी.

छात्रों के अभिभावकों ने भी अपने बच्चों के समर्थन में मोर्चा निकाला.
छात्रों के अभिभावकों ने भी अपने बच्चों के समर्थन में मोर्चा निकाला.

पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष महेंद्र रावत ने मीडिया से बातचीत करते हुए इसी बारे में बातचीत की. उन्होंने कहा,

“मूलभूत सुविधाओं के अभाव में अधिकतर छात्र बेहतर शिक्षा के लिए या तो देहरादून जाते हैं या तो दिल्ली. किताबों की बढ़ोतरी तो की ही जाए, लेकिन साथ ही साथ महाविद्यालय को अलग विश्वविद्यालय की कार्रवाई पर काम शुरू किया जाए.”

एक आम समय में धरना स्थल पर 30-50 छात्र मौजूद रहते हैं. शिवम पाण्डेय खुद ही बताते हैं कि चूंकि अब बारिश होने लगी और मौसम कुछ सर्द है तो रात को ज्यादा लोग नहीं रहते हैं.

छात्रों को क्या मिला है जवाब?

कॉलेज के प्रिंसिपल डी.एस. पांगती से हमने बात की. आज यानी 10 जुलाई को डीएस पांगती छात्रों से मिलने गए थे. उन्होंने कहा कि अपने संसाधनों के सहयोग से वे कुछ अस्थायी व्यवस्था करेंगे. स्थायी व्यवस्था में समय लग सकता है. लेकिन छात्रों ने कहा कि वे इस बात का स्वागत करते हैं, लेकिन उन्हें इस पूरे प्रकरण में स्थायी इंतजाम चाहिए.

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धरने पर बैठे छात्र.

पांगती ने हमसे कहा,

“120 के आसपास सभी पदों पर स्थायी और अस्थायी शिक्षक मिलाकर कुल 99 शिक्षक हैं. छात्र किताबों की भी मांग कर रहे हैं. हमने उन्हें वादा किया है अभी अस्थायी रूप से कुछ इंतजाम कर देते हैं. क्योंकि स्थायी नियुक्ति और लाइब्रेरी के लिए अलग फंड”-जिसकी छात्र मांग कर रहे हैं-“के इंतजाम में अभी समय लगेगा.”


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